श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

नाभादास और पुजारी प्रसंग

तुलसी चरित (कथा)

उस समय वृन्दावन में भारत के प्रसिद्ध संत स्वामी नारायण दास जो कि नाभा स्वामी के नाम से जाने जाते थे, भक्तमाल साहित्य की कथायें सुना रहे थे। नाभा स्वामी जी ने चारों युगों के भक्तों की कथा को 'भक्तमाला साहित्य' में अत्यन्त सुन्दर ढंग से लिखा था। वृन्दावन में वे उसी का प्रवचन कर रहे थे। उनकी कथा में राजस्थान के एक राजा रामरैन अपनी रानी सहित उपस्थित थे। नाभा दास जी के मुख से भक्त माल के अनेक प्रसंगों को सुन राजा-रानी द्रवित हो गये। जाते समय वे बहुत सी धनराशि स्वामी जी को अर्पित कर गये। निष्काम हृदय स्वामी जी ने उस राशि से ठाकुर जी के भण्डारे के आयोजन का निर्णय लिया। भण्डारे के आयोजन में सभी छोटे-बड़े सन्तों को आमन्त्रित किया गया था।

उस अवधि में गोस्वामी जी भी वृन्दावन में थे। किसी ने उनसे भण्डारे में चलने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया। कुछ समय पश्चात प्रभु प्रेरणा से सन्त दर्शन की इच्छा ले गोस्वामी जी भण्डारे में चल दिये।

बाबा जब भण्डारे में पहुँचे भोजन प्रसाद पाने के लिए पंक्ति बैठ चुकी थी। गोस्वामी जी पंक्ति के एक कोने में बैठ गये। एक व्यक्ति पत्तल दे गया, दूसरे ने आकर पूड़ी परोस दी। तीसरा व्यक्ति खीर लेकर आया तो उसने बाबा से पूछा कि उनके पास खीर के लिए पात्र (दोना) तो है नहीं, फिर वे खीर किसमें लेंगे? तुलसी बाबा इधर-उधर देखने लगे। पात्र तो दिखायी नहीं दिया परन्तु पास ही में एक सन्त की पनही (जूती) पड़ी थी, उसे उठाकर बाबा बोले — "भैया इसी में दे दो।" खीर बाँटने वाला व्यक्ति भौंचक्का रह गया। बोला "बाबा जूती में खीर लोगे? इस अपवित्र पात्र में?" तुलसी बोले —

"तुलसी जिनके मुखनते, धोखेहु निकसे राम।
तिनके पग की पानही, मेरे मन को चाम।।"

"भैया! संत चरण का आश्रय लेकर तो बड़े-बड़े पत्थर भी पावन हो जाते हैं। फिर यह पनही तो संत चरण से सम्पृक्त रही है यह अपवित्र कैसे हो सकती है? आप खीर इसी में परोस दें।" परन्तु खीर बाँटने वाले उस व्यक्ति ने उन्हें खीर नहीं दी। उसने स्वामी नाभा दास जी के पास जाकर सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया। स्वामी जी चकित रह गये। "भावुकता की इस सीमा तक पहुँचा हुआ ऐसा भी कोई व्यक्ति है जो संत की पनही में भी प्रसाद ग्रहण करने को तत्पर है। श्रद्धा की ऐसी पराकाष्ठा?"

स्वामी जी खीर बाँटने वाले व्यक्ति को लेकर तुलसी बाबा के पास आये। गोस्वामी जी को पहचान कर नाभा दास जी उनके चरणों में झुक गये। गोस्वामी जी ने उन्हें रोकते हुये अपने हृदय से लगा लिया। उपस्थित संत तथा भक्त समुदाय को नाभा दास जी ने जब तुलसी बाबा का परिचय दिया तो सारा समाज आश्चर्यचकित रह गया। इतने बड़े संत और ऐसा निराभिमानी व्यवहार?

नाभा दास जी बोले — "भक्त माल साहित्य में मेरे द्वारा संकलित एक सौ आठ भक्तों की माला आज तुलसी नाम के सुमेरू पर पहुँच कर पूर्ण हुई। (108 मनकों में सबसे ऊपर का वह मनका जिस पर पहुँच कर माला पूर्ण होती है, सुमेरू कहलाता है) चारों युगों के इन एक सौ आठ भक्तों की माला में तुलसीदास सुमेरू के समान हैं। बोलिए संत शिरोमणि तुलसीदास की जय!" उपस्थित समुदाय के संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास की जय जयकार से गगन गूँज उठा। संतों और श्रद्धालुओं के आग्रह पर नाभादास जी ने रामचरित मानस तथा तुलसीदास से सम्बन्धित अनेक प्रसंग सुनाये।

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