श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

सती विधवा और अकबर प्रसंग

तुलसी चरित (कथा)

एक दिन रत्नावली उनसे मिलने मठ में आयीं। गोस्वामी जी ने उनके कुछ दिन तक मठ में ठहरने की व्यवस्था करा दी। रत्नावली काशी में ही रुकना चाहती थीं, परन्तु गोस्वामी जी ने स्वीकृति नहीं दी। रत्नावली बोली — "मैं आपके भजन में बाधा नहीं बनूँगी। काशी में ही कहीं अलग घर में रह लूँगी।" गोस्वामी जी बोले — "देवी यह समय अब पूर्ववत नहीं रहा। लोक धर्म निभाना अत्यन्त कठिन हो गया है। उचित यही होगा कि तुम घर लौट जाओ।" रत्नावली ने गिड़गिड़ाते हुए पुनः आग्रह किया — "मैं आपके ईष्ट साधन में बाधा नहीं बनूँगी। आपकी इच्छा के बिना इस मठ में भी नहीं आऊँगी।" गोस्वामी जी ने दृढ़तापूर्वक शान्त स्वर में कहा — "नहीं! व्यर्थ निंदा से बचने के लिए तुम्हारा यहाँ से जाना अवश्यसंभावी है। अब इस जीवन में हमारा मिलना या साथ रह पाना असंभव है।"

गोस्वामी जी के निर्णय से रत्नावली का कंठ अवरुद्ध हो गया। भीगे नेत्रों से अश्रुकण गिरने लगे। रुंधे कंठ से बोली — "जैसी आपकी आज्ञा! परन्तु एक बात अवश्य जानना चाहती हूँ।" "पूछो!" गोस्वामी जी ने अनुमति दी। "मैंने रामचरितमानस पढ़ी है। अत्यन्त सुन्दर रचना है। परन्तु इस पावन ग्रन्थ के उत्तरकाण्ड में आपने धोबी के निंदा करने पर श्रीराम द्वारा सीता जी के त्याग का प्रसंग क्यों नहीं लिखा?" रत्ना ने पूछा।

गोस्वामी जी चुप रह गये। रत्नावली के प्रति किये अपने व्यवहार से उनके मन में एक अपराध बोध सा उत्पन्न हो उठा। कुछ क्षण चुप रहने के पश्चात तुलसी भावुक स्वर में बोले — "सत्य कहूँ रत्ना! जो अपराध मैंने तुम्हारे प्रति किया है और उससे तुम्हें जो अहित हुआ है वह स्वयं में अक्षम्य है। अनन्त करुणा सिन्धु मेरे राम जगदजननी सीता के प्रति ऐसा अन्याय नहीं कर सकते थे।"

पति की इस बात पर रत्नावली सिसक उठी। उनके मन में आज तक अपने व्यवहार पर इतनी ग्लानि भरी हुयी है। यह जानकर रत्नावली पति के प्रति नतमस्तक हो उठी। चलते समय पति के चरणों में प्रणाम करती हुयी बोली — "एक भिक्षा मुझे देंगे स्वामी!" "कहो देवी!" गोस्वामी जी बोले। "मेरी मृत्यु से पूर्व एक बार दर्शन देने अवश्य आयेंगे।" रत्ना ने प्रार्थना के स्वर में कहा। "वचन देता हूँ! अवश्य आऊँगा।" तुलसी बोले।

प्रणाम कर रत्नावली चली गयी। रत्नावली का कुछ दिन के लिए आना ही नहीं उनका जाना भी गोस्वामी जी के विरोधियों को पचा पाना कठिन हो गया। वे मानने लगे कि पत्नी का त्याग करके गोस्वामी जी ने अन्य गृहस्थ गोस्वामियों की प्रतिष्ठा को आघात पहुँचाया है।

गोस्वामी जी अब पूर्णतया स्वतन्त्र थे। कथा-कीर्तन करना, स्थान-स्थान पर अखाड़ों का निर्माण और व्यवस्था, अखाड़ों में हनुमान जी की मूर्तियों की प्रतिष्ठा के साथ-साथ गोस्वामी जी ने ध्रुव और प्रहलाद लीला का भी मंचन आरम्भ करवाया। उन्होंने रामलीलाओं के प्रचलन और मंचन से शिवनगरी काशी को राममय कर दिया।

एक दिन गोस्वामी जी कहीं जा रहे थे। उसी मार्ग पर सामने से एक शवयात्रा आ रही थी। शवयात्रा में चल रहे लोगों के पीछे-पीछे शृंगार किये, हाथ में नारियल लिए एक स्त्री चल रही थी। वह मृतक की पत्नी थी जो उसके साथ ही सती होने जा रही थी। मार्ग में गोस्वामी जी को देखकर उसने सोचा दुर्भाग्य में भी कैसा सौभाग्य है। समाप्त होने जा रहे जीवन को सन्त शिरोमणि तुलसी बाबा के दर्शन हुये। कुछ ऐसा ही सोचकर वह श्रद्धापूर्वक गोस्वामी जी के चरणों में प्रणाम करने बढ़ी।

