श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
कवितावली · गोस्वामी तुलसीदास

अयोध्याकाण्ड

कवितावली · अयोध्याकाण्ड
छंद १२

वन-गमन

कीरके कागर ज्यों नृपचीर, बिभूषन उप्पम अंगनि पाई।

औध तजी मगवासके रूख ज्यों पंथके साथ ज्यों लोग लोगाई॥

संग सुबंधु,पुनीत प्रिया, मनो धर्मु क्रिया धरि देह सुहाई।

राजिवलोचन रामु चले तजि बापको राजु बटाउ कीं नाईं॥

कागर कीर ज्यों भूषन-चीर सरीरु लस्यो तजि नीरु ज्यों काई।

मातु-पिता प्रिय लोग सबै सनमानि सुभायँ सनेह सगाई॥

संग सुभामिनि, भाइ भलो, दिन द्वै जनु औध हुते पहुनाई।

राजिवलोचन रामु चले तजि बापको राजु बटाउ कीं नाईं॥

छंद १३

सिथिल सनेह कहैं कौसिला सुमित्राजू सों,

मैं न लखी सौति, सखी ! भगिनी ज्यों सेई है।

कहै मोहि मैया, कहौं-मैं न मैया, भरतकी,

बलैया लेहौं भैया, तेरी मैया कैकेई है॥

तुलसी सरल भायँ रघुरायँ माय मानी,

काय-मन-बानीहूँ न जानी कै मतेई है।

बाम बिधि मेरो सुखु सिरिस-सुमन-सम,

ताको छल-छुरी कोह-कुलिस लै टेई है॥

कीजै कहा,जीजी जू! सुमित्रा परि पायँ कहै,

तुलसी सहावै बिधि, सोई सहियतु है

रावरो सुभाऊ रामजन्म ही तें जानियत,

भरतकी मातु को कि ऐसो चहियतु है॥

जाई राजघर, ब्याहि आई राजघर माहँ

राज-पूतु पाएहूँ न सुखु लहियतु है।

देह सुधागेह, ताहि मृगहूँ मलीन कियो,

ताहू पर बाहु बिनु राहु गहियतु है॥

छंद १४

गुहका पादप्रक्षालन

नाम अजामिल-से खल कोटि अपार नदीं भव बूढ़त काढ़े।

जो सुमिरें गिरि मेरु सिलाकन होत, अजाखुर बारिधि बाढ़े॥

तुलसी जेहि के पद पंकज तें प्रगटी तटिनी, जो हरै अघ गाढ़े।

ते प्रभू या सरिता तरिबे कहुँ मागत नाव करारे ह्वै ठाढ़े॥

एहि घाटतें थोरिक दूरि अहै कटि लौं जलु थाह देखाइहौं जू।

परसें पगधूरि तरै तरनी, घरनी घर क्यों समुझाइहौं जू॥

तुलसी अवलंबु न और कछू, लरिका केहि भाँति जिआइहौंजू।

बरु मारिए मोहि, बिना पग धोएँ हौं नाथ न नाव चढ़ाइहौं जू॥

रावरे दोषु न पायनको, पगधूरिको भूरि प्रभाउ महा है।

पाहन तें बन-बाहन काठको कोमल है, जलु खाइ रहा है ।

छंद १५

पावन पाय पखारि कै नाव चढ़ाइहौं, आयसु होत कहा है।

तुलसी सुनि केवटके बर बैन हँसे प्रभु जानकी ओर हहा है॥

पात भरी सहरी, सकल सुत बारे-बारे,

केवटकी जाति, कछु बेद न पढ़ाइहौं।

सबू परिवारु मेरो याहि लागि, राजा जू,

हौं दीन बित्तहीन, कैसें दूसरी गढ़ाइहौं॥

गौतमकी घरनी ज्यों तरनी तरैगी मेरी,

प्रभुसों निषादु ह्वै कै बादु ना बढ़ाइहौं।

तुलसीके ईस राम, रावरे सों साँची कहौं,

बिना पग धोँएँ नाथ, नाव ना चढ़ाइहौं॥

जिन्हको पुनीत बारि धारैं सरपै पुरारि,

त्रिपथगामिनि जसु बेद कहैं गाइकै।

जिन्हको जोगींन्द्र मुनिबृंद देव देह दमि,

करत बिबिध जोग-जप मनु लाइकै॥

छंद १६

तुलसी जिन्हकी धूरि परसि अहल्या तरी,

गौतम सिधारे गृह गौनो सो लेवाइकै।

तेई पाय पाइकै चढ़ाइ नाव धोए बिनु,

ख्वैहौं न पठावनी कै ह्वैहौं न हँसाइ कै॥

प्रभुरुख पाइ कै, बोलाइ बालक घरनिहि,

बंदि कै चरन चहूँ दिसि बैठे घेरि-घेरि।

छोटो-सो कठौता भरि आनि पानी गंगाजूको,

धोइ पाय पीअत पुनीत बारि फेरि-फेरि॥

तुलसी सराहैं ताको भागु, सानुराग सुर

बरषैं सुमन, जय-जय कहैं टेरि टेरि।

बिबिध सनेह-सानी बानी असयानी सुनि,

हँसै राघौ जानकी-लखन तन हेरि-हेरि॥

वनके मार्गमें

पुरतें निकसी रघुबीरबधू धरि धीर दए मगमें डग द्वै।

झलकीं भरि भाल कनीं जलकी, पुट सूखि गए मधूराधर वै॥

छंद १७

फिरि बूझति है, चलनो अब केतिक, पर्नकुटी करिहौ किते ह्वै?

