श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
श्रीरामचरितमानस

अयोध्याकाण्ड · भाग २

अयोध्याकाण्ड · भाग २ / १०
भाग २ / १०
॥ दोहा ॥

होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं। मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥33॥

भावार्थ:-(सबेरा होते ही मुनि का वेष धारण कर यदि राम वन को नहीं जाते, तो हे राजन्‌! मन में (निश्चय) समझ लीजिए कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश!)॥33॥
॥ चौपाई ॥

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहूँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥॥

भावार्थ:-ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोध की नदी उमड़ी हो। वह नदी पाप रूपी पहाड़ से प्रकट हुई है और क्रोध रूपी जल से भरी है, (ऐसी भयानक है कि) देखी नहीं जाती!॥॥

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनूकूला॥2॥

भावार्थ:-दोनों वरदान उस नदी के दो किनारे हैं, कैकेयी का कठिन हठ ही उसकी (तीव्र) धारा है और कुबरी (मंथरा) के वचनों की प्रेरणा ही भँवर है। (वह क्रोध रूपी नदी) राजा दशरथ रूपी वृक्ष को जड़-मूल से ढहाती हुई विपत्ति रूपी समुद्र की ओर (सीधी) चली है॥2॥

लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥3॥।

भावार्थ:-राजा ने समझ लिया कि बात सचमुच (वास्तव में) सच्ची है, स्त्री के बहाने मेरी मृत्यु ही सिर पर नाच रही है। (तदनन्तर राजा ने कैकेयी के) चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल (रूपी वृक्ष) के लिए कुल्हाड़ी मत बन॥3॥।

मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥ राखु राम कहूँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥4॥

भावार्थ:-तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ। पर राम के विरह में मुझे मत मार। जिस किसी प्रकार से हो तू राम को रख ले। नहीं तो जन्मभर तेरी छाती जलेगी॥4॥
॥ दोहा ॥

देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ। कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ॥34॥

भावार्थ:-राजा ने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणी से 'हा राम! हा राम! हा रघुनाथ!' कहते हुए सिर पीटकर जमीन पर गिर पड़े॥34॥
॥ चौपाई ॥

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहूँ निपाता॥ कंठ सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥॥

भावार्थ:-राजा व्याकुल हो गए, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनी ने कल्पवृक्ष को उखाड़ फेंका हो। कंठ सूख गया, मुख से बात नहीं निकलती, मानो पानी के बिना पहिना नामक मछली तड़प रही हो॥॥

पुनि कह कठु कठोर कैकेई। मनहूँ घाय महूँ माहुर देई॥ जौं अंतहूँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥2॥

भावार्थ:-कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घाव में जहर भर रही हो। (कहती है-) जो अंत में ऐसा ही करना था, तो आपने 'माँग, माँग' किस बल पर कहा था? ॥2॥

दुद्द कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥ दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई॥3॥।

भावार्थ:-हे राजा! ठहाका मारकर हँसना और गाल फुलाना- क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना। क्या रजपूती में क्षेम-कुशल भी रह सकती है?(लड़ाई में बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे!)॥3॥

छाड़हू बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू॥ तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहूँ तूृत सम बरनी॥4॥

भावार्थ:-या तो वचन (प्रतिज्ञा) ही छोड़ दीजिए या धैर्य धारण कीजिए। यों असहाय स्त्री की भाँति रोइए-पीटिए नहीं। सत्यब्रती के लिए तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी- सब तिनके के बराबर कहे गए हैं॥4॥
॥ दोहा ॥

मरम बचन सुनि राउ कह कह कछु दोषु न तोर। लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर॥35॥

भावार्थ:-कैकेयी के मर्मभेदी वचन सुनकर राजा ने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है। मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है॥35॥
॥ चौपाई ॥

चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें॥ सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥

भावार्थ:-भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते। होनहारवश तेरे ही जी में कुमति आ बसी। यह सब मेरे पापों का परिणाम है, जिससे कुसमय (बेमौके) में विधाता विपरीत हो गया॥+॥

सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई॥ करिहृहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहूँ पुर राम बड़ाई॥2॥

भावार्थ:- (तेरी उजाड़ी हुई) यह सुंदर अयोध्या फिर भलीभाँति बसेगी और समस्त गुणों के धाम श्री राम की प्रभुता भी होगी। सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकों में श्री राम की बड़ाई होगी॥2॥

