श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

मीराबाई का पत्र

तुलसी चरित (कथा)

तुलसी बाबा अपने निवास में भजन कर रहे हैं। एक राजस्थानी ब्राह्मण ने कुटिया में प्रवेश कर उन्हें प्रणाम किया और बताया — "मुझे मेवाड़ से मीराबाई ने आपके पास भेजा है। उन्होंने आपके लिए एक पत्र भेजा है जिसमें सभी बातें लिखी हुयी हैं। मीराबाई राणा साँगा के ज्येष्ठ युवराज भोजराज की राजरानी हैं। बाल्यावस्था से ही श्रीकृष्ण से प्रेम करने के कारण उन्हें अपना पति मान चुकी हैं। इधर कुछ समय से उनके पति तथा परिवार वाले उनकी भक्ति में बाधक बनने लगे हैं। इन बाधाओं से त्रस्त होकर मीराबाई ने आपकी बहुत चर्चा सुन आपको पितृ तुल्य जान आपसे परामर्श माँगा है कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए?"

मीराबाई के विषय में तुलसी बाबा जानते थे। मीरा का पत्र पढ़कर बाबा व्यग्र हो उठे। ऐसे भक्त हृदय की प्रभु ऐसी कठिन परीक्षा ले सकते हैं? धन्य हैं मीराबाई कि राज परिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने सांसारिक विषयों में मन नहीं लगाया। श्रीकृष्ण की अनन्य भक्तिन मीराबाई पूर्व में अवश्य ही कृष्ण की सखा रहीं होंगी।

संदेश वाहक ब्राह्मण के भोजन और विश्राम की व्यवस्था कर तुलसी बाबा मीराबाई को संदेश लिखने बैठ गये। उन्होंने विनय पत्रिका के पद लिखकर भेजे — "जाके प्रिये न राम वैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही।।" (देखें: विनय पत्रिका पृष्ठ, पद-1) कविता में लिखे संदेश से संतुष्ट हो बाबा ने मीराबाई के भेजे संदेश वाहक को उत्तर ससम्मान विदा किया।

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