श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

मौनी अमावस्या — रामघाट पर राम दर्शन

तुलसी चरित (कथा)

मन्दाकिनी तट पर बने रामघाट पर एक वृक्ष के नीचे राम-राम जपते हुये तुलसीदास चन्दन घिस रहे हैं। मौनी अमावस होने के कारण घाट पर बहुत भीड़ है। जब से साँवले राजकुमारों के दर्शन हुए हैं, तभी से तुलसी की राम जी के दर्शन पाने की अभिलाषा निरन्तर बढ़ती चली जा रही है।

जिस वृक्ष के नीचे तुलसीदास बैठे हैं उनके ऊपर हनुमान जी शुक (तोते) के रूप में आ पहुँचे हैं। वे चाहते हैं कम से कम आज तो तुलसीदास जी को धोखा न हो, इसीलिए वे सुअवसर देख प्रभु का भेद बताने आ पहुँचे।

"बाबा! थोड़ा सा चन्दन हमें भी देंगे?" किसी बालक का मधु से भी मीठा स्वर सुन तुलसी बाबा ने शीश उठाकर देखा तो किशोर वय के दो बालक दिखायी दिये। "क्यों नहीं मेरे नन्हें प्रभुओं! अवश्य लीजिए।" तुलसी बाबा की दृष्टि उन राजकुमारों के रूप से हटती न थी। आयु में बड़े दिखायी देने वाले किशोर ने बाबा के हाथ से चन्दन की कटोरी ले ली। दोनों किशोर अपने मस्तक पर तिलक लगाते हैं।

"बाबा! आप सबको तिलक लगाते हैं, हम आपको तिलक लगा दें?" बड़े दिखायी देने वाले उस किशोर ने मधुर स्वर में पूँछा। "हाँ-हाँ, क्यों नहीं।" तुलसी बोल उठे। बालक तुलसी दास को तब तक चन्दन लगा देता है।

तुलसीदास कहीं पुनः अवसर न चूक जायें, इसीलिए वृक्ष पर शुक रूप में विराजमान हनुमान जी बोल उठे —

'चित्रकूट के घाट पर भई सन्तन की भीर।
तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुवीर।।'

तुलसीदास अवाक!! "तिलक देत रघुवीर??" तुलसी बाबा चौंक कर जब तक वृक्ष की ओर देखते तब तक हैं, दोनों किशोर अन्तर्ध्यान हो जाते हैं। हनुमान जी प्रकट हो कर पूछते हैं — "अब तो सन्तुष्ट हैं बाबा? हो गये दर्शन?" तुलसीदास नतमस्तक थे — "यह केवल आपकी कृपा से ही संभव हुआ है, गुरूदेव! परन्तु मुझे छद्म नहीं साक्षात् दर्शन चाहिए।" "वह भी हो जायेंगे। धैर्य रखिये और प्रभु को स्मरण कीजिए।" कह कर हनुमान जी अन्तर्ध्यान हो गये।

संवत् 1628 — तुलसी बाबा अपनी कुटिया में बैठे भजन कर रहे हैं। तभी हनुमान जी उन्हें दर्शन देते हैं। प्रणाम करने के बाद बाबा ने उनसे सेवा पूँछी तो हनुमान जी बोले — "जब श्रीराम अपनी लीला का संवरण कर अपने धाम जा रहे थे तो अवध की सारी प्रजा को अपने साथ ले गये। यहाँ तक कि सीता जी की निन्दा करने वाले धोबी को भी। अपने भक्त की कलियुग में रक्षा करने और अयोध्या की देखभाल के लिए मुझे छोड़ गये। जब मैंने उनके बिना धरती पर रहने का आधार माँगा तो अपनी कथा को श्रवण, चिन्तन और मनन करने को ही प्रभु ने मुझे आधार बनाने का आदेश दिया। अब तक तो मैं रामकथाओं के माध्यम से पृथ्वी पर टिका हुआ हूँ परन्तु अब कलिकाल के बढ़ते प्रभाव से देव भाषा संस्कृत को जानने वाले कम हो गये हैं, जिसके कारण कथा के आयोजनों में भी जनरूचि घटती जा रही है। और मैं रामकथा के बिना नहीं रह सकता।"

"गुरूदेव मैं इसमें आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?" तुलसीदास ने पूछा। "आप केवल इतना करें कि संस्कृत भाषा में छपी हुयी रामकथा को लोक व्यवहार में बोली जाने वाली भाषा में रच दें।" हनुमान जी बोले — "ताकि सभी लोग सरलता से रामचरित्र को जान सकें और उन चरित्रों को अपने व्यवहार में लाकर अपना यह लोक तथा परलोक सुधार सकें। इन कथाओं के माध्यम से मुझे भी पृथ्वी पर टिके रहने का आधार मिला रहेगा।"

