इस घटना के पश्चात भी दुष्टों की कुचालें समाप्त नहीं हुयीं। वे तुलसी और उनकी रामायण को नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहते थे। तभी किसी ने सुझाव दिया कि स्वामी मधुसूदन जी सरस्वती इस समय काशी में सर्वमान्य तथा सबसे प्रतिष्ठित, अद्वैतवाद का समर्थन करने वाले, निर्गुण भक्ति शाखा के विद्वान तथा प्रतिपादक हैं। उनके पास चलकर प्रार्थना की जाये कि तुलसी ने उनके अद्वैतवाद को चुनौती दी है। सगुणराम की उपासना और प्रतिष्ठा से निर्गुण ब्रह्म के विरूद्ध तुलसी जन मानस में भ्रम फैला रहे हैं।
सारा कार्य योजनानुरूप हुआ। स्वामी मधुसूदन सरस्वती को ग्रन्थ और तुलसी के विषय में भड़काने के लिए इस प्रकार के तर्क-वितर्क और कुतर्कों का आश्रय लिया गया कि स्वामी जी ने अन्ततः कह दिया कि वे स्वयं ग्रन्थ का अध्ययन करने के पश्चात ही कोई निर्णय देंगे।
रामचरित मानस की प्रति मंगा स्वामी जी ने अध्ययन प्रारम्भ किया। स्वामी जी जैसे-जैसे रामायण पढ़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे पण्डों का झूठ उजागर होता जा रहा है। रामायण में तुलसी ने कहीं भी अद्वैतवाद का विरोध नहीं किया था अपितु वे तो कह रहे थे कि सगुणहिं अगुणहि नहिं कछु भेदा — "अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम वश सगुण सो होई।"
सम्पूर्ण रामायण पढ़ने के पश्चात भी स्वामी जी को शिवत्व से विरोध करते तुलसी कहीं नहीं दिखायी दिये — 'बिनु छल विश्वनाथ पद नेहू। रामभगत कर लच्छन ऐहू।' 'प्रभु समरथ सर्वज्ञ शिव, सकल कला गुण धाम।' केवल इतना ही नहीं वरन् तुलसी तो अपने आराध्य राम से ही कहलवा रहे हैं कि — "संकर भजन बिना नर गति न पावइ मोरि।" "शिवद्रोही मम दास कहावा। सो नर मोहिं सपनेहूँ नहिं भावा।।"
श्रीराम चरितमानस का अध्ययन सम्पन्न करते ही मधुसूदन सरस्वती जी जान गये कि इस दिव्य ग्रन्थ के प्रति काशी के विद्वान कहलाने वाले पण्डों का द्वेषपूर्ण आचरण केवल उनके मोह, मद में अंधे होने के कारण ही है। विद्वान कहलाने वाले इन प्रपंचियों का मिलन अन्तःकरण शुद्ध करने के लिए इस पवित्र ग्रन्थ का अनुमोदन करना उनके लिए नितांत आवश्यक है। अतएव उन्होंने मानस की प्रति पर यह श्लोक लिख दिया —
"आनन्द कानने हयास्मिन् जंगमस्तुलसी तरूः।
कविता मंजरी यस्क, राम भ्रमर भूषिता।।"
इस काशी रूपी आनन्द वन में तुलसीदास तुलसी का चलता फिरता पौधा है। उसकी कविता रूपी मंजरी अत्यन्त सुन्दर है, जिस पर श्रीराम रूपी भँवरा मंडराया करता है।
