श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
कवितावली · गोस्वामी तुलसीदास

सुन्दरकाण्ड

कवितावली · सुन्दरकाण्ड
छंद २६

अशोकवन

बासव-बरुन बिधि-बनतें सुहावनो,

दसाननको काननु बसंतको सिंगारु सो।

समय पुराने पात परत, डरत बातु,

पालत लालत रति-मारको बिहारु सो॥

देखें बर बापिका तड़ाग बागको बनाउ,

रागबस भो बिरागी पवनकुमारु सो।

सीयकी दसा बिलोखि बिटप असोक तर,

'तुलसी' बिलोक्यो सो तिलोक-सोक-सारु सो॥

माली मेघमाल, बनपाल बिकराल भट,

नीकें सब काल सींचैं सुधासार नीरके।

मेघनाद तें दुलारो, प्रान तें पियारो बागु,

अति अनुरागु जियँ जातुधान धीर कें॥

'तुलसी' सो जानि-सुनि, सीयको दरसु पाइ,

पैठो बाटिकाँ बजाइ बल रघुबीर कें।

बिद्यमान देखत दसाननको काननु सो

तहस-नहस कियो साहसी समीर कें॥

छंद २७

लंकादहन

बसन बटोरि बोरि-बोरि तेल तमीचर,

खोरि- खोरि धाइ आइ बाँधत लँगूर हैं।

तैसो कपि कौतुकी देरात ढीले गात कै-कै,

लातके अघात सहै, जीमें कहै, कूर हैं॥

बाल किलकारी कै-कै, तारी दै-दै गारी देत,

पाछें लागे, बाजत निसान ढोल तूर हैं।

बालधी बढ़न लागी, ठौर- ठौर दीन्ही आगी,

बिंधिकी दवारि कैधौं कोटिसत सूर हैं॥

लाइ- लाइ आगि भागे बालजाल जहाँ तहाँ,

लघु ह्वै निबुक गिरि मेरुतें बिसाल भो।

कौतुकी कपीसु कूदि कनक-कँगूराँ चढ्यो,

रावन-भवन चढ़ि ठाढ़ो तेहि काल भो॥

'तुलसी' विराज्यो ब्योम बालधी पसारि भारी,

देखें हहरात भट, कालु सो कराल भो।

छंद २८

तेजको निधानु मानो कोटिक कृसानु-भानु,

नख बिकराल, मुखु तेसो रिस लाल भो॥

बालधी बिसाल बिकराल, ज्वालजाल मानो

लंक लीलिबेको काल रसना पसारी है।

कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु,

बीररस बीर तरवारि सो उघारी है ॥

'तुलसी' सुरेस-चापु, कैधौं दामिनि-कलापु,

कैधौं चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है।

देखें जातुधान-जातुधानीं अकुलानी कहैं,

काननु उजार् यो, अब नगरू प्रजारिहै॥

जहाँ-तहाँ बुबुक बिलोकि बुबुकारी देत,

जरत निकेत, धावौ, धावौ लागी आगि रे।

कहाँ तातु-मातु, भ्रात-भगिनी, भामिनी-भाभी,

ढोठा छोटे छोहरा अभागे भोंडे भागि रे॥

छंद २९

हाथी छोरौ, घोरा छोरौ, महिष-बृषभ छोरौ,

छेरी छोरौ, सो वैसो जगावै, जागि, जागि रे।

'तुलसी' बिलोकि अकुलानी जातुधानीं कहैं,

बार-बार कह्यौं, पिय! कपिसों न लागि रे॥

देखि ज्वालाजालु, हाहाकारु दसकंध सुनि,

कह्यो,धरो, धरो, धाए बीर बलवान हैं।

लिएँ सूल-सेल, पास-परिघ, प्रचंड दंड,

भाजन सनीर, धीर धरें धनु-बान हैं॥

'तुलसी' समिध सौंज, लंक जग्यकुंडु लखि,

जातुधानपुंगीफल जव तिल धान हैं।

स्रवा सो लँगूल, बलमूल प्रतिकूल हबि,

स्वाहा महा हाँकि हाँकि हुनैं हनुमान हैं॥

गाज्यो कपि गाज ज्यौं, बिराज्यो ज्वालजालजुत,

भाजे बीर धीर , अकुलाइ उठ्यो रावनो।

धावौ, धावौ, धरौ, सुनि धाए जातुधान धारि,

बारिधारा उलदै जलदु जौन सावनो॥

छंद ३०

