गृहस्थाश्रम : ठीक ऐनक जैसा
ऐनक द्वारा हम प्रत्येक वस्तु देखते हैं और वह हमारी आंखों पर भार रूप नहीं होता । दृष्टि में रुकावट डालने के स्थान में वह उसकी सहायता करता है । नेत्रों और बाहर के पदार्थों के बीच में परदा होने के बदले वह इन पदार्थों को साफ-साफ दिखलाता है । इसी प्रकार पति-पत्नी का पारस्परिक संबंध होना चाहिए कि वे एक-दूसरे के लिए बाधक न बनें । पति अपनी पत्नी में और पत्नी पति में बंद न हो जाए, वरन वे एक-दूसरे के द्वारा समस्त विश्व को देखें ।
यह तभी हो सकता है, जबकि यह संबंध आध्यात्मिक और वेदांतिक समझ-बूझ के आधार पर हो और अन्य किसी दूसरे दृष्टिकोण से ऐसा हो पाना संभव नहीं । जहां दोनों अपने व्यक्तित्व, व्यक्तिगत आदर-सम्मान, आसपास की परिस्थितियों, रीति-रिवाजों, भावनाओं और स्वभावों से ऊपर उठाते हैं, तभी दोनों की आत्मा के, अपने वास्तविक स्वरूप के दर्शन होते हैं, इससे पहले नहीं ।
श्वास हमारे इतने अधिक निकट है अर्थात प्राणरूप है, किंतु कभी हमारी चेतना में प्रकट नहीं होती । इसी प्रकार हमारा व्यावहारिक जीवन भी पूर्ण सामंजस्यमय होना चाहिए । वह किसी प्रकार भार रूप न हो । पति-पत्नी एक-दूसरे के हृदय को चिंताग्रस्त न करें । दोनों परम स्वतंत्र रहें । दम्पति में से कोई भी अपने साथी को पीछे घसीटनेवाला न बने । आजकल साधारणतः विवाहित पुरुषों में स्त्री की भावना पति की आध्यात्मिक उन्नति में बाधा बनकर खड़ी होती है । इसी प्रकार पति का विचार स्त्री के मार्ग में बाधक और भार के रूप में उपस्थित होता है ।
भारतवर्ष में स्त्री और पुरुष अपनी आंखों में सुरमा लगाते हैं । वह नेत्रों की दृष्टि को तेज करने के लिए लगाया जाता है । वह आंखों में जमा रहता है, किंतु दृष्टि में रुकावट नहीं डालता । यदि वह कुछ-कुछ बराबर लगता रहे, तो समझ लो, उसमें कोई दोष है । इसी प्रकार यदि पेट का अस्तित्व तुम्हें बराबर भान होता रहे, तो समझ लो उसमें कुछ गड़बड़ है । यह साधारण नियम है ।
एक दिन राम के पूर्व आश्रम की पत्नी ने राम से यह प्रश्न किया—क्या आपको मेरी याद आती है ? राम ने उत्तर दिया—नहीं, राम कभी किसी दूसरे की याद नहीं करता । याद तो हमें उस व्यक्ति की आती है, जो हमसे भिन्न होता है । क्या तुम्हें कभी अपनी आंखों की, नाक की अथवा हाथ-पैरों की याद आती है । वे तो स्वयं तुम्हारा रूप हैं । इसी प्रकार जब कोई अपने साथी के साथ एक रूप हो जाता है, तो ठीक वही आत्मस्वरूप होने के कारण वह उसे कैसे स्मरण कर सकता है ? इस बात को जरा स्पष्ट समझ लेना चाहिए ।
जब हमें किसी मित्र का पत्र मिलता है, तब हम उस पत्र को चाहने लगते हैं, उसे बहुत महत्व देते हैं । मित्र का पत्र होने के कारण हम उसे प्रेम करने लगते हैं । इसी प्रकार पति और पत्नी मानो ईश्वर के पास से आए हुए एक प्रकार के पत्र हैं । पत्नी के लिए पति का शरीर ईश्वर का पत्र अथवा चित्र जैसा होना चाहिए, जिससे वह पति के शरीर से प्रेम तो करे, उसका आदर-सम्मान तो करे, परंतु यह सब कुछ होते हुए भी शरीर को केवल एक पत्र, एक चित्र अथवा ऐसी ही कोई वस्तु मानती रहे जो स्वयं तत्व वस्तु नहीं है । इसी भांति पत्नी पति के द्वारा ईश्वर को देखती है ।
पति परमेश्वर की एक प्रतिमा, ईश्वर का एक चित्र बन जाए यदि रात्रि में उनके शरीर परस्पर मिलते हैं, तो दिन के समय पत्नी को आध्यात्मिक मिलाप में रहना चाहिए । यदि रात्रि के शारीरिक मिलाप के साथ-साथ आध्यात्मिक मिलाप नहीं भान होता, तो पत्नी को दिन में यह कमी पूरी करनी होगी । प्रत्येक आलिंगन के साथ पत्नी को यह विचार करना चाहिए कि ''मैं ईश्वर समागम प्राप्त कर रही हूं । ऐ ज्योति स्वरूप ! तू मेरे पास आ । मैं तेरा आलिंगन करती हूं । मैं प्रकाश का आलिंगन करती हूं । यही भाव सच्चा आनंद है । यही समस्त विश्व के साथ तादात्म्य होने अथवा पूर्ण पवित्रता प्राप्त करनेवाला है । हे देव ! हे ज्ञानस्वरूप ! तू मेरे पास आ । मैं तुझे स्वीकार करती हूं ।''
इस भांति प्रत्येक वस्तु ईश्वर का चिह्न समझी जानी चाहिए । यदि रात्रि में इसका अनुभव नहीं हुआ तो दिन के समय इसकी पूर्ति करनी चाहिए । इस भांति आप उस एकता और उस वैवाहिक एकता का भान कर सकते हैं ।
ईश्वर का, केवल ईश्वर का आलिंगन कीजिए । समस्त विश्व को अपना ही शरीर मानिए । समस्तरूप, सर्वरूप, सब कुछ बन जाइए । यही भाव आपको सदैव मन में जमाना चाहिए । जहां एक ओर वेदांत आपसे शारीरिक मिलाप के समस्त भाव को त्याग देने की प्रार्थना करता है और कहता है कि एक शरीर दूसरे पर भार न हो, वहीं दूसरी ओर आपसे, वास्तविक आत्मा से सदैव एक रहने की भी प्रार्थना करता है ।
हर क्षण आप इस विचार पर मनन करते रहें कि 'ईश्वर, शक्ति, ऐक्य, पूर्ण प्रेम, दिव्य प्रेम, पूर्ण सत्य और विश्वव्यापी एकता सब कुछ मुझमें है । मैं वही हूं, वही मैं हूं । वह और मैं एक हूं ।'' तब उस स्थिति में आपको अपनी वास्तविक आत्मा, जिसके लिए आपने विवाह किया है, जो आपका निज अपना, आप है, सबमें, पौधों में, वृक्षों में, नदियों में, प्रत्येक वस्तु में अपना, आप अनुभव होने लगेगा ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!