श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

राजापुर पहुँचते-पहुँचते रात्रि हो गयी।

तुलसी चरित (कथा)

राजापुर पहुँचते-पहुँचते रात्रि हो गयी। आकाश में घिरे श्याम वर्णी मेघों के मध्य रह-रह कर दामिनी चमक रही थी। तीव्र स्वर के साथ एक दूसरे से टकराते मेघों के मध्य चमकने वाली विद्युत एक विचित्र सा कम्पन उत्पन्न कर रही थी। गाँव पहुँच कर तुलसी विचलित हो गये। इतने दिनों के प्रवास के बाद आज यदि वह घर लौटे भी तो रत्ना उनकी अनुमति के बिना ही मायके चली गयी।

अनन्यमनस्क तुलसी इधर उधर टहलने लगे। बार-बार मन को समझाते परन्तु मन का विचलन जाता न था। कई बार सोने का उपक्रम करते परन्तु फिर-फिर उठ कर बैठ जाते।

इसी प्रकार व्यग्रता में रात्रि बीतने लगी। तुलसी ने विचारा कि ससुराल कौन सी दूर है? यमुना पार करते ही अगले गाँव में रत्ना का घर है। कुछ ही समय में पहुँच जायेंगे।

तीव्र वर्षा और हवा के झोंकों से तुलसी के पग रह-रह कर इधर-उधर पड़ने लगते हैं। वस्त्र गीले हो कर शरीर से चिपक गये हैं। ऐसे भयावह मौसम की अर्धरात्रि में तुलसी यमुना की ओर बढ़ते जा रहे हैं। घाट पर पहुँच एक डोंगी वाले को बड़ी कठिनाई से यमुना पार कराने को तैयार किया। वर्षा तीव्र होती जा रही थी। कई बार डोंगी उलटते-उलटते बची।

डोंगी पार लगते ही नाविक को यथोचित धन देकर तुलसी ससुराल की ओर चल दिये। द्वार पर पहुँच काफी देर तक खटखटाने के पश्चात द्वार खुला। इतनी रात गये ऐसे मौसम में भीगे वस्त्रों में लिपटे पति को सामने देख रत्ना हतप्रभ रह गयी।

"स्वामी! इस अर्द्धरात्रि में आप यहाँ?" "पहले वस्त्र बदल लूँ फिर बताता हूँ।" भीगे वस्त्र बदलते हुए तुलसी बोले — "तुम जानती हो रत्ना! मैं तुम्हें देखे बिना क्षण भर भी नहीं रह सकता।"

रत्नावली विदुषी महिला थीं। प्रिय के प्रेम को पहचान गयीं। बोली — "इतनी रात्रि में उफनती हुयी यमुना को पार कर अपने जीवन को दाँव पर लगाने का कारण मुझसे प्रेम है या कुछ और?" रत्नावली उलाहना देते हुए बोली — "सत्य तो यह है कि आपकी आसक्ति मुझ में नहीं। जीव में बसे राम में नहीं वरन् मेरी अस्थि, चर्म, रक्त और माँस से निर्मित इस देह में है —

अस्थि चर्म मय देह यह, ता पर जितनी प्रीति।
तिसु आधी जो राम प्रति, अवशि मिटे भव भीति।।

रत्ना की बातें बाण की भाँति तुलसी के हृदय में लगीं। तुलसी गहरे विचार में डूब गये। काफी देर तक तुलसी शान्त बैठे रहे।

"नहीं रत्ना! रूठा नहीं!" तुलसी के गंभीर स्वर जैसे किसी गहरे कुएँ से निकल रहा था — "सोच रहा हूँ तुम्हारे माध्यम से मुझे स्वयं सरस्वती ने जो ज्ञान दिया है वह वेद और शास्त्र सम्मत ही है। मैं इसी क्षण तुम्हें अपना गुरू मानता हूँ।" "मेरा अपमान न कीजिए।" रत्नावली का कंठ भर आया। "नहीं रत्ना! यह तुम्हारा अपमान नहीं। तुम्हारे भीतर बैठे राम ने मुझे पतन से बचा लिया। मैं तुम्हारा यह उपकार जीवन भर नहीं भूलूँगा। मैं तुम्हें अपना गुरू मानता हूँ।" तुलसी गंभीर थे।

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