तियकी लखि आतुरता पियकी अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै॥

जलको गए लक्खनु, हैं लरिका

परिखौ, पिय! छाँह घरीक ह्वै ठाढ़े।

पोंछि पसेउ बयारि करौं,

अरु पाय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े॥

तुलसी रघुबीर प्रियाश्रम जानि कै

बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े।

जानकीं नाहको नेहु लख्यो,

पुलको तनु, बारि बिलोचन बाढ़े॥

ठाढ़े हैं नवद्रुमडार गहें,

धनु काँधे धरें , कर सायकु लै।

बिकटी भृकुटी, बड़री अँखियाँ,

अनमोल कपोलन की छबि है॥

तुलसी अस मूरति आनु हिएँ,

जड! डारु धौं प्रान निछावरि कै।

छंद १८

श्रम सीकर साँवरि देह लसै,

मनो रासि महा तम तारकमै॥

जलजनयन ,जलजानन जटा है सिर,

जौबन-उमंग अंग उदित उदार हैं

साँवरे-गोरेके बीच भामिनी सुदामिनी-सी,

मुनिपट धारैं, उर फूलनिके हार हैं॥

करनि सरासन सिलीमुख, निषंग कटि,

अति ही अनूप काहू भूपके कुमार हैं।

तुलसी बिलोकि कै तिलोकके तिलक तीनि

रहे नरनारि ज्यों चितेरे चित्रसार हैं॥

आगें सोहै साँवरो कुँवरु गोरो पाछें-पाछें,

आछे मुनिबेष धरें, लाजत अनंग हैं।

बान बिसिषासन, बसन बनही के कटि

कसे हैं बनाइ, नीके राजत निषंग हैं॥

छंद १९

साथ निसिनाथमुखी पाथनाथनंदिनी-सी,

तुलसी बिलोकें चितु लाइ लेत संग हैं।

आनन्द उमंग मन,जौबन-उमंग तन,

रूपकी उमंग उमगत अंग -अंग है॥

सुन्दर बदन, सरसीरुह सुहाए नैन,

मंजुल प्रसून माथें मुकुट जटनि के।

अंसनि सरासन,लसत सुचि सर कर,

तून कटि मुनिपट लूटक पटनि के॥

नारि सुकुमारि संग, जाके अंग उबटि कै,

बिधि बिरचैं बरूथ बिद्युतछटनि के।

गोरेको बरनु देखें सोनो न सलोनो लागे,

साँवरे बिलोकें गर्ब घटत घटनि के॥

बलकल-बसन, धनु-बान पानि, तून कटि,

रूपके निधान घन-दामिनी-बरन हैं।

तुलसी सुतीय संग ,सहज सुहाए अंग,

नवल कँवलहू तें कोमल चरन हैं॥

छंद २०

औरै सो बसंतु, और रति, औरै रतिपति,

मूरति बिलोकें तन-मनके हरन हैं।

तापस बेषै बनाइ पथिक पथें सुहाइ,

चले लोकलोचननि सुफल करन हैं॥

बनिता बनी स्यामल गौरके बीच,

बिलोकहु, री सखि! मोहि-सी ह्वै।

मगजोगु न कोमल, क्यों चलिहै,

सकुचाति मही पदपंकज छ्वै॥

तुलसी सुनि ग्रामबधू बिथकीं,

पुलकीं तन, औ चले लोचन च्वै।

सब भाँति मनोहर मोहनरूप

अनूप हैं भूपके बालक द्वै॥

साँवरे-गोरे सलोने सुभायँ, मनोहरताँ जिति मैनु लियो है।

बान-कमान, निषंग कसें, सिर सोहैं जटा, मुनिबेष कियो है॥

छंद २१

संग लिएँ बिधुबैनी बधू, रतिको जेहि रंचक रुपु दियो है।

पायन तौ पनहीं न, पयादेंहि क्यों चलिहैं, सकुचात हियो है॥

रानी मैं जानी अयानी महा, पबि-पाहनहू तें कठोर हियो है।