लपट- झपट झहराने, हहराने बात,

भहराने भट, पर् यो प्रबल परावनो।

ढकनि ढकेलि, पेलि सचिव चले लै ठेलि,

नाथ! न चलैगो बलु, अनलु भयावनो॥

बड़ो बिकराल बेषु देखि, सुनि सिंघनादु,

उठ्यो मेघनादु, सबिषाद कहै रावनो।

बेग जित्यो मारुतु,प्रताप मारतंड कोटि,

कालऊ करालताँ, बड़ाईं जित्यो बावनो॥

'तुलसी' सयाने जातुधान पछिताने कहैं,

जाको ऐसो दूतु, सो तो साहेबु अबै आवनो।

काहेको कुसल रोषें राम बामदेवहू की,

बिषम बलीसों बादि बैरको बढ़ावनो॥

पानी! पानी! पानी! सब रानि अकुलानी कहैं,

जाति हैं परानी,गति जानी गजचालि है।

छंद ३१

बसन बिसारैं, मनिभूषन सँभारत न,

आनन सुखाने, कहैं, क्योंहू कोऊ पालिहै॥

'तुलसी' मँदोवै मीजि हाथ, धुनि माथ कहै,

काहूँ कान कियो न, मैं कह्यो केतो कालि है।

बापुरें बिभीषन पुकारि बार-बार कह्यो,

बानरु बड़ी बलाइ घने घर घालिहै॥

काननु उजार् यो तो उजार् यो, न बिगार् यो कछु,

बानरु बेचारो बाँधि आन्यो हठि हारसों।

निपट निडर देखि काहू न लख्यो बिसेषि ,

दीन्हो ना छड़ाइ कहि कुलके कुठारसों॥

छोटे औ बड़ेरे मेरे पूतऊ अनेरे सब,

साँपनि सों खेलैं, मेलैं गरे छुराधार सों।

'तुलसी' मँदोवै रोइ-रोइ कै बिगोवे आपु,

बार-बार कह्यो मैं पुकारि दाढ़ीजारसों॥

छंद ३२

रानीं अकुलानी सब डाढ़त परानी जाहिं,

सकैं न बिलोकि बेषु केसरीकुमारको।

मीजि-मीजि हाथ, धुनै माथ दसमाथ-तिय,

᳚तुलसी' तिलौ न भयो बाहेर अगारको॥

सबु असबाबु डाढ़ो, मैं न काढ़ो, तैं न काढ़ो,

जियकी परी, सँभारै सहन-भँडार को।

खीझति मँदोवै सबिषाद देखि मेघनादु,

बयो लुनियत सब याही दाढ़ीजारको॥

रावन की रानीं बिलखानी कहै जातुधानीं,

हाहा! कोऊ कहे बीसबाहु दसमाथसों।

काहे मेघनाद! काहे,काहे रे महोदर! तूँ

धीरजु न देत, लाइ लेत क्यों न हाथसों॥

काहे अतिकाय! काहे, काहे रे अकंपन!

अभागे तीय त्यागे भोंड़े भागे जात साथ सों।

'तुलसी' बढ़ाई बादि सालतें बिसाल बाहैं,

याहीं बल बालिसो बिरोधु रघुनाथसों॥

छंद ३३

हाट-बाट,कोट-कोट, अटनि, अगार,पौरि,

खोरि-खोरि दौरि-दौरि दीन्ही अति आगि है।

आरत पुकारत, सँभारत न कोऊ काहू,

ब्याकुल जहाँ सो तहाँ लोक चले भागि हैं

बालधी फिरावै, बार-बार झहरावै, झरैं

बुँदिया-सी लंक पघिलाइ पाग पागिहै।

'तुलसी' बिलोकि अकुलानी जातुधानीं कहैं,

चित्रहू के कपि सों निसाचरु न लागिहै॥

लगी, लागी आगि, भागि-भागि चले जहाँ -जहाँ,

धीयको न माय, बाप पूत न सँभारहीं।

छूटे बार,बसन उघारे, धूम-धुंध अंध,

कहैं बारे-बूढ़े 'बारि',बारि' बार बारहीं॥

हय हिहिनात, भागे जात घहरात गज,

भारी भीर ठेलि-पेलि रौंदि-खौंदि डारहीं।

नाम,लै चिलात, बिललात, अकुलात अति,

'तात तात! तौंसिअत, झौंसिअत, झारहीं॥

छंद ३४

लपट कराल ज्वालजालमाल दहूँ दिसि,

धूम अकुलाने, पहिचानै कौन काहि रे।

पानीको ललात बिललात, जरे गात जात

परे पाइमाल जात 'भ्रात! तूँ निबाहि रे॥

प्रिया तूँ पराहि, नाथ! नाथ!तू पराहि, बाप !

