पुनर्जन्म और गृहस्थ के संबंध — भाग 1
भारतवर्ष में एक बार एक बड़ा धनी व्यापारी अपने नगर निवासियों को एक विशाल भोज देनेवाला था । बड़े भोजों में प्रायः नर्तकियों को नाचने-गाने के लिए बुलाया जाता है । यह चाल अब भारतवर्ष में छोड़ी जा रही है । किंतु राम जिस समय की चर्चा कर रहा है, तब इसका बड़ा रिवाज था ।
एक नर्तकी ने नाच-गाना शुरू किया । उसने एक बहुत ही अश्लील और भद्दा गीत गाया, जिसे कभी कोई पसंद न करता लेकिन उस विशेष अवसर पर वह गीत सारी महफिल के दिल में चुभ गया । क्या कारण था ? आप जानते हैं कि भारतवर्ष में शिक्षित पुरुष और सज्जन युवक ऐसे खराब और भद्दे गीतों को कभी पसंद नहीं करते हैं, किंतु उस अवसर पर उस गीत ने महफिल में उपस्थित लोगों के हृदय में ऐसा घर किया कि वे मोहित हो गए । उस अवसर के अनेक महीनों बाद अधिकांश पंडित और विद्वान, जिन्होंने वही गीत सुना था, प्रायः सड़क पर जाते हुए धीरे-धीरे वही गीत गुनगुनाते हुए देखे गए । सचमुच सबके सब, जिन्होंने एक बार उसे सुन लिया था, उस गीत को पसंद करने लगे, यहां तक कि वह गीत सदा के लिए उनके हृदय में बस गया ।
प्रश्न यह उठता है कि उसमें मोहनेवाली कौन-सी वस्तु थी ? जिन लोगों ने गीत सुना था, उनमें से किसी से भी पूछकर देखो कि वह कौन-सी चीज है, जिसने उनको मोह लिया है, जिसके कारण बड़ा ही सुंदर है, बड़ा ही मीठा है, बहुत ही श्रेष्ठ, अति उन्नायक व अत्युत्तम है वह गीत । किंतु वह तो कभी ऐसा था नहीं । यही गीत इस गायिका के मुख से सुनने के पहले, उनके लिए अत्यंत घृणित था, किंतु अब वे इसे पसंद करते थे । यही भूल है । असली जादू गाने के हाव-भाव और स्वर में था । गायिका के चेहरे, चितवन और सूरत में था वह जादू । असली आकर्षण लड़की में था और उसी का जादू गीत का आकर्षण बन गया था ।
यही दुनिया में होता है । एक शिक्षक आता है, जिसका मुख बड़ा सुंदर, नेत्र बड़े रसीले और नासिका बड़ी सुडौल है । उसका स्वर अति गंभीर है और वह इधर-उधर झोले देकर हाथ भी खूब नचा सकता है । बस, वह जो कुछ कहता है, सब सुंदर और चित्ताकर्षक बन जाता है । उसका कथन मनोहर तथा मुग्ध-कर हो उठता है । यही गलती दुनिया करती है । कोई केवल अकेले सत्य की जांच नहीं करता । गीत के संबंध में कोई कुछ भी नहीं सोचता । मजलिस या सभा में किसी बात को पेश करने का ढंग अथवा अभिनय, बोलने का ढंग, वर्णनशैली, बाहरी चीजों की सजावट—ये सारी बातें, शिक्षा और उपदेश को इतना प्यारा, इतना मीठा और चित्ताकर्षक बना देती हैं कि श्रोता जो सुनता है, बिना विचारे व्यवहार में लाने लगता है, कहे गए को सच्चा मान लेता है ।
हाल ही में एक बड़े सज्जन मित्र, एक बड़े संभ्रांत श्रोता एक स्वामी विशेष, स्वामी विवेकानंद के संबंध में 'राम' से बातें कर रहे थे । प्रश्न पूछा गया, ''क्या उनकी नाक और नेत्र सुंदर नहीं थे ?'' आप व्याख्यानों पर ध्यान देते हैं या नाक और आंखों को देखते हैं ?