मधुसूदन सरस्वती जी के मत को भी तुलसी के पक्ष में जाता देख दुष्ट पण्डे बौखला गये। अबकी बार उन लोगों ने रामायण को ही चुरा लेने का निश्चय किया। निधुवा-सिधुवा नाम के दो चोरों को रामायण चुराने भेजा गया। रात्रि होते ही जैसे ही दोनों चोर कुटिया के पास पहुँचे, उन्हें दो किशोर वय राजकुमार कुटिया की पहरेदारी करते दिखायी दिये। पीताम्बर पहने धनुष-बाण हाथ में लिए दोनों किशोर अत्यन्त सुन्दर थे। रात भर उनके कुटिया की चौकीदारी करने के कारण दोनों चोर कुटिया के पास भी न फटक सके। रात भर उचक-उचक कर दोनों चोर किशोर पहरेदारों की सुन्दरता देखते रहे परन्तु चोरी का साहस न जुटा सके। प्रातः होते ही दोनों पहरेदार दिखायी नहीं दिये। चोर उनके दर्शन के लिए बावले हुए जा रहे थे। वे तुलसी बाबा की कुटिया में पहुँचे और उनसे दोनों राजकुमार जैसे दिखने वाले पहरेदारों को दिखाने का आग्रह करने लगे।
बाबा विस्मित होकर बोले — "मैं निर्धन साधु हूँ। मेरे पास ऐसा क्या है जो कोई चुरा लेगा और उसके लिये मुझे पहरेदार रखने पड़े।" उन चोरों ने बाबा से क्षमा माँगते हुए बताया कि वे धन नहीं चुराने आये थे। उन्हें काशी के कुछ पण्डों ने उनकी रामायण चुराने भेजा था। परन्तु उन दोनों पहरेदारों की रात भर कुटिया की रखवाली के कारण वे कुटिया में प्रवेश नहीं कर सके। उन किशोरों के दर्शन से उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी है। अब वे केवल उन पहरेदारों के दर्शन करना चाहते हैं। जैसे भी बन सके बाबा उनके दर्शन करा दें।
तुलसी बाबा जान गये कि अनुज लक्ष्मण के साथ स्वयं प्रभु राम रात भर उनकी कुटिया की पहरेदारी करते रहे। रात भर प्रभु को कितना कष्ट हुआ होगा। उनका अनुमान लगा, बाबा के नेत्र भर आये। बाबा तुलसी चोरों से बोले — "अरे पागलों! जिनके पीछे हमारे जैसे साधु घर-द्वार छोड़कर जगत भर की धूल फाँकते फिरते हैं और फिर भी जिनके दर्शन नहीं हो जाते, वे ही दोनों भाई राम और लक्ष्मण तुम्हें इतनी सरलता से दर्शन दे गये। स्वयं प्रभु रात भर अपने ग्रन्थ की रक्षा करते रहे। उनके दर्शनों के पश्चात कोई भी व्यक्ति पापी नहीं रहता। तभी तो तुम भी बार-बार प्रभु के दर्शन करना चाहते हो। जाओ अब सम्पूर्ण जीवन प्रभु की सेवा में लगाओ।"
दोनों चोर बाबा के चरणों में गिर पड़े। बोले — "बाबा! ऐसा आशीर्वाद दें कि उन युगल किशारे पहरेदारों के अतिरिक्त कोई हमारे मन प्राण में न बस सके।" दोनों चोरों को आशीर्वाद दे बाबा ने विदा किया। प्रभु की कृपा को स्मरण कर बार-बार बाबा के नेत्र सजल हो उठते। "उनके लिए प्रभु को रात भर कितना कष्ट उठाना पड़ा। रात भर प्रभु उनकी पहरेदारी करते रहे और वे आनन्दपूर्वक सोते रहे।"
तुलसी बाबा मानस की रक्षा के लिए चिन्तित हो उठे। अन्ततः उन्होंने अपना सारा सामान लुटा कर मानस को किसी सुरक्षित स्थान पर रखवाने का निश्चय किया। मानस सुरक्षित रहेगी तो प्रभु को भी उनकी पहरेदारी नहीं करनी पड़ेगी। एक भण्डारे का आयोजन कर बाबा ने सब साधु ब्राह्मणों, भिक्षुकों में वितरित कर दिया। अन्न, वस्त्र, द्रव्य और ग्रन्थ सब कुछ बाँट दिया।