तोर कलंकु मोर पछद्धिताऊ। मुएहूँ न मिटिहि न जाइहि काऊ।॥ अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठ मुह गोई॥3॥

भावार्थ:-केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरने पर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जाएगा। अब तुझे जो अच्छा लगे वहीं कर। मुँह छिपाकर मेरी आँखों की ओट जा बैठ (अर्थात मेरे सामने से हट जा, मुझे मुँह न दिखा)॥3॥

जब लगि जिओऔं कहरउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछ कहसि बहोरी॥ फिरि पछ्ितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारू लागी॥4॥

भावार्थ:-मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि जब तक मैं जीता रहूँ, तब तक फिर कुछ न कहना (अर्थात मुझसे न बोलना)। अरी अभागिनी! फिर तू अन्त में पछताएगी जो तू नहारू (ताँत) के लिए गाय को मार रही है॥4॥
॥ दोहा ॥

परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु। कपट सयानि न कहति कछ जागति मनहूँ मसानु॥36॥।

भावार्थ:-राजा करोड़ों प्रकार से (बहुत तरह से) समझाकर (और यह कहकर) कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वी पर गिर पड़े। पर कपट करने में चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो (मौन होकर) मसान जगा रही हो (श्मशान में बैठकर प्रेतमंत्र सिद्ध कर रही हो)॥36॥
॥ चौपाई ॥

राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू॥ हृदयेँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कह जनि कोई॥॥

भावार्थ:-राजा 'राम-राम' रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंख के बिना बेहाल हो। वे अपने हृदय में मनाते हैं कि सबेरा न हो और कोई जाकर श्री रामचन्द्रजी से यह बात न कहे॥॥

उदउ करह जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर॥ भूप प्रीति कैकदइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई॥2॥

भावार्थ:-हे रघुकुल के गुरु (बड़ेरे, मूलपुरुष) सूर्य भगवान्‌! आप अपना उदय न करें। अयोध्या को (बेहाल) देखकर आपके हृदय में बड़ी पीड़ा होगी। राजा की प्रीति और कैकेयी की निष्ठरता दोनों को ब्रह्मा ने सीमा तक रचकर बनाया है (अर्थात राजा प्रेम की सीमा है और कैकेयी निष्ठरता की)॥2॥।

बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा॥ पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक॥3॥।

भावार्थ:-विलाप करते-करते ही राजा को सबेरा हो गया! राज द्वार पर वीणा, बाँसुरी और शंख की ध्वनि होने लगी। भाट लोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणों का गान कर रहे हैं। सुनने पर राजा को वे बाण जैसे लगते हैं॥3॥।

मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें॥ तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥4॥।

भावार्थ:-राजा को ये सब मंगल साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पति के साथ सती होने वाली स्त्री को आभूषण! श्री रामचन्द्रजी के दर्शन की लालसा और उत्साह के कारण उस रात्रि में किसी को भी नींद नहीं आई॥4॥
॥ दोहा ॥

द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि। जागेउ अजहूँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि॥37॥

भावार्थ:-राजद्वार पर मंत्रियों और सेवकों की भीड़ लगी है। वे सब सूर्य को उदय हुआ देखकर कहते हैं कि ऐसा कौन सा विशेष कारण है कि अवधपति दशरथजी अभी तक नहीं जागे?॥37॥
॥ चौपाई ॥

पछद्िले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा॥ जाह सुमंत्र जगावह जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥

भावार्थ:-राजा नित्य ही रात के पिछले पहर जाग जाया करते हैं, किन्तु आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे सुमंत्र! जाओ, जाकर राजा को जगाओ। उनकी आज्ञा पाकर हम सब काम करें॥ ॥

गए सुमंत्रु तब राउर माहीं। देखि भयावन जात डेराहीं॥ धाइ खाई जनु जाइ न हेरा। मानहूँ बिपति बिषाद बसेरा॥2॥

भावार्थ:-तब सुमंत्र रावले (राजमहल) में गए, पर महल को भयानक देखकर वे जाते हुए डर रहे हैं। (ऐसा लगता है) मानो दौड़कर काट खाएगा, उसकी ओर देखा भी नहीं जाता। मानो विपत्ति और विषाद ने वहाँ डेरा डाल रखा हो॥2॥

पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेहिं भवन भूप कैकेई॥ कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई॥3॥।

भावार्थ:-पूछने पर कोई जवाब नहीं देता। वे उस महल में गए, जहाँ राजा और कैकेयी थे 'जय जीव' कहकर सिर नवाकर (वंदना करके) बैठे और राजा की दशा देखकर तो वे सूख ही गए॥3॥।

सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहू कमल मूलु परिहरेऊ॥ सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछ़ी। बोली असुभ भरी सुभ छूँछी॥4॥

भावार्थ:-(देखा कि-) राजा सोच से व्याकुल हैं, चेहरे का रंग उड़ गया है। जमीन पर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर (जड़ से उखड़कर) (मुर्झाया) पड़ा हो। मंत्री मारे डर के कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभ से भरी हुई और शुभ से विहीन कैकेयी बोली-॥4॥
॥ दोहा ॥

परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भोरु किय कहइ ना मरसु महीसु॥38॥।

भावार्थ:-राजा को रातभर नींद नहीं आई, इसका कारण जगदीश्घर ही जानें। इन्होंने 'राम राम' रटकर सबेरा कर दिया, परन्तु इसका भेद राजा कुछ भी नहीं बतलाते॥38॥
॥ चौपाई ॥

आनह रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेह आई॥ चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछ रानी॥॥

भावार्थ:-तुम जल्दी राम को बुला लाओ। तब आकर समाचार पूछना। राजा का रुख जानकर सुमंत्रजी चले, समझ गए कि रानी ने कुछ कुचाल की है॥॥

सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहिि का राऊ॥ उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूँछहिं सकल देखि मनु मारें॥2॥

भावार्थ:-सुमंत्र सोच से व्याकुल हैं, रास्ते पर पैर नहीं पड़ता (आगे बढ़ा नहीं जाता), (सोचते हैं) रामजी को बुलाकर राजा क्या कहेंगे? किसी तरह हृदय में धीरज धरकर वे द्वार पर गए। सब लोग उनको मन मारे (उदास) देखकर पूछने लगे॥2॥

समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका॥ राम सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥3॥

भावार्थ:-सब लोगों का समाधान करके (किसी तरह समझा- बुझाकर) सुमंत्र वहाँ गए, जहाँ सूर्यकुल के तिलक श्री रामचन्द्रजी थे। श्री रामचन्द्रजी ने सुमंत्र को आते देखा तो पिता के समान समझकर उनका आदर किया॥3॥

निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहिि चलेउ लेवाई॥ रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहूँ तहूँ बिलखाहीं॥4॥

भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी के मुख को देखकर और राजा की आज्ञा सुनाकर वे रघुकुल के दीपक श्री रामचन्द्रजी को (अपने साथ) लिवा चले। श्री रामचन्द्रजी मंत्री के साथ बुरी तरह से (बिना किसी लवाजमे के) जा रहे हैं, यह देखकर लोग जहाँ-तहाँ विषाद कर रहे हैं॥4॥
॥ दोहा ॥

जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु। सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहैँ बृद्ध गजराजु॥39॥

भावार्थ:-रघुवंशमणि श्री रामचन्द्रजी ने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालत में पड़े हैं, मानो सिंहनी को देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो॥39॥
॥ चौपाई ॥

सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहूँ दीन मनिहीन भुअंगू॥ सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहूँ मीचु घरीं गनि लेई॥॥

भावार्थ:-राजा के होठ सूख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणि के बिना साँप दुःखी हो रहा हो। पास ही क्रोध से भरी कैकेयी को देखा, मानो (साक्षात) मृत्यु ही बैठी (राजा के जीवन की अंतिम) घड़ियाँ गिन रही हो॥॥ श्री राम-कैकेयी संवाद

करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।॥ तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी॥2॥

भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी का स्वभाव कोमल और करुणामय है। उन्होंने (अपने जीवन में) पहली बार यह दुःख देखा, इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था। तो भी समय का विचार करके हृदय में धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनों से माता कैकेयी से पूछा-॥2॥

मोहि कह मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन॥ सुनह राम सबु कारनु एह। राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू॥3॥