पर दुनिया का यही तरीका है । अधिकांश वक्ताओं के बोलने के ढंग में, वर्णन शैली में, आवाज में चित्ताकर्षण और जादू रहता है, वही जादू उनकी वक्तृता में आरोपित कर दिया जाता है । आप स्वयं चीजों और बातों को तौलें । वक्ता की देह की अपेक्षा, वास्तविक वक्ता पर अधिक ध्यान दें । ये शब्द कटु और कठोर मालूम पड़ते होंगे, किंतु 'राम' पुरुषों के शरीरों का आदर करनेवाला नहीं है । 'राम' तो आपका आदर करता है, आपका, जो आप सत्य रूप हैं । सत्य आपका वास्तविक स्वरूप है और इस अर्थ में 'राम' आपका आदर करता है । आप चाहे बोलने के ढंग को नापसंद करें, आप चाहे राम की वर्णन शैली को नापसंद करें, 'राम' तो महिलाओं और सज्जनों के रूप में अपने आपको कहता है ।
'राम' आपसे कहता है कि यदि आप सच्चा सुख चाहते हैं, यदि आप सच्ची शांति चाहते हैं, तो आपको 'राम' की वक्तृताओं पर ध्यान देना चाहिए, आपको उसके ये व्याख्यान सुनने ही चाहिए । वे आपको सुख देनेवाले होंगे । उनको तौलें । उन पर विचार करें, जो शब्द सुने, उन पर चिंतन करें । जब आप घर जाएं, तब उन्हें याद करने और उन पर अमल करने की कोशिश करें ।
'राम' वेदांतिक धर्म पर व्याख्यान देना चाहता था । किंतु यहां तो अनेक प्रश्न आए हुए हैं । ये प्रश्न उत्तर पाने के लिए 'राम' के पास भेजे गए हैं । ये सारे प्रश्न और वह प्रश्न भी जो कभी किसी को इस पृथ्वी पर सूझ सकता है, इस शहर में दिए जानेवाले व्याख्यानों में हल कर दिए जाएंगे । यदि 'राम' से कोई भी प्रश्न न पूछे जाएं, तो भी 'राम' वेदांत पर बोलता हुआ, एक के बाद एक प्रमेय पर विचार करेगा, जिनके द्वारा सब प्रश्नों का उत्तर यथासमय मिल जाएगा । किंतु कुछ लोग अपने प्रश्नों का उत्तर पहले चाहते हैं । आज रात में अथवा एक रात में हम इन सब प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकते । एक दिन में हम एक प्रश्न लेंगे और वही प्रश्न उस दिन के प्रवचन का विषय बन जाएगा । आज का विषय सबसे पहले पूछा गया प्रश्न है, अतः हम इसी को उठाते हैं ।
किंतु इसे प्रारंभ करने से पूर्व इंजील, कुरान, वेद और गीता के संबंध में कुछ शब्द कहे जाएंगे । लोग इन पुस्तकों को मानते हैं और इन पर आंख मूंदकर विश्वास करते हैं, क्योंकि वे ऐसे मनुष्य अथवा मनुष्यों की कलम से निकली हुई हैं, जिन्हें वे पसंद करते हैं । हजरत ईसा का चरित्र बड़ा उत्कृष्ट था, प्रभाव अत्यंत सुंदर था । उनके जो वृत्त बाइबल गास्पेल में दिए हुए हैं, वे ईसा के ही मुख से निकले हुए बताए जाते हैं, इसलिए हमें उन्हें जरूर मानना चाहिए ।
कृष्ण भगवान अत्यंत श्रेष्ठ थे और उनका चरित्र बड़ा उत्कृष्ट था । चूंकि गीता उनके मुख से निकली है, अतएव समग्ररूपेण पूर्णतः हमें उसे जरूर स्वीकार करना चाहिए । बुद्ध भगवान बहुत अच्छे थे और अमुक पुस्तक उन्होंने कही, अथवा कम से कम उनके द्वारा कही हुई बातें बताई गई है, अतएव हमें अवश्य ही पूरा विश्वास करना उचित है, उनमें सोचने-विचारने का भला क्या स्थान हो सकता है ?
