तुलसी बाबा के पुराने मित्र गंगाराम ज्योतिषी एक दिन टोडरमल के साथ बाबा के पास पहुँचे और निवेदन किया कि काशी में ही एक वैष्णव मठ है जिसके गोंसाईं जी स्वर्गवासी हो गये हैं। अब उनके लोभी शिष्यों में गोस्वामी पद के लिए झगड़ा होता रहता है। अब या तो वहाँ कोई योग्य व्यक्ति पद संभाले अथवा मठ को बन्द कर दिया जाये। गंगाराम और टोडर का विचार है कि आप वहाँ के गोस्वामी का पद संभालें। वहाँ के निवासी भी ऐसा ही चाहते हैं।
विरक्त तुलसी पुनः सांसारिक प्रलोभनों में नहीं फंसना चाहते थे। धन, यश, मान और वैभव की प्राप्ति के लिए काशी के मठों में होने वाली वर्चस्व की लड़ाई के समाचारों से बाबा अनभिज्ञ न थे। उन्होंने अस्वीकार कर दिया। गंगाराम और टोडर ने अनेक बार अनुनय-विनय की। तुलसी दोनों का अत्यधिक सम्मान करते थे। उनका कहना टाल न सके। अंततः एक शुभ मुहूर्त में तुलसी दास दाढ़ी, मूँछ, केश मुंडा कर उस मठ के गोस्वामी बन गये। गोस्वामी तुलसीदास।
गोस्वामी जी के आने के पश्चात उस मठ की न केवल आय बढ़ गयी अपितु व्यवस्था भी सुधर गयी। यद्यपि उस वैष्णव मठ में भगवान कृष्ण के विग्रह की पूजा होती थी। परन्तु गोस्वामी जी जानते थे कि श्रीकृष्ण राम का ही अवतार हैं उनमें कोई भेद नहीं। जिस प्रकार उनके लिए शिव और राम वस्तुतः एक ही थे ऐसा ही वे राम और कृष्ण को मानते थे। समय बीता रहा, गोस्वामी जी के सिर और गालों पर उस्तरा फिरता रहा परन्तु उनका मन इन बाहरी क्रियाओं और आडम्बरों से निरासक्त रह राम को साधने में ही सधता रहा। कथा कीर्तन आयोजन चलते रहे।