"किन्तु गुरूदेव! आपकी सहायता और कृपा के बिना यह गुरुतर कार्य संभव नहीं हो सकेगा।" तुलसी बाबा ने निवेदन किया। "उसके लिए मैं सदैव प्रस्तुत रहूँगा। आप अभी से सभी रामायणों और ग्रन्थों का अध्ययन प्रारम्भ कर दें जिससे कि समय आने पर रामायण की लोक भाषा में रचना कर सकें।" हनुमान जी बोले। "आपकी आज्ञा शिरोधार्य है गुरूदेव!" हनुमान जी को दण्डवत करते हुये तुलसी बाबा बोले।

समय बीतता रहा। तुलसी बाबा अध्ययनरत हैं। एक दिन रत्नावली भेंट करने आयी। पहले तो उन्होंने भेंट करने से ही मना कर दिया। परन्तु रत्नावली के बार-बार केवल दर्शन करने के आग्रह को टाल न सके। कभी सुन्दरता की परिभाषा को सार्थक करने वाली रत्नावली का मुख अब निस्तेज हो चुका है। पति को देखते ही वर्षों से बँधा धैर्य का बाँध नेत्रों की दीवार तोड़ कर बह निकला। अश्रु थमने का नाम ही नहीं लेते। कंठ भी भर आने से अवरूद्ध हो गया।

तुलसीदास पत्नी की स्थिति से अपरिचित न थे। कोई भी स्त्री पति के बिना कैसे रहती होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन न था। रत्ना को सहानुभूति बँधाते हुए तुलसी गंभीर स्वर में बोले — "रत्ना!" रत्नावली ने धीरे से सिर ऊपर उठाया। पति के नेत्रों पर दृष्टि पड़ते ही मन अपनी विकलता को सह न सका। रत्ना की व्यथा सिसकियों में पिघलने लगी। "क्यों आयी हो?" तुलसी ने पूछा। "आश्रय चाहती थी।" रत्ना ने सिसकते हुये उत्तर दिया।

महीनों के परिश्रम से जमाया हुआ तप कहीं रत्ना की स्थिति देख द्रवित न हो जाये, इसलिए तुलसी न चाहते हुये भी कठोर हो गये — "आश्रय राम से माँगो रत्ना। मैं अब गृहस्थ नहीं विरक्त हूँ।" "आप अब भी मुझसे रूष्ट हैं।" रत्ना बोली। "अब इन बातों का कोई अर्थ नहीं रह गया है रत्ना।" तुलसी ने स्वर को भरसक संभालने का प्रयास किया — "मैं तुम्हारा ऋणी हूँ जो तुमने मुझे राम की शरण में भेज दिया। मैं तुम्हारा उपकार आजीवन नहीं भूल सकता।" "ऐसा न कहें और घर चलें।" रत्ना ने प्रार्थना की। "मेरा अब कोई घर नहीं। कोई पत्नी या परिवार नहीं।" तुलसी दृढ़ थे। "तो मुझे आप अपने साथ रख लें।" रत्ना ने निवेदन किया — "मैं आपके जप-तप, वैराग्य में बाधा नहीं बनूँगी।" "यह संभव नहीं रत्ना।" तुलसी अटल थे — "वैरागी के समीप नारी किसी भी रूप में रहे उसका वैराग्य सध नहीं पायेगा।"

काफी देर की मान-मनौवल के बाद भी तुलसी तनिक न पिघले। यद्यपि उनका वैराग्य अभी तक पूर्ण-रूपेण नहीं सधा था परन्तु राम के प्रति निष्ठा उन्हें रत्ना के प्रत्येक अनुरोध को टालने पर विवश कर रही थी। पति को मनाने के सारे प्रयास निष्फल होते देख रत्ना पति को झोली में रखी (सफेद गोपी चन्दन) कपूर आदि वस्तुयें रखते हैं तब स्त्री का त्याग उचित नहीं या मुझको भी इस झोली में डाल दीजिए अथवा विशुद्ध ज्ञान और वैराग्य को धारण कीजिए —

खरिया खरी कपूर सब उचित न पिय तिय त्याग।
कै खरिया मोहि मेलि कै, विमल विवेक विराग।।

"तुमने सही कहा रत्ना!" तुलसी के मुख पर निश्चय भारी चमक उभर आयी। "वैरागी जितना एकाकी रहे उतना ही श्रेष्ठ है। जब वैराग्य ही लक्ष्य है तो इन वस्तुओं के प्रति मोह भी उचित नहीं। लो इसी क्षण यह झोली झण्डा, कपूर, चन्दन सब त्यागता हूँ।" कहते हुये तुलसी ने तत्क्षण सब वहीं फेंक दिया। पति के हठ योग और वैराग्य के प्रति दृढ़ निश्चय को पहचान रत्नावली पति को प्रणाम कर अन्तः लौट गई।

← तुलसी अब अपने मन की सीमा-रेखा खींच चुके थे।अध्याय सूची पर वापस जाएँहनुमान जी की आज्ञा का पालन करने तुलसी बाबा अयोध्या की ओर चल पड़े। →