हमें चिंतन छोड़कर उसी तथ्य को इसलिए स्वीकार कर लेना चाहिए कि वह उन महापुरुषों से प्राप्त हुआ है । क्या यह वैसी ही चूक नहीं है, क्या यह वैसी ही भूल नहीं है जो कुछ मिनट पहले दर्शाई गई उक्त गायिका के दर्शकों और श्रोताओं ने की थी ? ठीक वही गलती ।
वक्ता का उपदेश एक चीज है और उसका चरित्र तथा उसके शरीर का सौंदर्य दूसरी चीज । प्रायः ऐसा देखा जाता है कि व्यक्ति विशेष अपने समय का सर्वोत्कृष्ट व्यक्ति होता है, किंतु उसकी शिक्षाएं अपूर्ण रहती हैं । दुनिया की सारी दलबंदियों का आधार यही भूल, यही भ्रांति है । दुनिया के सभी धार्मिक लड़ाई-झगड़े और संग्राम इसी भूल के परिणाम हैं । आप जानते होंगे कि ओलिवर गोल्डस्मिथ एक ऐसा मनुष्य था, जिसके संबंध में डॉक्टर जॉनसन ने कहा था कि उसकी लेखन शैली देवदूतों जैसी थी, वह एम.डी. ( डॉक्टरी ) की सबसे ऊंची परीक्षा उत्तीर्ण भी था । वही ओलिवर गोल्डस्मिथ भोजन और बातचीत तो ठीक ढंग से करता था, किंतु अपने भोजन और बातचीत के प्रकार का वर्णन करते समय वह जिद किया करता था कि भोजन या बातचीत करते समय मैं नीचे का जबड़ा कभी नहीं हिलाता हूं । उसकी राय थी कि हमेशा ऊपर का ही जबड़ा चलता है और नीचे का नहीं । इस विषय पर डॉक्टर जॉनसन से उसका बड़ा वितंडवाद हुआ था । अपने इस भ्रांत कथन की पुष्टि में वह बड़ा दुराग्रही था ।
आजकल प्रत्येक व्यक्ति जान सकता है कि जब हम बातचीत करते हैं या खाते हैं, तब सदा नीचे का ही जबड़ा चलता है, ऊपरवाला कभी नहीं चलता । हां, जब हम पूरा सिर घुमाते हैं, तब बेशक ऊपरी जबड़ा चलता है । लेकिन उसका पक्ष था कि नीचे का जबड़ा कभी नहीं चलता, ऊपर का ही जबड़ा काम करता है ।
जहां तक व्यावहारिक क्रिया का संबंध था, वह बिल्कुल ठीक था, किंतु स्वयं अपना अनुभव, स्वयं अपनी कार्य शैली, स्वयं अपना जीवन यह वर्णन नहीं कर सकता था । आप जानते हैं कि किसी काम का करना एक बात है और उस काम की विधि का विज्ञान प्राप्त करना दूसरी बात । हर एक व्यक्ति अंग्रेजी बोलता है, किंतु अंग्रेजी व्याकरण थोड़े ही लोग जानते हैं । हर एक व्यक्ति किसी न किसी रूप में तर्क करता है, किंतु तर्कशास्त्र थोड़े ही लोग जानते हैं अथवा आनुमानिक या आनुषंगिक तर्कशास्त्र (Deductive or Inductive Logic) का अध्ययन बहुत थोड़े ही लोग करते हैं ।
इसी तरह आदर्श जीवन व्यतीत करना एक बात है और उसके तत्वज्ञान का निरूपण करने की योग्यता, उसके लिए युक्तियां उपस्थित करने की योग्यता दूसरी चीज है । लोग यही भूल करते हैं । वे आचार्यों के शारीरिक या व्यक्तिगत आचरण को उनके उपदेशों की सुंदरता मान बैठते हैं और आचार्यों के गुलाम बन जाते हैं । 'राम' कहता है, सावधान ! सावधान !!
हजरत ईसा के पास पुस्तकें न थीं । तब भी बड़े-बड़े शास्त्री और महामहोपाध्याय बाइबिल में लिखे उपदेशों की व्याख्याओं पर माथापच्ची किया करते हैं । हजरत मोहम्मद ने उत्तमोत्तम बातें कही हैं । उन लोगों को दिव्य प्रेरणा कहां से प्राप्त हुई थी, यह ज्ञान उन्हें कहां से मिला था ? इसे उन्होंने स्वयं उस भंडार से प्राप्त किया था, जो आपके भीतर भी है ।
महर्षि मनु के पास ऐसी पुस्तकें कहां थीं, किंतु उन्होंने हिंदुओं को धर्माचरण पर एक सुंदर ग्रंथ प्रदान किया । कविश्रेष्ठ होमर के पास बहुत थोड़ी पुस्तकें थीं, तब भी उसने जो महाकाव्य इलियड एंड ओडीसी (Iliad and Odyssy) आपको दिया, उसका सभी भाषाओं में अनुवाद हो रहा है । अरस्तु (Aristotle) न तो एम.ए. था और न कोई धर्माचार्य, तब भी एम.ए. के विद्यार्थियों को उसकी पुस्तकें पढ़नी पड़ती हैं ।