भावार्थ:-हे माता! मुझे पिताजी के दुःख का कारण कहो, ताकि उसका निवारण हो (दुःख दूर हो) वह यत्न किया जाए। (कैकेयी ने कहा-) हे राम! सुनो, सारा कारण यही है कि राजा का तुम पर बहुत ख्रेह है॥3॥

देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछ मोहि सोहाना॥ सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू॥4॥

भावार्थ:-इन्होंने मुझे दो वरदान देने को कहा था। मुझे जो कुछ अच्छा लगा, वही मैंने माँगा। उसे सुनकर राजा के हृदय में सोच हो गया, क्योंकि ये तुम्हारा संकोच नहीं छोड़ सकते॥4॥
॥ दोहा ॥

सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु। सकह त आयसु धरह सिर मेटह कठिन कलेसु॥40॥

भावार्थ:-इधर तो पुत्र का ख्रेह है और उधर वचन (प्रतिज्ञा), राजा इसी धर्मसंकट में पड़ गए हैं। यदि तुम कर सकते हो, तो राजा की आज्ञा शिरोधार्य करो और इनके कठिन क्लेश को मिटाओ॥40॥
॥ चौपाई ॥

निधरक बैठि कहइ कट बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी॥ जीभ कमान बचन सर नाना। मनहूँ महिप मृदु लच्छ समाना॥॥

भावार्थ:-कैकेयी बेधड़क बैठी ऐसी कड़वी वाणी कह रही है, जिसे सुनकर स्वयं कठोरता भी अत्यन्त व्याकुल हो उठी। जीभ धनुष है, वचन बहुत से तीर हैं और मानो राजा ही कोमल निशाने के समान हैं॥॥

जनु कठोरपतनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू॥ सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहूँ तनु धरि निठुराई॥2॥

भावार्थ:-(इस सारे साज-समान के साथ) मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीर का शरीर धारण करके धनुष विद्या सीख रहा है। श्री रघुनाथजी को सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किए हुए हो॥2॥

मन मुसुकाइ भानुकुल भानू। रामु सहज आनंद निधानू॥ बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन॥3॥

भावार्थ:-सूर्यकुल के सूर्य, स्वाभाविक ही आनंदनिधान श्री रामचन्द्रजी मन में मुस्कुराकर सब दूषणों से रहित ऐसे कोमल और सुंदर वचन बोले जो मानो वाणी के भूषण ही थे-॥3॥

सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥ तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥4॥

भावार्थ:-हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माता के वचनों का अनुरागी (पालन करने वाला) है। (आज्ञा पालन द्वारा) माता-पिता को संतुष्ट करने वाला पुत्र, हे जननी! सारे संसार में दुर्लभ है॥4॥
॥ दोहा ॥

मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर। तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर॥4॥।

भावार्थ:-वन में विशेष रूप से मुनियों का मिलाप होगा, जिसमें मेरा सभी प्रकार से कल्याण है। उसमें भी, फिर पिताजी की आज्ञा और हे जननी! तुम्हारी सम्मति है,॥44॥
॥ चौपाई ॥

भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजुू॥ जौं न जाउँ बन ऐसेह काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा॥॥

भावार्थ:-और प्राण प्रिय भरत राज्य पावेंगे। (इन सभी बातों को देखकर यह प्रतीत होता है कि) आज विधाता सब प्रकार से मुझे सम्मुख हैं (मेरे अनुकूल हैं) यदि ऐसे काम के लिए भी मैं वन को न जाऊँ तो मूर्खों के समाज में सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिए॥

सेवहिं अरंड कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी॥ तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं॥2॥

भावार्थ:-जो कल्पवृक्ष को छोड़कर रेंड की सेवा करते हैं और अमृत त्याग कर विष माँग लेते हैं, हे माता! तुम मन में विचार कर देखो, वे (महामूर्ख) भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे॥2॥

अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी॥ थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी॥3॥।

भावार्थ:-हे माता! मुझे एक ही दुःख विशेष रूप से हो रहा है, वह महाराज को अत्यन्त व्याकुल देखकर। इस थोड़ी सी बात के लिए ही पिताजी को इतना भारी दुःख हो, हे माता! मुझे इस बात पर विश्वास नहीं होता॥3॥

राउ धीर गुन उदघधि अगाधू। भा मोहि तें कछ बड़ अपराधू॥ जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कह सतिभाऊ॥4॥