"अखण्ड सौभाग्यवती होओ पुत्री।" — बाबा ने आशीर्वाद दिया। सती होने जा रही उस विधवा ने आश्चर्य चकित होकर तुलसी बाबा को देखा। बाबा से बोली — "यह जो शव यात्रा जा रही है, मेरे पति की है। मैं इसके साथ सती होने जा रही हूँ और आप मुझे अखण्ड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे रहे हैं बाबा?" "क्या?" बाबा चकित रह गये। प्रभु की यह कैसी लीला थी जो ऐसा आशीर्वाद उनके मुख से निकल गया। कौतुहल वश शव यात्रा रोक दी गयी।

विधवा बोली — "बाबा! आप तो 'कहिह सत्य प्रिय वचन विचारी' के उद्घोषक रहे हैं। फिर यह आपने कैसा आशीर्वाद मुझे दिया?" तुलसी बाबा बोले — "राम पर विश्वास रखो बेटी! मेरे मुख से असत्य वचन कभी नहीं निकला है। मेरे राम कभी मेरे लिए झूठे नहीं सिद्ध हुये हैं। आज इस आशीर्वाद के पीछे अवश्य ही प्रभु की कोई लीला छिपी हुयी है। आओ! सब मिलकर राम नाम जपें।"

सब लोगों ने शव के पास बैठ राम-नाम जपना आरम्भ कर दिया। तुलसी बाबा ने प्रभु से अपने सेवक के वचन की मर्यादा निभाने का निवेदन किया। बाबा मृतक के सिर पर हाथ फेरने लगे। कुछ क्षण बाद मृतक उठ बैठा। लोग आश्चर्य में डूब गये। श्रीराम के साथ-साथ तुलसी की भी जय जयकार होने लगी। राम-नाम का महत्व और महिमा समझाकर बाबा ने उस स्त्री और उसके पति को शेष जीवन राम चरणों में अर्पित करने की प्रेरणा दी।

इस घटना से गोस्वामी जी की लोकप्रियता अत्यन्त बढ़ गयी। उनका यश दिल्ली में बादशाह अकबर तक पहुँच गया। अकबर ने ऐसे चमत्कारी सन्त को देखने की इच्छा व्यक्त की। गोस्वामी जी को दिल्ली बुलवाया गया। गोस्वामी जी काशी से वृन्दावन धाम में बाँके बिहारी के दर्शन कर दिल्ली पहुँचे। अकबर ने उन्हें कोई चमत्कार दिखाने को कहा। गोस्वामी जी ने बताया कि वे एक साधारण सन्त हैं कोई चमत्कारी व्यक्ति नहीं हैं। वे तो राम के एक दास मात्र हैं और चमत्कार तो केवल राम ही दिखा सकते हैं।

अकबर को विश्वास न हुआ। वह चमत्कार दिखाने का हठ करने लगा। गोस्वामी जी चमत्कारी व्यक्ति तो वे नहीं, सो सविनय मना कर दिया। क्रुद्ध होकर अकबर ने उन्हें बन्दी बना लिया। गोस्वामी जी को बन्दी बनाने का समाचार जंगल की आग की तरह फैल गया। चारों ओर हाहाकार मच गया। अकबर के इस कृत्य की निंदा होने लगी। काशी में तो गोस्वामी जी के द्वारा स्थापित अखाड़ों के युवकों ने विद्रोह भी कर दिया।

इधर बन्दीगृह में पड़े तुलसी ने संकट मोचक हनुमान जी को स्मरण किया। हनुमान जी तुलसी बाबा को सदैव सिद्ध थे। आज भी प्रकट होकर उन्हें निश्चन्त किया और अकबर को ऐसा चमत्कार दिखाने का वचन दिया कि उसके बाद अकबर जीवन भर चमत्कार का नाम भी नहीं लेगा।

रात्रि होते ही असंख्य वानरों ने सारे नगर को घेर लिया। जहाँ दृष्टि जाती उधर वानर दिखायी पड़ते। अकबर के महल में तो वानर किसी को कहीं आने जाने ही नहीं दे रहे थे। अकबर के शयन कक्ष और स्त्रियों के कक्षों में वानरों ने ऐसा उत्पात मचाया कि अकबर त्राहिमाम कर उठा। सारी बात समझ में आने पर अकबर दौड़ा-दौड़ा कारागार में गया और गोस्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा। उन्हें स्वतन्त्र कर बारबार क्षमा माँगी। गोस्वामी जी ने उसे पुनः किसी सन्त को कष्ट न देने को कहा। अकबर ने गोस्वामी जी को अपने दरबार में ही रूकने और प्रतिवर्ष दो लाख रूपये का पट्टा (आय) लिखने का प्रलोभन दिया। परन्तु अध्यात्म पथ के पथिक, अवध-काशी जैसे स्थानों पर रहने वाले वीतरागी तुलसी रामभक्ति के सम्मुख बड़े से बड़ा प्रलोभन भी कैसे स्वीकार कर सकते थे। सो अकबर से बोले —

'हम चाकर रघुवीर के, पट्टो लिख्यो दरबार।
तुलसी अब क्या होंयेंगे, नर के मनसबदार।।'

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