क्राइस्ट और कृष्ण को दिव्य प्रेरणा (Inspiration) कहां से मिलती थी ? भीतर से । यदि वे लोग भीतर से ज्ञान प्राप्त कर सकते थे, तो क्या आप ऐसा नहीं कर सकते ? अवश्य ! आप भी ऐसा कर सकते हैं । वह मुख्य स्रोत, वह भंडार, वह निर्झर, जिससे उन्हें प्रेरणा मिली थी, आपके अंदर भी है और ठीक उसी प्रकार । यदि यही बात है, तो उस जल के लिए क्षुधा और पिपासा क्यों, जो सहस्त्रों वर्षों पूर्व इस दुनिया में लाया गया था और जो अब बासी हो गया । आप भी सीधे अपने अंदर धंस सकते हैं और छक कर अमृत पी सकते हैं । निर्झर स्रोत तो आपके अंदर भी है ।
'राम' कहता है—भाइयो और मेरे स्वरूपो ! वे लोग उन दिनों जीवित थे, आप आज जिंदा हैं । सहस्त्रों वर्षों के रखे हुए सुरक्षित मुर्दे न बनें । जीवित को मृतक के हाथ में न सौंपें । दिव्य भोजन, कल्याणकर सुधा, आपके अंदर है । प्राचीन लोगों की पुस्तकें जब भी उठाएं, तब उन्हें इस विश्वास से न उठाएं कि उन पुस्तकों में दिए हुए प्रत्येक शब्द के गुलाम बन जाएं । स्वयं सोचें, स्वयं चिंतन करें । जब तक आप उन बातों का अनुभव नहीं करेंगे, जब तक आप स्वयं उन बातों को व्यवहार में नहीं लाएंगे, जब तक अपने ही जीवन से आप उनके सत्यासत्य का निर्णय नहीं करेंगे, तब तक आप क्राइस्ट के उपदेशों का अभिप्राय नहीं समझ सकते, तब तक आप नहीं जान सकते कि वेदों का क्या अर्थ है, गीता का क्या अभिप्राय है, ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल का क्या मंतव्य है ।
कहावत है कि मिल्टन को समझने के लिए, मिल्टन की जरूरत होती है । क्राइस्ट को समझने के लिए, क्राइस्ट बनना पड़ेगा । कृष्ण को हृदयंगम करने के लिए कृष्ण बनना पड़ेगा और बुद्ध को समझने के लिए बुद्ध बनना पड़ेगा । 'बनने' का क्या अर्थ है ? बुद्ध होने के लिए आपको भारतवर्ष में पैदा होना चाहिए ? नहीं, नहीं । क्राइस्ट होने के लिए क्या आपको जूडिया में पैदा होना होगा ? नहीं । मोहम्मद होने के लिए, क्या आपका अरब में पैदा होना जरूरी है ? नहीं । बुद्ध कैसे बना जा सकता है, ईसा कैसे बना जा सकता है, मोहम्मद कैसे बना जा सकता है ? एक छोटी-सी कहानी इसका स्पष्टीकरण करेगी ।
कोई मनुष्य एक प्रेम-काव्य, एक सुंदर काव्य जिसमें लैला और मजनू के प्रेम का उपाख्यान अंकित था, पढ़ा करता था । उसे उस काव्य का नायक मजनू इतना भाया कि उसने मजनू बनने का प्रयत्न किया । मजनू बनने के लिए उसने एक ऐसा चित्र लिया, जिसके संबंध में उससे कहा गया था कि यह उसी काव्य की नायिका ( लैला ) का चित्र है । उसने बड़े आदर से वह चित्र उठाया, उसे गले लगाया, उसके लिए आंसू गिराए, अपने हृदय से चिपकाया । वह कभी उसे छोड़ना जानता ही न था, किंतु आप जानते हैं कृत्रिम प्रेम बहुत दिनों तक नहीं टिक सकता । यह तो बनावटी प्रेम था । स्वाभाविक प्रेम की नकल नहीं की जा सकती और वह प्रेम का स्वांग भरने की चेष्टा कर रहा था । एक आदमी उसके पास आया और उससे कहने लगा कि भाई ! तुम यह क्या कर रहे हो ? मजनू बनने का तो यह ढंग नहीं है । यदि सचमुच तुम मजनू बनना चाहते हो तो तुम्हें मजनू की प्रेयसी लेने की जरूरत नहीं, तुममें मजनू का असली आंतरिक प्रेम होना चाहिए । प्रेम के उस पात्र की तुम्हें जरूरत नहीं, तुम्हें तो आवश्यकता है उतने ही तीव्रतम प्रेम की । तुम्हारा अपना स्वतंत्र प्रेमपात्र हो सकता है, तुम अपनी नायिका स्वयं चुन सकते हो, तुम स्वयं अपनी प्यारी चुन सकते हो, किंतु तुममें भावना और प्रेम की वही तीव्रता होनी चाहिए जो मजनू में थी । सच्चा मजनू बनने का एकमात्र उपाय यही है ।
