होली बीते-बीते तुलसी बाबा ने 'जानकी मंगल' के रूप में एक प्रबन्ध काव्य की रचना पूर्ण कर ली। 'जानकी मंगल' में सीता-राम विवाह का अत्यन्त मधुर, सरस और सजीव वर्णन हुआ।
इधर ज्यों-ज्यों रामनवमी निकट आती जा रही है। त्यों-त्यों अयोध्या में उत्पात की आशंका बढ़ती ही जा रही है। रामभक्तों के दल के दल जन्मभूमि मुक्त कराने के लिए आपनी आहुति देने को तत्पर हैं किसी भी क्षण कुछ भी हो सकता है।
नवरात्रि आते-आते अयोध्या में मेघ तेजी से घुमड़ने लगे। शासन और रामभक्तों के मध्य टकराव की आशंका से इस बार ऐसा लग रहा था कि अवध में या तो बाबरी मस्जिद रहेगी या राम भक्त प्रजा। तुलसी बाबा भगवान से प्रार्थना करने लगे — "प्रभु कब अपने भक्तों की प्रार्थना सुनेंगे? अपने भक्तों को अपने स्वरूप के दर्शन करा दीजिए।"
श्रीराम ने जैसे अपने दास की प्रार्थना को सुन लिया। मुगल शासकों और हिन्दू प्रजा के मध्य टकराव की बातों के मध्य ही नगर में ढिंढ़ोरा पीटा गया कि — "दिल्ली से अकबर का आदेश आया है कि हिन्दू बाबरी मस्जिद में खाली स्थान पर चबूतरा बना कर वहाँ रामनवमी मना सकते हैं।"
सरकारी घोषणा सुनते ही जैसे अवध की प्रजा बावली हो गयी। तुलसी राम के प्रति नत-मस्तक हो गये। उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु गिरने लगे। चारों ओर श्रीराम की जय-जयकार होने लगी।
रामनवमी का दिन आते-आते तुलसी बाबा की व्यग्रता बढ़ने लगी। प्रातः बेला से ही मन में काव्यांकुर फूटने लगे। सब कुछ हनुमान जी के कहे अनुसार हो रहा था। वही रामजन्म का दिन, वही तिथि, नक्षत्र, ग्रह योग। श्री राम प्राकट्य वाले सभी संयोग उस दिन अयोध्या में उपस्थित थे। राम जन्म का समय आते ही श्री गणेश जी, माँ सरस्वती, भगवान शिव-पार्वती और हनुमान जी को स्मरण कर बाबा तुलसी ने श्रीराम चरित मानस का श्रीगणेश किया —
वर्णनामर्थ संघानां, रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्त्तारौ, वन्दे वाणी विनायकौ।।
भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्ध, स्वान्तः स्थामीश्वरम्।।
जो सुमिरत सिधि होय, गणनायक करिवर वदन।
करउ अनुग्रह सोई, बुद्धि राशि शुभ गुण सदन।।
मूक होइ वाचाल, पंगु चढ़इ गिरिवर गहन।
जासु कृपा सो दयाल, द्रवउ सकल कलिमल दहन।।
मैं पुनि निज गुरू सन सुनी, कथा सो सूकर खेत।
समुझि नहिं तसि बालपन, तब अति रहेऊँ अचेत।।
तदपि कहिं गुरू बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।
भाषा बद्ध करिबि मैं सोइ। मोरे मन प्रबोध जेहि होई।।
श्रीराम चरितमानस का रचना कार्य तीव्रता से आगे बढ़ रहा है। भोर होते ही दैनन्दिन कार्यों से निवृत्त हो तुलसी बाबा लिखने बैठ जाते। छन्द चौपाइयों, दोहों और श्लोकों की रचना प्रभु कृपा से इतनी सुन्दर होती कि कब भोर से दोपहर और दोपहर से सांझ हो जाती बाबा जान ही नहीं पाते। इधर रामघाट पर कथा वाचन भी चल रहा है। बाबा जो भी रचते राम कथा में सरस कंठ से रामचरण अनुरागी श्रोताओं को बड़ी तन्मयता से सुनाते। बाल काण्ड, अयोध्या काण्ड के पूर्ण होने के पश्चात इस समय तुलसी अरण्यकाण्ड लिख रहे हैं। लिखते समय बाबा के नेत्रों के सम्मुख वन के दृश्य चलायमान हो रहे हैं।
प्रभु राम जनक नन्दनी सीता तथा अनुज लक्ष्मण सहित वन में विचरण कर रहे हैं। यमुना किनारे के गाँवों के निवासी उन्हें देख-देख कर जीवन सार्थक कर रहे हैं। श्रीराम उनसे ऐसे मिल रहे हैं जैसे वे उनके जन्म से परिचित या सम्बन्धी हों। लिखते-लिखते तुलसी अपनी कल्पना में ऐसे डूब जाते हैं कि जैसे वे स्वयं उस स्थान पर उपस्थित हों। अपनी कल्पना में डूबे तुलसी एक छोटे तपस्वी के रूप में, जो मन वचन और कर्म से श्री राम चरण अनुरागी है, प्रभु के सम्मुख पहुँच जाते हैं। आराध्य के दर्शन पाते ही तुलसी भीगे नेत्रों से प्रभु के सम्मुख दण्ड के समान गिर जाते हैं। श्रीराम उन्हें उठाकर अपने हृदय से लगा लेते।