भावार्थ:-क्योंकि महाराज तो बड़े ही धीर और गुणों के अथाह समुद्र हैं। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते। तुम्हें मेरी सौगंध है, माता! तुम सच-सच कहो॥4॥
॥ दोहा ॥

सहज सकल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान। चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान॥42॥।

भावार्थ:-रघुकुल में श्रेष्ठ श्री रामचन्द्रजी के स्वभाव से ही सीधे वचनों को दुर्बुद्धि कैकेयी टेढ़ा ही करके जान रही है, जैसे यद्यपि जल समान ही होता है, परन्तु जोंक उसमें टेढ़ी चाल से ही चलती है॥42॥
॥ चौपाई ॥

रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहू जनाई॥ सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मैं कछू जाना॥॥

भावार्थ:-रानी कैकेयी श्री रामचन्द्रजी का रुख पाकर हर्षित हो गई और कपटपूर्ण ख्रेह दिखाकर बोली- तुम्हारी शपथ और भरत की सौगंध है, मुझे राजा के दुःख का दूसरा कुछ भी कारण विदित नहीं है॥॥

तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता॥ राम सत्य सबु जो कछू कहह। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू॥2॥

भावार्थ:-हे तात! तुम अपराध के योग्य नहीं हो (तुमसे माता- पिता का अपराध बन पड़े यह संभव नहीं)। तुम तो माता-पिता और भाइयों को सुख देने वाले हो। हे राम! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है। तुम पिता-माता के वचनों (के पालन) में तत्पर हो॥2॥

पितहि बुझाइ कहह बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई॥ तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीनहे॥3॥

भावार्थ:-मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, तुम पिता को समझाकर वहीं बात कहो, जिससे चौथेपन (बुढ़ापे) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्य ने इनको तुम जैसे पुत्र दिए हैं, उसका निरादर करना उचित नहीं॥3॥

लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे॥ रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए॥4॥

भावार्थ:-कैकेयी के बुरे मुख में ये शुभ वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देश में गया आदिक तीर्थ! श्री रामचन्द्रजी को माता कैकेयी के सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गंगाजी में जाकर (अच्छे-बुरे सभी प्रकार के) जल शुभ, सुंदर हो जाते हैं॥4॥ श्री राम-दशरथ संवाद, अवधवासियों का विषाद, कैकेयी को समझाना
॥ दोहा ॥

गइ मुरुछ्धा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह। सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह॥43॥

भावार्थ:-इतने में राजा की मूर्छा दूर हुई, उन्होंने राम का स्मरण करके ('राम! राम!' कहकर) फिरकर करवट ली। मंत्री ने श्री रामचन्द्रजी का आना कहकर समयानुकूल विनती की॥43॥
॥ चौपाई ॥

अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उचघारे॥ सचियँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे॥॥

भावार्थ:-जब राजा ने सुना कि श्री रामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धरके नेत्र खोले। मंत्री ने संभालकर राजा को बैठाया। राजा ने श्री रामचन्द्रजी को अपने चरणों में पड़ते (प्रणाम करते) देखा॥॥

लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहूँ फनिक फिरि पाई॥ रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू॥2॥।

भावार्थ:-स्रेह से विकल राजा ने रामजी को हृदय से लगा लिया। मानो साँप ने अपनी खोई हुई मणि फिर से पा ली हो। राजा दशरथजी श्री रामजी को देखते ही रह गए। उनके नेत्रों से आँसुओं की धारा बह चली॥2॥

सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा॥ बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं॥3॥

भावार्थ:-शोक के विशेष वश होने के कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार-बार श्री रामचन्द्रजी को हृदय से लगाते हैं और मन में ब्रह्माजी को मनाते हैं कि जिससे श्री राघुनाथजी वन को न जाएँ॥3॥

सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनह सदासिव मोरी॥ आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरह दीन जनु जानी॥4॥

भावार्थ:-फिर महादेवजी का स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं- हे सदाशिव! आप मेरी विनती सुनिए। आप आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) और अवढरदानी (मुँहमाँगा दे डालने वाले) हैं। अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दुःख को दूर कीजिए॥4॥।
॥ दोहा ॥

तुम्ह प्रेरक सब के ह्ृदयँ सो मति रामह देह। बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु॥44॥