इसी तरह 'राम' तुमसे कहता है—यदि तुम ईसा, बुद्ध, मोहम्मद या कृष्ण बनना चाहते हो, तो उन कामों की नकल करने की आवश्यकता नहीं, जो उन्होंने किए थे, उनकी आचरण पद्धति के दास होने की तुम्हें जरूरत नहीं । यह आवश्यकता नहीं कि तुम अपनी स्वतंत्रता उनके कृत्यों और कथनों के हाथ बेच डालो, तुम्हें तो उनका चारित्र्य बल उपलब्ध करना होगा, तुम्हें उनकी भावनाओं की अतिशयता को प्राप्त करना होगा, तुम्हें उनकी गंभीर प्रकृति, उनकी सच्ची शक्ति प्राप्त करनी होगी ।
यदि तुम अपने जीवन में वही भाव व्यक्त कर सको, तो अभी-अभी तुम्हारे समक्ष जो परिस्थिति और वातावरण है, वह जरूर बदल जाएगा । क्राइस्ट का यदि आज जन्म होता, तो वह क्या करता ? क्या वह फिर अपने को सूली पर चढ़ाता ? नहीं । तुम ईसा बनकर भी जीते रह सकते हो । क्राइस्ट ने अपने विश्वास के पीछे अपनी देह को सूली पर लटकवाया और शोपेनहावर ने अपने विश्वासों के लिए अपनी देह को जीवित रखा । कभी-कभी अपने विश्वासों के पीछे जीना अपने विश्वासों के लिए मर जाने से अधिक कठिन होता है ।
बस, अब इस प्रस्तावना का मर्म यों व्यक्त किया जा सकता है—''हर एक वस्तु का विचार उसके गुण-दोषों के अनुसार करो, आचार्य के व्यक्तित्व को आचार्य के जीवन को, उसके उपदेशों से मत मिलाओ । उसके उपदेश और जीवन को हमें पृथक-पृथक समझना चाहिए ।''
अब पहला प्रश्न यह है, ''यदि पुनर्जन्म सत्य है तो क्या इसके द्वारा पारिवारिक बंधन नहीं टूट जाते ? इसी प्रश्न का एक दूसरा हिस्सा भी है—जो इस जीवन में एक साथ गुथे हुए हैं, क्या वे फिर सूक्ष्म जगत परलोक में नहीं मिलेंगे ?''
यह एक सुंदर प्रश्न है । हम इसके हर एक अंश पर क्रम से विचार करेंगे । ''यदि पुनर्जन्म सत्य है, तो क्या यह पारिवारिक बंधनों का टूट जाना नहीं है ?''
'राम' केवल इतना जानना चाहता है कि क्या इस संसार में सचमुच पारिवारिक बंधन हैं ? क्या आप पारिवारिक बंधनों से बंधे हैं ? एक मनुष्य के एक लड़का हुआ, जो अपने बाप के साथ तभी तक रहता है, जब तक नाबालिग है । बच्चा सयाना होता है, अच्छी आमदनी का पद पा जाता है और अपने बाप से अलग रहना शुरू कर देता है । भला, लड़के के वेतन से बाप क्यों लाभ उठाए ? बंधन तड़ाक से तोड़ दिया जाता है । लड़के के पास अपना स्वयं एक कुटुंब हो जाता है । हो सकता है कि पुत्र भारत, जर्मनी या किसी दूसरे देश में चला जाए और पिता किसी दूसरे देश में । बताओ, पारिवारिक बंधन कहां है ?
हां, पारिवारिक बंधन हैं, किंतु केवल नाम के । मैं जॉन एस. (John S.) हूं, मेरा पिता जार्ज एस. (George S.) था । नाम केवल नाम है । नाम में क्या रखा है ? आओ, देखें कि क्या सचमुच कोई बंधन है ?
एक लड़का यहां पैदा हुआ और एक लड़की कहीं अन्यत्र पैदा हुई । एक अमेरिकन है, दूसरी जर्मन । उनका विवाह होता है । कन्या का पारिवारिक बंधन किसी एक जगह था, लड़के का पारिवारिक बंधन किसी दूसरी जगह । उन दोनों का विवाह हुआ । अब बताओ, पुराने बंधन कहां चले गए ? अब एक गांठ लग गई । एक समय ऐसा भी आ जाता है, जब उनका विवाह विच्छेद हो जाता है । दोनों फिर अलग-अलग ब्याह करते हैं । बंधन कहां है ? क्या तुम उनको स्थिर, अचल रख सकते हो ?