देते समय बाबा का चित्त बालक की ओर खिंचा। बाबा जान गये कि कालवश अनाथ सा फिरने वाला यह बालक किसी संस्कारी कुल का है। उसकी दशा देख बाबा स्वतः ही उसके विषय में बहुत कुछ जान गये। बालक के सिर पर हाथ फेरते हुए बाबा नरहरि ने उसे अपने पास रख लिया। जीवन के चतुर्थ सोपान 'सन्यास आश्रम' में पहुँच चुके बाबा। बाबा समय पाकर उसे शिक्षा भी देने लगे।
धीरे-धीरे बाबा की सेवा और हनुमान जी की पूजा, कृपा से बालक के संस्कार जाग्रत होने लगे। बालक की श्रीराम में गहरी आस्था देख बाबा नरहरि ने उसे अयोध्या ले जाकर वहीं दीक्षित करने का निश्चय किया।