रात्रि काफी बीत चली है। तुलसीदास विचारमग्न हैं। मन में दूर-दूर तक शान्ति नहीं है। तुलसी जान गये कि सांसारिक विषयों और राम में से किसी एक को चुनने का समय आ गया है। अब तक इतनी आयु व्यर्थ ही नष्ट हो गयी। परन्तु अब शेष नहीं होने दूँगा। श्रीराम की कृपा से संसार रूपी रात्रि बीत गयी है। अब जागने पर माया का बिछौना नहीं बिछाऊँगा —
"अब लौं नसानी, अब न नसैहों।"
राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे फिर न डसैहों।।
पायों नाम चारू चिन्ता मनि, उर कर ते न खसैहों।
स्याम रूप सुचि रूचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहों।।
परबस जानि हँस्यो इन इन्द्रिन निज बस हवै न हसैहों।
मन मधुकर पनकैं तुलसी, रघुपति कमल बसैहों।।
तुलसी के मन में उठ रहा बवन्डर समय बीतने के साथ-साथ प्रचण्ड होता जा रहा था। तुलसी ने ठान लिया — जब तक मैं इन इन्द्रियों के वश में रहा उन्होंने मनमाना नाच नचाया मेरी बड़ी हँसी उड़वायी परन्तु अब मैं ऐसा नहीं होने दूँगा। मन के जहाज को अब गंतव्य तक पहुँचा कर ही रहूँगा।
मन के भावों को किनारे लगा तुलसी सो रही पत्नी के समीप पहुँचे। तुलसी उसका मुख निहारने लगे, परन्तु अब उनकी दृष्टि में आसक्ति नहीं केवल श्रद्धा थी। दबे पाँव तुलसी ने पत्नी के चरणों के पास पहुँच शिष्यवत् प्रणाम किया। रत्नावली के मुख पर अन्तिम बार दृष्टि डाल तुलसी बाहर निकल आये।
चलते-चलते रात्रि बीत गयी। रह-रहकर भटकाव भरे विचार एक के बाद एक आ कर मन को मथते जा रहे हैं। बाल्यावस्था से अब तक के जीवन को एक क्रम में जोड़कर देखते हैं। तो दुःखों के अतिरिक्त कुछ नहीं दीखता।