सामान वितरित करते समय ही बाबा को एक व्यक्ति ने आकर बताया कि एक व्यक्ति बहुत देर से पुकार रहा है। आप उससे एक बार मिल कर उसकी प्रार्थना सुन लें। उस व्यक्ति ने बाबा को प्रणाम कर बताया कि वह अयोध्या का रहने वाला एक श्वपच (डोम — जो दाह संस्कार करते हैं) है। तुलसी बाबा राम के बहुत बड़े भक्त हैं इसलिए वह उनके दर्शन करने चला आया।
तुलसी बाबा ने जैसे ही सुना कि वह व्यक्ति राम भक्त है और उनकी नगरी अयोध्या से आया है बाबा ने उसे भुजाओं में भरकर हृदय से लगा लिया। वह व्यक्ति घबरा कर बोला — "बाबा! आप यह क्या कर रहे हैं? मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि मैं डोम हूँ अस्पृश्य हूँ। मुझे छूकर आप अपवित्र हो जायेंगे।" वहाँ उपस्थित लोग हतप्रभ होकर एक दूसरे का मुख देखने लगे। तुलसी बाबा का व्यवहार उनकी समझ से बाहर था।
"आप अस्पृश्य नहीं, परम पवित्र हैं।" बाबा ने कहा — "भगवान राम की नगरी में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति तो उनका पार्षद होता है फिर आप अपवित्र कैसे हो सकते हैं। प्रभु ने स्वयं शबरी से झूठे बेर खाये, निषाद राज से मित्रता की, गीध का उद्धार किया। उनकी दृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति सम है। आप अस्पृश्य नहीं हैं। आइये इस दुराग्रह को दूर करने के लिए आप मेरे यहाँ भोजन कीजिए फिर वार्ता होगी।"
बाबा ने उसे आसन पर बिठा भोजन कराया। उपस्थिति समुदाय में से कुछ एक लोगों ने विरोध किया तो बाबा बोले —
तुलसी भक्त श्वपच भलो, जपै रैन दिन राम।
ऊँचौ कुल केहि काम को, जहाँ न हरि का नाम।।
उस श्वपच को भोजन करा ससम्मान विदा किया गया। तुलसी के इस कार्य के प्रशंसक कम और आलोचक अधिक निकले। विरोधियों के अत्यन्त निन्दात्मक प्रचार का बाबा लक्ष्य बने। विरोध के स्वर अभी ठण्डे भी न हुए थे कि एक घटना और घट गयी। एक दिन तुलसी दास अपनी कुटिया में कुछ व्यक्तियों के साथ बैठे भजन चर्चा कर रहे थे तभी एक कृशकाय सा व्यक्ति लड़खड़ाता हुआ द्वार के पास आ पहुँचा। काँपते हाथ, सूखे अधर, विवर्ण मुख, निस्तेज आँखें। कोई भी लक्षण उसमें ऐसा नहीं था जो उसे दीनता की प्रतिमा न बनाता हो। संभल कर खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। काँपते स्वर में बोला — "है कोई राम का प्यारा! जो तीन दिन से भूखे इस गौ हत्यारे को राम के नाम पर भोजन करा सके?" क्षीण स्वर में उसने यही गुहार पुनः लगायी।
तुलसी बाबा उठ कर द्वार की ओर भागे। उसकी स्थिति देख बाबा सब जान गये। उनसे रहा न गया। भीतर लाकर उस व्यक्ति के हाथ पैर धुलाकर उसे भोजन कराने के लिए अपने पास बैठा लिया। उपस्थित लोगों में से कुछ न विरोध किया तो बाबा बोले — "पहले इसे भोजन करें, फिर इस महाअपराध का कारण पूछेंगे।"
भोजन कराकर बाबा ने उससे इस अपराध का कारण पूछा तो वह बोला कि अनजाने में उसके हाथों से चोट लगने से एक गाय की मृत्यु हो गयी जिसके कारण समाज तथा ब्राह्मणों ने उसे गाँव और समाज से बहिष्कृत कर दिया। तीन दिन से वह भूखा फिर रहा है। किसी ने रोटी का एक टुकड़ा तक नहीं दिया। बाबा ने अब भोजन कराकर उसकी प्राण रक्षा की।
उपस्थित लोगों ने तुलसी की इस बात के लिए अत्यन्त निंदा की कि ब्राह्मणों द्वारा समाज से बहिष्कृत व्यक्ति को अपने यहाँ भोजन कराकर उन्होंने न केवल अपराध किया है वरन् उसके चरण धोकर वर्ण व्यवस्था का अपमान किया है। तुलसी बाबा बोले — "संसार में जहाँ पाप संभव है वहाँ उसका प्रायश्चित भी उपलब्ध है। भूल हो जाना एक स्वाभाविक बात है परन्तु उसे स्वीकार कर पुनः भूल से बचना ही मनुष्य में उच्च गुणों के होने का लक्षण है। इस व्यक्ति से अपराध हुआ, यह स्वीकारता है; पुनः ऐसा न करने का संकल्प भी लेता है तो फिर यह पापी कहाँ रह जाता है।" नारद पाँचरात्रग्रन्थ के सनत्कुमार संहिता में लिखा है —
श्री रामेति परं जाप्यं तारकं ब्रह्म संज्ञकम्।
ब्रह्म हत्यादि पापध्निमति वेद विदो विदुः।
इसके अतिरिक्त श्रीमद् भगवत महापुराण, जो सब वेदों शास्त्रों और पुराणों का सार मानी जाती है, उसके अजामिलोपाख्यान प्रसंग में लिखा है कि समस्त प्रकार के पापों का आचरण करने वाला प्राणी भी यदि भगवन्नाम का आश्रय ले तो उसके समस्त पापों का प्रायश्चित हो जाता है। बाबा के प्रमाणित तर्कों से उपस्थित समुदाय शान्त हो गया। परन्तु बाबा के विरोधियों को इस घटना से बहुत बल मिला। बाबा के विरूद्ध उनके षड़यन्त्रों की भूमिका में यह घटनायें होम में घृत का कार्य करने लगीं।