तुलसी अब अपने मन की सीमा-रेखा खींच चुके थे। हनुमान जी के दर्शनों के पश्चात रही सही कामनायें भी निस्तेज हो चली थीं। राम को पाने की चाह दृढ़ होती रही। एक दिन तुलसीदास परिक्रमा के लिए जा रहे थे तभी उन्हें मार्ग में दो राजकुमार दिखायी दिये। अति सुन्दर लग रहे दोनों राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर वन में आखेट के लिए जा रहे थे। उनकी सुन्दरता ने तुलसी का मन मोह लिया। परन्तु तुलसीदास सोचने लगे कि वन प्रदेश में ऐसे राजकुमार तो प्रायः घूमते ही रहते हैं।
सोचते हुए तुलसी आगे बढ़ते जा रहे हैं कि तभी उनके सम्मुख हनुमान जी प्रकट हुए — "क्यों तुलसीदास जी हो गये राम दर्शन? अब तो आप सन्तुष्ट हैं ना?" तुलसीदास ने हनुमान जी को प्रणाम कर विस्मयपूर्वक पूछा — "कब गुरुदेव?" "दो घोड़ों पर सवार राजकुमार जो अभी आपके सामने से निकले वही तो प्रभु थे। लखनलाल के साथ।" हनुमान जी बोले।
"क्या? वे प्रभु थे?" तुलसी घबरा कर बोले — "मैंने तो उन्हें साधारण राजकुमार समझा था। मैं उन्हें पहचान ही नहीं पाया।" हनुमान जी हँसकर बोले — "यह कलिकाल है तुलसी जी! प्रभु साक्षात् दर्शन किसी को नहीं देते।" तुलसीदास बाबा घबरा उठे — "नहीं गुरूदेव! एक बार। केवल एक बार पुनः कृपा करें।" तुलसीदास की विनय को दयानिधान हनुमान जी टाल न सके — "ठीक है, अब आप रामघाट पर पधारें और वहाँ प्रतीक्षा करें। वहीं पर किसी समय प्रभु अवश्य कृपा करेंगे।"
हनुमान जी को प्रणाम कर तुलसीदास मन्दाकिनी तट पर बने रामघाट पर आ गये। समय बीतने के साथ-साथ तुलसी बाबा के मन में राम दरश की चाह भी बढ़ती जा रही है। व्यग्रता बढ़ जाती है तो गाने लगते हैं —
लोचन रहे बैरी होय!
कर्म हीनहि पाई हीरा दियो पल में खोय।
तुलसीदास जु, राम बिछुरे, कहो कैसी होय।।