श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

काशी में

तुलसी चरित (कथा)

काशी में तुलसी बाबा अपने अभिन्न सखा गंगाराम के निवास पर ठहरे। वहीं उनका परिचय टोडरमल से हुआ। टोडरमल गंगापार के कई गाँवों के सम्पन्न, धर्मनिष्ठ जमींदार थे। तुलसी के व्यक्तित्व और काव्य कला से प्रभावित टोडर ने उन्हें अत्यन्त सम्मान दिया। गंगाराम और टोडरमल की सहायता से तुलसी ने काशी में अखाड़ों की स्थापना की। उनका मानना था कि यदि युवा सबल होंगे तो हमारे धर्म की ओर कोई आँख उठाकर देखने का दुस्साहस नहीं कर सकेगा। इन अखाड़ों में हनुमान जी की मूर्तियों की स्थापना की परम्परा भी तुलसी बाबा ने ही प्रचलित की। अनेक स्थान पर श्री रामलीलाओं का आयोजन, मंचन और प्रचलन भी बाबा जी के द्वारा ही हुआ।

इन सब सामाजिक कार्यों के साथ-साथ रामकथा वाचन भी चलता रहा। रामचरित मानस की चौपाईयों, दोहों पर आधारित रामकथा का मधुर, मार्मिक वर्णन तुलसी बाबा को काशी की गली-गली और जन-जन में लोकप्रिय करता चला गया। जन-जन के मानस पटल पर 'मंगल भवन अमंगल हारी' राम की छवि को तुलसी की मधुर, ओजपूर्ण वाणी ने ऐसा अंकित किया कि काशी में चारों ओर रामचरित मानस की गूँज ही सुनायी देने लगी।

'शैवनगरी काशी' में वैष्णव 'राम' की चर्चा पोंगा पंथियों को नहीं सुहायी। उधर तुलसी अपनी रामकथाओं से पंडों के पाखंड को खंडित करते जा रहे थे। शैव, वैष्णव, सगुण, निर्गुण सभी विचार धाराओं और पंथों के खलों ने मिलकर एक स्वर से तुलसी की निंदा करनी प्रारम्भ कर दी। देव भाषा संस्कृत के स्थान पर जन-भाषा हिंदी में रामायण की रचना और उसकी लोकप्रियता से पण्डों के धंधे पर चोट पहुँची थी। सो सब मिलकर प्रयास करने लगे कि कैसे तुलसी और रामायण की प्रतिष्ठा मिटायी जाये? इधर तुलसी की रामकथाओं में जन-जन को राम से जोड़ने का कार्य चल रहा था उधर षड़यन्त्रकारियों के मस्तिष्क में नित नूतन कुचक्र और योजनायें आकार ले रही थीं।

ऐसे ही एक दिन सब षड़यन्त्रकारियों ने मिलकर काशी नरेश के दरबार में एक स्वर से उन्हें तुलसी के विरूद्ध षड़यन्त्र बताया। काशी नरेश ने तुलसीकृत रामायण की प्रति मंगाकर स्वयं देखी परन्तु उसमें धर्म के विरूद्ध कोई बात नहीं दिखायी दी। पण्डों के बार-बार उकसाने पर काशी नरेश ने निर्णय दिया कि उनकी उपस्थिति में भगवान विश्वनाथ के मंदिर में शयन आरती के पश्चात सब वेद, पुराण और शास्त्रों के साथ रामचरित मानस को रख दिया जाये। तत्पश्चात मन्दिर में कोई नहीं रहेगा। दोनों पक्ष मन्दिर के बाहर अपने-अपने लोगों के साथ पहरा देंगे तथा मन्दिर के कपाट बन्द कर चाबी स्वयं नरेश अपने पास रखेंगे। भगवान विश्वनाथ का जो भी निर्णय होगा वह सर्वमान्य होगा।

बाबा विश्वनाथ के मन्दिर में शयन आरती के पश्चात सब ग्रन्थों के साथ रामचरित मानस रख, भगवान शिव से निर्णय देने की प्रार्थना कर ताला बन्द कर दिया गया। चाबी काशी नरेश ने स्वयं अपने पास रखी।

प्रातः होते ही मन्दिर के कपाट खुलने से पूर्व ही तुलसीदास जी तथा विरोधी पक्ष के लोगों सहित अनेक श्रद्धालु भी भगवान शिव के निर्णय को जानने की उत्सुकता के चलते मन्दिर के बाहर एकत्र हो गये। काशी नरेश की उपस्थिति में मन्दिर का द्वारा खोला गया। काशी नरेश आगे बढ़ कर देखा तो हतप्रभ रह गये। रात्रि में जिस रामचरित मानस को सब ग्रन्थों से अलग दूसरे स्थान पर रखा था उसे भोले बाबा ने स्वयं उठाकर सबसे ऊपर विराजमान कर दिया था। काशी नरेश ने भगवान शिव और रामचरित मानस को प्रणाम किया। दो पग आगे बढ़ कर नरेश ने जब रामचरित मानस को उठा कर देखा तो उसके ऊपर तीन शब्दों में भगवान शिव ने जैसे स्वयं हस्ताक्षर कर दिये थे — सत्यं-शिवं-सुन्दरं।

भगवान आशुतोष का निर्णय देख दुष्ट पण्डों के मुख ऐसे विवर्ण हो गये जैसे किसी ने सारा रक्त निचोड़ लिया हो। काशी नरेश, तुलसी बाबा और सभी श्रद्धालु 'हर हर महादेव!' की जय घोष करने लगे। पण्डों को झिड़कते हुये काशी नरेश ने आदेश दिया कि — "जिसके मन में भी शंका हो वह स्वयं देख ले। प्रत्यक्षं किं प्रमाणं! अब तुलसी बाबा अथवा श्री रामचरित मानस के विरोध में कोई स्वर नहीं उठना चाहिए।" सभी श्रद्धालु रामायण तथा तुलसी बाबा की जय-जयकार करने लगे।

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