स्वयं से वार्ता
जिस प्रकार व्यक्ति भोजन के बिना तड़पता है, उसी प्रकार हम साक्षात्कार का स्वाद चखने, मंत्र के जाप के फल का रसास्वादन करने, अमृत-वंशी में मन की श्वास फूंकने के लिए तड़पते हैं, उसके भूखे हैं, उसके प्यासे हैं । इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए मन की झील के पानी में व्याप्त अनेकानेक स्वार्थमय अभिलाषाओं को ढूंढ़िए, उनका पता लगाइए और फिर एक-एक कर उनको कुचल डालिए । इसके लिए दृढ़ संकल्प लीजिए, सच्चे मन से शपथ लीजिए । उसके उपरांत आप जब स्वार्थमय अभिलाषाओं को कुचलकर मन की झील से बाहर निकलेंगे तो जो भी उस झील का पानी पिएगा, वह पानी उसके लिए विष नहीं होगा ( जैसा कि पहले हुआ करता था ) ।
अब तो सभी गाएं, सभी पुरुष और सभी महिलाएं मन भर, स्वच्छंद रूप से, पानी पिएं, क्योंकि जिन निंदक प्रवृत्तियों ने उस झील का पानी विषाक्त बना दिया था, वह पानी अब तो स्वयं ईश्वरीय स्रोत से प्रवाहित होकर स्वच्छ, शुद्ध, पवित्र बन गया है । अतएव आप अपनी कमजोरियों, दुर्बलताओं के बिंदुओं का पता लगाएं और उनको निकाल फेंकें ।
अभिलाषाएं मन की एकाग्रता में बाधक होती हैं । जब तक आत्मा की शुचिता नहीं होती तथा आत्मा का ज्ञान नहीं होता, तब तक वास्तविक एकाग्रता हो ही नहीं सकती । उस बुराई को, उस वासना को पहले उखाड़ फेंकिए जो आपको उस समय अधोगति की ओर ले जाती है, जब आप मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करते हैं । कृपया आप अपने प्रति सच्चे हों । इस देश में उन उपदेशों की कमी नहीं है जो दूसरे बहुधा दिया करते हैं । वस्तुस्थिति यह है कि आप स्वगत-भाषण करें, स्वयं को उपदेशित करें । इसके बिना कोई प्रगति नहीं हो सकती ।
सोने से पहले बैठ जाइए और उन दोषों पर ध्यान दीजिए जिनको दूर किया जाना है । गीता, बाइबिल, उपनिषद् या इमरसन जैसे लेखकों की पुस्तकें पढ़िए । यदि आपको लालच या शोक के अपने दोष दिखाई दें, तो इस बात का मनन कीजिए कि ये दोष क्यों विद्यमान हैं । ये क्यों अभी बने हुए हैं । ये किस प्रकार आपको बाधा पहुंचाते हैं । इस परिधि से अपने मन को ऊपर उठाइए । 'ॐ' का उच्चारण कीजिए ।
जब आप इस बात पर आश्वस्त हो जाएं कि वह अमुक दोष दब गया है, तो अनुभव कीजिए कि उस दोष पर आपने विजय प्राप्त कर ली है और फिर उसके बारे में कभी भी कोई सोच-विचार मत कीजिए । दोषों के भुजंग के एक-एक फन को कुचल डालिए । इस निमित्त आप अपने प्रत्येक दोष के संबंध में मन ही मन विचार कीजिए, 'स्वगत-भाषण' कीजिए ।
प्रत्येक व्यक्ति को, हर एक को अपने स्वयं का काम अवश्य करना है । इसलिए ध्यान को एकाग्र करते समय 'ॐ' का जाप कीजिए । जब वाणी से 'ॐ' का जाप होता है और दिव्य ध्वनि का प्रभाव आप पर पड़ता है तब आपकी स्वतः सहायता होगी और आपका सुंदर चरित्र बन जाने के कारण आप स्वयमेव अधिक शक्तिशाली बनकर निकलेंगे । यह तो प्रथम चरण है ।
सभी दोषों का मूल कारण अविद्या है । यह किसी न किसी रूप में विद्यमान रहती है । यह अविद्या अज्ञान है अपनी वास्तविक आत्मा का, अपनी सत्यात्मा का, अपने शरीर से तादात्म्य स्थापित करने का तथा बाह्य जगत् के पदार्थों से सुखी और दुःखी होने का, अपने को आघातित अनुभव करने का, अपने को शोक-ग्रस्त मानने का और इस प्रकार के सभी दायित्वों से अपनी एकता स्थापित करने का ।
जब आप यह साक्षात्कार कर लेंगे कि आप ही अनंत आत्मा हैं तो फिर आप किसी भी वासना या शोक से कैसे प्रभावित हो सकते हैं । लोग कहते हैं कि नैतिक नियम उतने निश्चयात्मक नहीं होते जितने गणितीय सिद्धांत । यह एक भूल है । घनघोर अंधकारमय गुफाओं तथा दूरस्थ वनों में आप यह देखकर आश्चर्यचकित हो जाएंगे कि आपके व्यवहार, आपके मिथ्या आचरण के विरुद्ध वहां की घास भी साक्ष्य देने लगती है । दीवारें और वृक्ष भी आपके अपराधों को सिद्ध करने तथा आपको दंडित कराने के लिए गवाही देने लगते हैं ।
जो वास्तविक कारण को नहीं जानते, वही परिस्थितियों से झगड़ा करते फिरते हैं । यहां दिव्य विधान का उद्घाटन किया जा रहा है जो निर्विवाद है, जो सत्य है । विधान यह है कि जब आप ईश्वर के नेत्रों में धूल झोंकने का प्रयत्न करेंगे, तभी आप अपने आपको अंधा बना लेंगे । अशुद्धता, मलिनता को अपनाइए फिर तो आपको उसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे । इस दिव्य विधान के नियम एक-एक करके प्रमाणित किए जाएंगे । जब ये सिद्ध हो जाएंगे तो मनुष्य नीच, अधम अभिलाषाओं के चक्कर में नहीं फंस सकेगा ।
एक बार भी यदि आपने अपनी अपवित्र, मलिन इच्छाओं पर अधिकार प्राप्त कर लिया, तब फिर आप जितनी देर चाहें उतने समय तक मन को एकाग्र बनाए रख सकते हैं ।
कृपया अधिक भूखे न रहें और न अधिक भोजन करें । इन दोनों स्थितियों से बचे रहें । कभी-कभी व्रत स्वतः ही, प्राकृतिक रूप से हो जाते हैं । बस, अपनी आंतरिक तथा स्वाभाविक प्रेरणाओं का अनुसरण कीजिए—ये प्रेरणाएं भोजन करने की हों अथवा व्रत करने की । किसी बात की, किसी क्रिया की दासता मत स्वीकार कीजिए, उसके गुलाम मत बनिए । आप स्वामी बनिए, मालिक बनिए ।
भारत में कुछ निश्चित दिनों को ऐसा माना जाता है कि वे मन को एकाग्र करने में सहायक होते हैं, जैसे पूर्णिमा का दिन । इस संबंध में आप स्वयं परीक्षण कीजिए और यदि आप ऐसे दिनों में फलाहार, बादाम आदि जैसे सूखे फलों का स्वल्पाहार करें तो आप देखेंगे कि ये दिन निश्चित रूप से मन को एकाग्र करने में सहायक होते हैं ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!