हनुमान जी की आज्ञा का पालन करने तुलसी बाबा अयोध्या की ओर चल पड़े। उन दिनों प्रयाग में माघ मेला लगा हुआ था। तुलसीदास जी ने कुछ समय वहीं रुकने का निश्चय किया। माघ पर्व के छह दिन पश्चात एक वट वृक्ष के नीचे उन्हें भारद्वाज और याज्ञवल्कय मुनि के दर्शन हुए। वहाँ उस समय वही रामकथा हो रही थे जो उन्होंने वाराह क्षेत्र में अपने गुरू नरहरि दास से सुनी थी। तुलसीदास जी ने अति श्रद्धापूर्वक कथा श्रवण की।
माघ मेले के समापन के पश्चात तुलसी अयोध्या पहुँचे। अयोध्या में रमललाहे के दर्शनों की इच्छा ले जब वे जन्मभूमि मन्दिर पहुँचे तो वहाँ बनी मस्जिद को देखकर उनकी आत्मा चीत्कार कर उठी। दासता का यह कैसा युग था? जन्मभूमि मन्दिर को तोड़ मुगल आक्रान्ता बाबर ने मस्जिद बना दी थी। सम्पूर्ण आर्यवर्त मुगलों का दास बना हुआ था।
मस्जिद बनने के बाद से ही राम भक्तों को अपने आराध्य की जन्मभूमि के पास भी नहीं जाने दिया जाता था। पूरे भारतवर्ष में रामनवमी श्रद्धा और आनन्दपूर्वक मनायी जाती परन्तु अयोध्या में तो जैसे यह दिन तलवार की धार पर चलकर आता। रामलला को बन्दी देख जन आक्रोश बढ़ने लगता। गाँव-गाँव से रामभक्त एकत्रित हो योजनायें बनाते और मस्जिद पर आक्रमण करते। कितने शत्रु मरते और कितने रामभक्त बलिदान देते इसकी कोई निश्चित गिनती न थी।
तुलसी बाबा की आत्मा चीत्कार कर उठी। उनके मन में यह स्थिति अत्यन्त क्षोभ उत्पन्न कर रही थी। परन्तु विवश थे। जन्मभूमि तक जाते और सिपाहियों द्वारा फटकारने पर चुपचाप लौट आते। प्रभु की जन्मभूमि की यह स्थिति देख बाबा रोने लगते। कुछ समय तक बाबा अयोध्या में कथा बाँचते रहे। कथा में जो अन्न, द्रव्य आ जाता वही जीविका का आधार बनता।