इस जीवन से बालक रामबोला इतना ऊब चुका था कि उसने अब आगे भीख न माँगने और वह स्थान छोड़ देने का निश्चय कर लिया। कई दिनों तक इधर-उधर भटकते हुए बालक सूकर खेत वाराह क्षेत्र (वर्तमान में सोरों जी जिला एटा) जा पहुँचा। वहाँ सरयू के किनारे एक हनुमान मंदिर बना था। वहीं एक चबूतरे पर बालक रामबोला पड़ा रहता। मन्दिर में आने वाले हनुमान जी के भक्त वानरों को जो गुड़ चना खिलाते वही वह भी उठाकर खा लेता। परन्तु भिक्षा किसी से नहीं माँगता। प्रातः उठकर हनुमान जी का स्थान साफ कर स्नानादि कर वहीं बैठ भजन करना उसका नित्य कर्म बन गया।
इस प्रकार कई माह बीत गये। कुछ समय बाद भगवान शिव की प्रेरणा से बालक रामबोला को बाबा नरहरि दास का सान्निध्य मिल गया। एक दिन बाबा नरहरि दास घूमते हुए उस मन्दिर की ओर आ निकले जहाँ बालक रामबोला रहता था। बाबा को देख बालक ने चरण छूकर प्रणाम किया। दैव योग से बाबा का चित्त बालक की ओर खिंचा। बाबा जान गये कि कालवश अनाथ सा फिरने वाला यह बालक किसी संस्कारी कुल का है।
बाबा ने बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा — "कहाँ रहते हो बेटा? तुम्हारा नाम क्या है?" बालक ने सकुचाते हुए कहा — "बाबा! मैं श्रीराम का एक तुच्छ सेवक हूँ। मेरा नाम रामबोला है। मेरा काम यही है कि दिन में दो-चार बार राम नाम ले लेता हूँ जिससे प्रसन्न होकर रामजी मेरी देख-भाल करते हैं।" बालक की सरलतापूर्वक कही गयी बात सुनकर बाबा मुस्करा दिये। उन्हें बालक के कुलीन होने में सन्देह न रहा। बाबा ने बालक को साथ चलने को कहा। रामबोला तो वैसे ही आश्रय चाहता ही था सो बाबा के साथ चल दिया।