बाप तूँ पराहि, पूत! पूत! तूँ पराहि रे'॥

'तुलसी' बिलोकी लोग ब्याकुल बेहाल कहैं,

लेहि दससीस अब बीस चख चाहि रे॥

बीथिका-बजार प्रति,अटनि अगार प्रति,

पवरि-पगार प्रति बानरु बिलोकिए।

अध-ऊर्ध बानर, बिदसि-दिसि बानरु है,

मानो रह्यो है भरि बानरु तिलोकिएँ॥

मूँदैं आँखि हियमें,उघारें आँखि आगें ठाढ़ो,

धाइ जाइ जहाँ-तहाँ, और कोऊ कोकिए।

लेहु, अब लेहु तब कोऊ न सिखाबो मानो,

सोई सतराइ जाइ जाहि-जाहि रोकिए॥

छंद ३५

एक करैं धौंज, एक कहैं,काढौ सौंज, एक

औंजि, पानी पीकै कहैं, बनत न आवननो।

एक परे गाढ़े एक डाढ़त हीं काढ़े, एक

देखत हैं ठाढ़े, कहैं, पावकु भयावनो॥

'तुलसी' कहत एक 'नीकें हाथ लाए कपि,

अजहूँ न छाड़ै बालु गालको बजावनो'।

'धाओ रे,बुझाओ रे', कि बावरे हौ रावरे,या

औरै आगि लागी न बुझावै सिंधु सावनो'॥

कोऽपि दसकंध तब प्रलय पयोद बोले,

रावन-रजाइ धाए आइ जूथ जोरि कै।

कह्यो लंकपति लंक बरत, बुताओ बेगि,

बानरु बहाइ मारौ महाबीर बोरि कै॥

'भलें नाथ!' नाइ माथ चले पाथप्रदनाथ,

बरषैं मुसलधार बार-बार घोरि कै।

जीवनतें जागी आगी, चपरि चौगुनी लागी

'तुलसी' भभरि मेघ भागे मुखु मोरि कै

छंद ३६

इहाँ ज्वाल जरे जात, उहाँ ग्लानि गरे गात,

सूखे सकुचात सब कहत पुकार है॥

'जुग षट भानु देखे प्रलयकृसानु देखे,

सेष-मुख-अनल बिलोके बार-बार हैं॥

'तुलसी'सुन्यो न कान सलिलु सर्पी-समान,

अति अचिरिजु कियो केसरीकुमार है।

बारिद बचन सुनि धुने सीस सचिवन्ह,

कहैं दससीस! 'ईस-बामता-बिकार हैं'

