विश्राम की परमावस्था
आप देखते हैं कि आपके जीवन के कार्यकलाप की आवश्यकताओं तथा आपकी शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों पर विभिन्न प्रकार के दबावों के कारण आप हर समय तनाव तथा उद्विग्नावस्था में बने रह सकते हैं । यदि आप इस बात की अनुमति देते रहें कि बाह्य परिस्थितियां आपको सदैव तनाव और परेशानियों में बनाए रखें तो निश्चित मानिए, आप अपने हाथों से, अपनी पूरी शक्ति से अपनी कब्र जल्दी से जल्दी खोद लेंगे ।
इस स्थिति से किस प्रकार छुटकारा पाया जाए और किस प्रकार कुछ समय के लिए ही सही विश्रामावस्था में अवस्थित रहा जाए ? राम आपसे यह अनुरोध नहीं करता कि आप कर्म से पलायन करें या अपने दैनिक कार्यों (दिनचर्याओं) का परित्याग कर दें । राम ऐसा परामर्श कभी नहीं देता । फिर भी राम आपको एक अत्यंत उपयोगी आदत डालने की सलाह अवश्य देता है ।
वह आदत आपको गंभीरतम तथा दायित्वों के भार से हर समय उन्मुक्त रखती है । इसके लिए आपको हर समय अपने आपको 'त्याग' की चट्टान पर खड़ा रखना होगा और उस सर्वोत्कृष्ट स्थल पर रहकर दृढ़ संकल्प लेना होगा तथा स्वयं को उस कार्य के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित करना होगा, जो आपको संपन्न करना है । तब आप थकेंगे नहीं, तब आप उस कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न कर लेंगे ।
इसी बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए यह कहा जा सकता है कि जब आप कार्यरत हों तो आप थोड़ी-थोड़ी देर बाद विश्राम लें और एक आध मिनट की विश्राम की स्थिति में इस विचार पर मन को केंद्रित करें कि यह शरीर कुछ भी नहीं है, आपको इस शरीर से कभी भी कोई लेना-देना नहीं रहा । आप तो केवल साक्षी हैं, आपको शरीर के कार्यों से, उनके परिणामों या निष्कर्षों से कोई सरोकार नहीं ।
इस प्रकार विचार करते समय आप अपनी आंखें बंद कर सकते हैं, अपनी मांसपेशियों को आराम पहुंचा सकते हैं, अपने शरीर को पूर्ण विश्राम की स्थिति में रख सकते हैं तथा सभी प्रकार के विचारों से अपने को मुक्त रख सकते हैं । अपने विचारों के बोझ को अपने कंधों से हटाने में जितने अधिक सफल होंगे, उतना ही अधिक आप अपने को शक्तिशाली अनुभव करेंगे ।
आपके शरीर में शक्ति का संचरण नाड़ियों द्वारा होता है । इस नाड़ी-प्रणाली द्वारा विचार भी पोषित होते हैं । पाचन-क्रिया, रक्त-प्रवाह की गति, बालों की वृद्धि आदि प्रक्रियाएं अंततः आपकी नाड़ी-प्रणाली की क्रिया पर निर्भर करती हैं । यदि आपकी विचार प्रक्रिया में व्यवधान हो गया है और सभी प्रकार के विचारों से आप चिंतित हैं, व्यग्र हैं तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि आपकी नाड़ियों पर अत्यधिक बोझ है ।
श्रम-साध्य, विचारपरक प्रयत्न आपकी नाड़ी-प्रणाली के कार्य हैं । एक दृष्टि से ये प्रयत्न एक प्रकार की उपलब्धि या लाभ हैं, तो दूसरी दृष्टि से ये ही प्रयत्न एक बड़ी हानि या नुकसान हैं । यही पद्धति है जिससे शरीर की मुख्य कार्य-क्षमता क्षीण होती है । यह तो एक प्रकार से एक ही घोड़े की पीठ पर दो भारी बोझ लादने के सदृश है ।
यदि आप एक ओर के भार को बढ़ाएंगे तो स्वभावतः दूसरी ओर का भार कम हो जाएगा । घोड़े को बोझ से मुक्त कीजिए, तब घोड़ा आसानी से दौड़ सकता है और घोड़े के लदे बोझ को भी कोई हानि नहीं होगी । यदि आप अपनी जीवन-शक्ति को सुरक्षित बनाए रखना चाहते हैं, यदि आप चाहते हैं कि नाड़ी-प्रणाली का घोड़ा आसानी से जीवन का भार ढो सके तो आपको विचार के बोझ को हल्का करना होगा ।
अपने बोझिल तथा जटिल विचारों और चिंताजनक भावनाओं को अपने जीवन के सार-सत्व को मत चूसने दीजिए । पूर्ण स्वास्थ्य और ओजस्वी कार्य का रहस्य यही है कि आप अपने मन को सदैव प्रसन्न मुद्रा में तथा प्रफुल्लित स्थिति में रखें । कभी भी चिंतित न हों । कभी भी व्याकुल न बनें । जल्दबाजी न करें । किसी भी भय, आशंका या बुरे विचार से अपने को दुःखी न बनाएं ।
इस प्रकार वेदांतिक 'त्याग' का मंतव्य है कि आप अपनी मानसिक दृष्टि के सामने अपनी वास्तविक आत्मा के ईश्वरत्व को निरंतर रखें जिससे आप मन की सभी प्रकार की चिंताओं, भय, शंकाओं, कष्टों और पीड़ाओं को दूर फेंक सकें, उन्हें अपने से परे हटा सकें तथा अपने आपको सांसारिक व्याधियों, कर्तव्यों और परेशानियों से मुक्त रख सकें ।
आपका ऐसा कोई दायित्व नहीं है, जिसे आपने पूरा करना है । आप किसी से बंधे नहीं हैं । आप किसी के प्रति उत्तरदायी भी नहीं हैं । आपको किसी को कोई ऋण भी नहीं चुकाना है । आपका किसी से कोई मोह भी नहीं है । आप सभी समाज, सभी राष्ट्रों और हर एक से ऊपर उठकर अपने व्यक्तित्व का प्रभुत्व स्थापित कीजिए । यही वेदांतिक 'त्याग' है ।
समाज, रीति-रिवाज, विधि-विधान, नियम-उपनियम, आलोचना-प्रत्यालोचना, खंडन-मंडन आपकी वास्तविक आत्मा का स्पर्श तक नहीं कर सकते । इसकी अनुभूति कीजिए । जो आप वस्तुतः नहीं हैं, उसे परे फेंक दीजिए, उसका परित्याग कर दीजिए । 'ॐ' को सकारात्मक रूप से, सार्थक रूप से परिपूर्ण कीजिए । थकान के सभी अवसरों पर 'ॐ' का हृदय की भावना से तल्लीन होकर उच्चारण कीजिए । चिदानंद बनिए ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!