तुलसी बाबा की बढ़ती प्रतिष्ठा काशी के अनेक विद्वानों को सहन नहीं हुयी। बार-बार भाँति-भाँति के षड़यन्त्रों से वे तुलसी बाबा को दुखी किये रहते। गोस्वामी जी त्रस्त होकर महादेव से प्रार्थना करने लगे — "हे महादेव जी! मैं आपकी पुरी में रहकर श्रीगंगा जी का सेवन करता हूँ। राम-नाम पर माँग पर पेट भरता हूँ। न किसी से कुछ लेता हूँ और न ही किसी को कुछ देने योग्य हूँ। यदि किसी की भलाई न हो सके तो किसी की बुराई भी नहीं करता। यदि कोई मुझसे दुर्व्यवहार करता है तो उसका बल-प्रयोग मैं आपसी दीन होकर कह देता हूँ। दिन में मुझे ठगों के धक्के खाने पड़ते हैं और रात्रि चोर सताते हैं। अतएव हे शंकर जी! अपनी कृपा दृष्टि की ओर से मेरी ओर देख कर अपनी काशीपुरी में इनसे मेरी रक्षा कीजिए —
"बासर ठासनि के ढका रजनी चहुँ दिसि चोर।
संकर निज पुर राखिये, चिताई सुलोचन कोर।"
गोस्वामी जी की प्रार्थना सुन भगवान शिव की प्रेरणा पा हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिये। तुलसी बाबा की दीनता देख गुरुदेव हनुमान जी ने उन्हें ऐसी विनय पत्रिका लिखने का सुझाव दिया जिसमें वे अपने मनोगत भावों एवं समस्याओं को लिखें, जिससे हनुमान जी उसे राम दरबार तक पहुँचा कर श्रीराम से हस्ताक्षर करवा कर उन्हें कलिकाल के प्रभाव और दुष्टों से मुक्ति दिला सकें।
हनुमान जी के आदेश पर गोस्वामी जी ने विनय पत्रिका लिखनी प्रारम्भ की। श्री गणेश, शिव-पार्वती, सूर्य, गंगा, सरस्वती, इत्यादि सभी देवताओं के साथ-साथ चारों भाईयों सहित श्रीराम और जगदजननी सीता को समर्पित सुन्दर पद रचे गये। श्रीराम के सम्मुख अपनी दासता और दीनता को गोस्वामी जी ने अत्यन्त मार्मिक एवं सुन्दर ढंग से रखा। विनय पत्रिका के पद इतने सुन्दर, करूण, मधुर और मर्मपूर्ण बने कि देखते ही बनता था। अभी विनय पत्रिका का रचना कार्य चल ही रहा था कि एक दिन गोस्वामी जी की भुजा में अत्यन्त तीव्र पीड़ा होने लगी। हाथ में लेखनी पकड़ना भी दूभर हो गया। बाबा जान नहीं पाये कि बिना किसी कारण ऐसा क्या हो गया कि उनकी भुजा में पीड़ा होने लगी। बाबा सदैव की तरह पुनः संकट मोचक हनुमान जी की शरण में थे —
'बाहु बिटप सुख विहंग थलु लगी कुपीर कुआगि।
राम कृपा जल सींचिए वेगि दीन हित लागि।।'
जैसे-जैसे भुजा की पीड़ा बढ़ती जा रही थी वैसे-वैसी कवि-हृदय से स्वतः छन्द फूटने लगे। 'हनुमान-बाहुक' की रचना होती चली गयी।
हनुमान जी की कृपा से बाबा की भुजा में पीड़ा कुछ कम हुई। बाबा सो रहे हैं। निद्रित अवस्था में ही भगवान शिव दर्शन देते हैं। तुलसी प्रणाम करते हैं। आशुतोष शिव बोले — "आपको यह पीड़ा मेरे पार्षद भैरव नाथ के प्रसाद स्वरूप प्राप्त हुयी है। उन्हें आपसे रूष्टता का कारण यह है कि आपने विनय पत्रिका में सभी देवी देवताओं की स्तुति की है परन्तु काशी में रहकर काशी के कोतवाल भैरव जी को आप भूल गये। तुलसी बाबा ने निवेदन किया — "परन्तु मैं तो उन्हें आपका ही स्वरूप मानता हूँ। इसीलिए ऐसी भूल हुयी।" महादेव हँसते हुये बोले — "चलो अच्छा ही हुआ। इस कारण 'हनुमान बाहुक' की रचना हो गयी। अब आप इस त्रुटि को सुधार कर भैरव जी की स्तुति में पद लिख कर उसे विनय पत्रिका में सम्मिलित कर लें।" "जैसी काशी पति की आज्ञा" बाबा ने प्रणाम करते हुए कहा।