राजहुँ काजु अकाजु न जान्यो, कह्यो तियको जेहिं कान कियो है॥

ऐसी मनोहर मूरति ए,बिछुरें कैसे प्रीतम लोगु जियो है।

आँखिनमें सखि! राखिबे जोगु, इन्हैं किमि कै बनबासु दियो है॥

सीस जटा, उर- बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछी सी भौहैं।

तून सरासन-बान धरें तुलसी बन-मारगमें सुठि सोहैं॥

सादर बारहिं बार सुभायँ चितै तुम्ह त्यों हमरो,मनु मोहैं।

पूँछत ग्रामबधू सिय सों, कहौ, साँवरे-से सखि! रावरे को हैं॥

सुनि सुंदर बैन सुधारस-साने सयानी हैं जानकीं जानी भली।

तिरछे करि नैन, दै सैन तिन्हैं समुझाइ कछू मुसुकाइ चली॥

छंद २२

तुलसी तेहि औसर सोहैं सबै अवलोकति लोचनलाहु अलीं।

अनुराग-तड़ागमें भानु उदैं बिगसी मनो मंजुल कंजकलीं

धरि धीर कहैं, चलु,देखिअ जाइ, जहाँ सजनी! रजनी रहिहैं।

कहिहै जगु पोच, न सोचु कछू, फलु लोचन आपन तौ लहिहैं

सुखु पाइहैं कान सुनें बतियाँ कल, आपुसमें कछु पै कहिहैं।

तुलसी अति प्रेम लगीं पलकैं, पुलकीं लखी रामु हिए महि हैं॥

पद कोमल, स्यामल-गौर कलेवर राजत कोटि मनोज लजाएँ।

कर बान-सरासन, सीस जटा, सरसीरुह-लोचन सोन सुहाएँ॥

जिन्ह देखे सखी! सतिभायहु तें तुलसी तिन्ह तौ मन फेरि न पाए।

एहिं मारग आजु किसोर बधू बिधुबैनी समेत सुभायँ सिधाए॥

छंद २३

मुखपंकज, कंजबिलोचन मंजु, मनिज-सरासन-सी बनी भौहैं।

कमनीय कलेवर कोमल स्यामल-गौर किसोर, जटा सिर सोहैं॥

तुलसी कटि तून, धरें धनु बान, अचानक दिष्टि परी तिरछौहैं।

केहि भाँति कहौं सजनी! तोहि सों मृदु मूरति द्वै निवसीं मन मोहैं॥

वनमें

प्रेम सों पीछें तिरीछें प्रयाहि चितै चितु दै चले लै चितु चोरैं।

स्याम सरीर पसेउ लसै हुलसै 'तुलसी' छबि सो मन मोरैं॥

लोचन लोल, वलै भृकुटी कल काम कमानहु सो तृनु तोरै।

राजत रामु कुरंगके संग निषंगु कसे धनुसों सरु जोरैं॥

सर चारिक चारु बनाइ कसें कटि, पानि सरासनु सायकु लै।

बन खेलत रामु फिरैं मृगया, 'तुलसी' छबि सो बरनै किमि कै॥

अवलोकि अलौकिक रूपु मृगीं मृग चौंकि चकैं, चतवैं चितु दै।

न डगैं, न भगैं जियँ जानि सिलीमुख पंच धरैं रति नायकु है॥

छंद २४

बिंधिके बासी उदासी तपी ब्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे।

गौतमतीय तरी 'तुलसी' सो कथा सुनि भे मुनिबृंद सुखारे॥

ह्वैहैं सिला सब चंदमुखीं परसें पद मंजुल कंज तिहारे।

कीन्ही भली रघुनायकजु! करुना करि काननको पगु धारे॥

मारीचानुधावन

पंचवटीं बर पर्नकुटी तर बैठे हैं रामु सुभायँ सुहाए।

सोहै प्रिया, प्रिय बंधु लसै, 'तुलसी' सब अंग घने छबि छाए॥

देखि मृगा मृगनैनी कहे प्रिय बैन ,ते प्रीतमके मन भाए।

हेमकुरंगके संग सरासनु सायकु लै रघुनायकु धाए॥