श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

राम-कृष्ण अभेद और पुजारी प्रसंग

तुलसी चरित (कथा)

वृन्दावन धाम में नाभादास सहित अनेक संतों का दर्शन पाने के पश्चात गोस्वामी जी योगेश्वर कृष्ण के अनेक मन्दिरों तथा लीला स्थलों का दर्शन करने का निश्चय कर घूमते हुए एक मन्दिर में पहुँचे। उस मन्दिर का पुजारी परशुराम नामक ब्राह्मण था। जब तुलसी बाबा ने श्रीकृष्ण विग्रह में भी अपने आराध्य राम को पहचान दण्डवत किया तो उस पुजारी ने बाबा को राम भक्त जान कर कहा — "आप तो श्रीराम के उपासक जान पड़ते हैं। और यह श्रीकृष्ण का मंदिर है। क्या आप जानते नहीं कि किसे नमन कर रहे हैं?"

तुलसी बाबा उसकी भेद बुद्धि को भाँप गये। बोले — "मेरे मन में तो कभी श्रीराम-कृष्ण में भेद नहीं रहा। यदि ऐसी कोई भेदवाली बात होती तो मैं वृन्दावन आता ही क्यों?" परन्तु पुजारी न माना। राम-कृष्ण में भेद के अपने हठ पर अड़ा रहा। बोला — "मैंने सुना है कि श्रीराम मात्र बारह कला के अवतार हैं जबकि श्रीकृष्ण सोलह कला परिपूर्ण अवतार हैं। फिर आप श्रीकृष्ण को ही क्यों नहीं पूजते?"

तुलसी बाबा बोले — "भैया आपने भगवान को बारह कला ही सही, कम से कम ईश्वर तो माना। मेरी आस्था को इससे ही दृढ़ता प्रदान हुयी। रहा प्रश्न दोनों में भेद का तो उसे मैं नहीं मानता, फिर भी मुझे प्रभु का मर्यादा पुरूषोत्तम रूप ही अधिक भाता है।" बाबा के समझाने पर भी पुजारी अपने कुतर्कों पर अड़ा रहा। तुलसी बाबा जान गये कि प्रभु कोई लीला दिखाने चाहते हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण विग्रह (मूर्ति) की ओर देखकर प्रभु से निवेदन किया — "प्रभु आप जानते ही हैं कि मेरे मन में ऐसा कोई दुर्भाव नहीं है। परन्तु आपके दोनों रूपों को एक सिद्ध करने के लिए मैं अब तभी आपके चरणों में शीश झुकाऊँगा जब आप अपने अनन्य स्वरूप श्रीराम रूप में दर्शन देंगे।"

'कहा कहीं छवि आज की भले बने हो नाथ।
तुलसी मरतक तब नवै जब धनुप बाण लो हाथ।।'

निर्मल चित्त, अभेद बुद्धि वाले भक्त की प्रार्थना को प्रभु अस्वीकार कैसे कर सकते थे। सो प्रभु तुरन्त ही —

'मुरली लकुटि दुराय के, धनुप बाण लिए हाथ।
अपने जन के कारणे, श्रीकृष्ण भये रघुनाथ।।'

श्रीकृष्ण के हाथों में मुरली के स्थान पर धनुष-बाण देख गोस्वामी जी भक्त का मान रखने वाले प्रभु के चरणों में गिर पड़े। प्रभु कृपा को पहचान बाबा पुजारी से बोले — "देख लीजिए। अब सिंहासन पर कौन विराजमान है आपके कृष्ण या मेरे राम? अब भी यदि उनकी अनन्यता में कोई भेद दिख रहा हो तो बताईये कि —

'कित मुरली कित चन्द्रिका, कित गोपिन को साथ।
तुलसी निज जन कारणे, श्रीकृष्ण भये रघुनाथ।।'

हतप्रभ पुजारी विस्फारित नेत्रों से कभी सिंहासन की ओर देखता तो कभी गोस्वामी जी को। अन्तः लज्जित होकर ग्लानि भरे स्वर में गोस्वामी जी से अपने अपराध और तुच्छ बुद्धि के लिये क्षमा माँगने लगा। सहृदय गोस्वामी जी बोले — "किसी भी व्यक्ति पर अज्ञान का प्रभाव पड़ना एक स्वाभाविक बात है परन्तु पुजारी होने के नाते आपकी इस भेद-बुद्धि का जन-साधारण पर अनुचित प्रभाव पड़ता है और अन्तः धर्म को ही हानि पहुँचती हैं उत्तम भक्त वही है जो — 'निज प्रभुमय देखिहिं जगत, का सन करिहिं विरोध।'" लज्जित पुजारी बाबा की महानता के प्रति नतमस्तक हो उठा।

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