'पावकु, पवनु, पानी, भानु,हिमवानु, जमु,

कालु, लोकपाल मेरे डर डावाँडोल हैं।

साहेबु महेसु सदा संकित रमेसु मोहिं

महातप साहस बिरंचि लीन्हें मोल हैं॥

'तुलसी' तिलोक आजु दूजो न बिराजै राजु,

बाजे-बाजे राजनिके बेटा-बेटी ओल हैं।

को है ईस नामको, जो बाम होत मोहूसे को,

मालवान! रावरेके बावरे-से बोल हैं'॥

छंद ३७

भूमि भूमिपाल, ब्यालपालक पताल, नाक-

पाल, लोकपाल जेते, सुभट-समाजु है।

कहै मालवान,जातुधानपति ! रावरे को

मनहूँ अकाजु आनै, ऐसो कौन आजु है॥

रामकोहु पावकु, समीरु सिय-स्वासु, कीसु,

ईस-बामता बिलोकु, बानरको ब्याजु है।

जारत पचारि फेरि-फेरि सो निसंक लंक,

जहाँ बाँको बीरु तोसो सूर-सिरताजु है॥

पान-पकवान बिधि नाना के, सँधानो, सीधो,

बिबिध बिधान धान बरत बखारहीं।

कनककिरीट कोटि पलँग, पेटारे, पीठ

काढ़त कहार सब जरे भरे भारहीं॥

प्रबल अनल बाढ़े जहाँ काढ़े तहाँ डाढ़े,

झपट-लपट बरे भवन-भँडारहीं।

छंद ३८

'तुलसि' अगारु न पगारु न बजारु बच्यो,

हाथी हथसार जरे घोरे घोरसारहीं॥

हाट-बाट हाटकु पिघलि चलो घी-सो घनो,

कनक-कराही लंक तलफति तायसों॥

नानापकवान जातुधान बलवान सब

पागि पागि ढेरी कीन्ही भलीभाँति भायसों॥

पाहुने कृसानु पवमानसों परोसो, हनुमान

सनमानि कै जेंवाए चित-चायसों।

'तुलसी' निहारि अरिनारि दै-दै गारि कहैं

बावरें सुरारि बैरु कीन्हौ रामरायसों॥

रावन सो राजरोगु बाढ़त बिराट-उर,

दिनु-दिनु बिकल, सकल सुख राँक सो।

नाना उपचार करि हारे सुर, सिध्द,मुनि,

होत न बिसोक, औत पावै न मनाक सो॥

रामकी रजाइतें रसाइनी समीरसूनु

उतरि पयोधि पार सोधि सरवाक सो।

छंद ३९

जातुधान-बुट पुटपाक लंक-जातरूप-

रतन जतन जारि कियो है मृगांक-सो॥

सीताजीसे बिदाई

जारि-बारि, कै बिधूम, बारिधि बुताइ लूम,

नाइ माथो पगनि, भो ठाढ़ो कर जोरि कै।

मातु! कृपा कीजे, सहिदानि दीजै, सुनि सीय

दीन्ही है असीस चारु चूडामनि छोरि कै॥

कहा कहौं तात! देखे जात ज्यौं बिहात दिन,

बड़ी अवलंब ही,सो चले तुम्ह तोरि कै।

'तुलसी' सनीर नैन, नेहसो सिथिल बैन,

बिकल बिलोकि कपि कहत निहोरि कै॥

'दिवस छ-सात जात जानिबे न, मातु! धरु

धीर, अरि-अंतकी अवधि रहि थोरिकै।

छंद ४०

बारिधि बँधाइ सेतु ऐहैं भानुकुलकेतु

सानुज कुसल कपिकटकु बटोरि कै'॥

बचन बिनीत कहि, सीताको प्रबोधु करि,

'तुलसी' त्रिकूट चढ़ि कहत डफोरि कै।

जै जै जानकीस दससीस-करि-केसरी'

कपीसु कूद्यो बात-घात उदधि हलोरि कै॥

साहसी समीरसूनु नीरनिधि लंघि लखि

लंक सिध्दपीठु निसि जागो है मसानु सो।

'तुलसी' बिलोकि महासाहसु प्रसण्न भई

देबी सीय-सारिखी, दियो है बरदानु सो॥

बाटिका उजारि, अछधारि मारि, जारि गढ़ु,

भानुकुलभानुको प्रतापभानु-भानु-सो।

करत बिसोक लोक-कोकनद, कोक कपि,

कहै जामवंत, आयो, आयो हनुमान सो॥

छंद ४१

गगन निहारि, किलकारी भारी सुनि,

हनुमान पहिचानि भए सानँद सचेत हैं

बूड़त जहाज बच्यो पथिकसमाजु, मानो

आजु जाए जानि सब अंकमाल देत हैं॥

जै जै जानकीस, जै जै लखन-कपीस' कहि,

कूदैं कपि कौतुकी नटत रेत- रेत हैं।

अंगदु मयंदु नलु नील बलसील महा

बालधी फिरावैं,मुख नाना गति लेत हैं॥

आयो हनुमानु, प्रानहेतु अंकमाल देत,

लेत पगधूरि एक, चूमत लँगूल हैं।

एक बूझैं बार-बार सीय-समाचार, कहैं

पवनकुमारु, भो बिगतश्रम-सूल हैं॥

एक भूखे जानि, आगें आनैं कंद-मूल-फल,

एक पूजैं बाहु बलमूल तोरि फूल हैं।

एक कहैं'तुलसी' सकल सिधि ताकें, जाकें

कृपा-पाथनात सीतानाथु सानुकूल हैं॥

छंद ४२

सीयको सनेहु, सीलु, कथा तथा लंकाकी

कहत चले चायसों, सिरानो पथु छनमें।

कह्यो जुबराज बोलि बानरसमाजु, आजु

खाहु फल, सुनि पेलि पैठे मधुबनमें।

मारे बागवान, ते पुकारत देवान गे,

' उजारे बाग अंगद' देखाए घाय तनमें।

कहै कपिराजु, करि काजु आए कीस, तुल-

सीसकी सपथ कहामोदु मेरे मनमें॥

भगवान् रामकी उदारता

नगरु कुबेरको सुमेरुकी बराबरी ,

बिरंचि-बुध्दिको बिलासु लंक निरमान भो।

ईसहि चढ़ाइ सीस बीसबाहु बीर तहाँ,

रावनु सो राजा रज-तेजको निधानु भो॥

'तुलसी' तिलोककी समृध्दि, सौंज, संपदा

सकेलि चाकि राखी, रासि, जाँगरु जहानु भो।

तीसरें उपास बनबास सिंधु पास सो

समाजु महाराजजू को एक दिन दानु भो

राक्षसोंकी चिन्ता

बड़े बिकराल भालु-बानर बिसाल बड़े,

'तुलसी' बड़े पहार लै पयोधि तोपिहैं।

प्रबल प्रचंड बरिबंड बाहुदंड खंडि

मंडि मेदिनीको मंडलीक-लीक लोपिहैं॥

लंकदाहु देखें न उछाहु रह्यो काहुन को,

कहैं सब सचिव पुकारि पाँव रोपिहैं।

बाँचिहै न पाछैं तिपुरारिहू मुरारिहू के,

को है रन रारिको जौं कोसलेस कोपिहैं॥