तभी निद्रा टूट गयी। बाबा चौंक कर उठे। स्वप्न स्मरण था सो तुरन्त उठकर भैरव रूपी शिव की स्तुति रचने लगे। पद पूर्ण होने पर उसे विनय-पत्रिका में सम्मिलित कर लिया।
विनय पत्रिका पूर्ण हो गयी है। तुलसी दास जी अपने अवचेतन में देख रहे हैं कि वे अपने हाथ में विनय पत्रिका के रूप में प्रार्थना का लम्बा कागज लिए रामजी के दरबार की ओर जा रहे हैं। मार्ग में उन्हें श्रीगणेश, माँ सरस्वती, सूर्य, शिव-पार्वती के साथ साथ गंगा, यमुना, काशी-चित्रकूट आदि पावन नदियों एवं स्थलों के भी दर्शन होते हैं। सबको प्रणाम करते हुये वे श्री राम दरबार तक जा पहुँचते हैं। राम दरबार की ड्योढ़ी पर श्री हनुमान जी खड़े हैं। श्रीराम जी के वाम भाग में जगजननी सीता जी सिंहासन पर विराजमान हैं। भैया भरत, शत्रुघ्न और लखन लाल जी प्रभु की सेवा में रमे हुये हैं। तुलसी बाबा हनुमान जी को अपनी विनय पत्रिका देते हुए उन्हें संकेत करके कहते हैं कि पहले भरत जी, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और माँ सीता को प्रणाम कर उनकी स्तुति करो। इनकी कृपा से ही आपकी प्रार्थना रूपी विनय पत्रिका प्रभु तक पहुँच सकती है।
तुलसी दास जी तीनों भाईयों की वन्दना करते हैं। माँ जगजननी को प्रणाम करते हैं। हनुमान जी प्रभु से निवेदन करते हैं और भरत जी का अनुमोदन देख लक्ष्मण जी तुलसीदास के हाथों से विनय पत्रिका ले कर प्रभु के सम्मुख आकर कहते हैं — "हे प्रभु! इस कलिकाल में भी आपके अकिंचन सेवक तुलसी ने आपके नाम के प्रति अपनी प्रीति और प्रतीति को जिस प्रकार निभाया है, वैसी निष्ठा अनन्य है। करूणा सिन्धु कृपया इस अकिंचन तुलसी पर कृपा करें।"
नेत्रों में प्रेमाश्रु भरे खड़े तुलसी के हाथ स्वतः जुड़ते चले गये। प्रभु अपनी चिर मुस्कान बिखेरते हुए बोले — "मुझे सब विदित है तुलसी दास जी! अब आप निश्चन्त रहें। कलियुग आपका कुछ नहीं विगाड़ सकेगा।' श्री लक्ष्मण जी ने लेखनी बढ़ा दी। प्रभु ने विनय पत्रिका पर सही के हस्ताक्षर कर दिये। तुलसी गदगद हो भगवान के चरणों में गिर जाते हैं —
मारुति मन, रूचिं भरत की लिखत लषन कही है।
कलिकालहु नाथ! नाम सों परतीति-प्रीति, एक किंकर की निबही है।
सकल सभा सुन लै उठी, जानि रीति रही है।
कृपा गरीब निवाज की, देखत गरीब को साहब बाँह गही है।
बिहँसि राम कह्यो 'सत्य है, सुधि में हूँ लही है।'
मुदित नाथ नावत, बनी तुलसी अनाथ की, परी रघुनाथ हाथ सही है।।
विनय पत्रिका पर प्रभु के हस्ताक्षर करते ही तुलसी बाबा अवचेतन अवस्था से चौंक कर उठ जाते हैं। प्रभु की अनन्त करूणा और कृपा से उनके मन-नयन भीग उठते हैं। कुछ समय पश्चात गोस्वामी जी योगेश्वर श्रीकृष्ण के दर्शनों का निश्चय कर वृन्दावन आ गये।