भावार्थ:-आप प्रेरक रूप से सबके हृदय में हैं। आप श्री रामचन्द्र को ऐसी बुद्धि दीजिए, जिससे वे मेरे वचन को त्यागकर और शील-ख्रेह को छोड़कर घर ही में रह जाएँ॥44॥
॥ चौपाई ॥

अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ॥ सब दुख दुसह सहावह मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही॥॥

भावार्थ:-जगत में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाए। चाहे (नया पाप होने से) मैं नरक में गिरूँ, अथवा स्वर्ग चला जाए (पूर्व पुण्यों के फलस्वरूप मिलने वाला स्वर्ग चाहे मुझे न मिले)। और भी सब प्रकार के दुःसह दुःख आप मुझसे सहन करा लें। पर श्री रामचन्द्र मेरी आँखों की ओट न हों॥॥

अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला॥ रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछ कहिहि मातु अनुमानी॥2॥

भावार्थ:-राजा मन ही मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन पीपल के पत्ते की तरह डोल रहा है। श्री रघुनाथजी ने पिता को प्रेम के वश जानकर और यह अनुमान करके कि माता फिर कुछ कहेगी (तो पिताजी को दुःख होगा) ॥2॥

देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी॥ तात कहरउँ कछ करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥3॥

भावार्थ:-देश, काल और अवसर के अनुकूल विचार कर विनीत वचन कहे- हे तात! मैं कुछ कहता हूँ, यह ढिठाई करता हूँ। इस अनौचित्य को मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजिएगा॥3॥

अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहूँ न मोहि कहि प्रथम जनावा॥ देखि गोसाइंहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥4॥

भावार्थ:-इस अत्यन्त तुच्छ बात के लिए आपने इतना दुःख पाया। मुझे किसी ने पहले कहकर यह बात नहीं जनाई। स्वामी (आप) को इस दशा में देखकर मैंने माता से पूछा। उनसे सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गए (मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई)॥4॥
॥ दोहा ॥

मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात। आयसु देइअ हरि हियँ कहि पुलके प्रभु गात॥45॥।

भावार्थ:-हे पिताजी! इस मंगल के समय ख्रेहवश होकर सोच करना छोड़ दीजिए और हृदय में प्रसन्न होकर मुझे आज्ञा दीजिए। यह कहते हुए प्रभु श्री रामचन्द्रजी सवाँग पुलकित हो गए।॥45॥।
॥ चौपाई ॥

धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥ चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥॥

भावार्थ:-(उन्होंने फिर कहा-) इस पृथ्वीतल पर उसका जन्म धन्य है, जिसके चरित्र सुनकर पिता को परम आनंद हो, जिसको माता-पिता प्राणों के समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) उसके करतलगत (मुट्री में) रहते हैं॥॥

आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई॥ बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी॥2॥

भावार्थ:-आपकी आज्ञा पालन करके और जन्म का फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा, अतः कृपया आज्ञा दीजिए। माता से विदा माँग आता हूँ। फिर आपके पैर लगकर (प्रणाम करके) वन को चलूँगा॥2॥

अऊस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा॥ नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥ 3॥।

भावार्थ:-ऐसा कहकर तब श्री रामचन्द्रजी वहाँ से चल दिए। राजा ने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत ही तीखी (अप्रिय) बात नगर भर में इतनी जल्दी फैल गई, मानो डंक मारते ही बिच्छ का विष सारे शरीर में चढ़ गया हो॥3॥

सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥ जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥4॥

भावार्थ:-इस बात को सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गए जैसे दावानल (वन में आग लगी) देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहाँ सुनता है, वह वहीं सिर धुनने (पीटने) लगता है! बड़ा विषाद है, किसी को धीरज नहीं बँधता॥4॥
॥ दोहा ॥

मुख सुखाहिं लोचन ख्रवहिं सोकु न ह्ृदयँ समाइ। मनहूँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ॥46॥।

भावार्थ:-सबके मुख सूखे जाते हैं, आँखों से आँसू बहते हैं, शोक हृदय में नहीं समाता। मानो करुणा रस की सेना अवध पर डंका बजाकर उतर आई हो॥46॥
॥ चौपाई ॥

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहूँ तहैँ देहिं कैकइहि गारी॥ एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ॥॥

भावार्थ:-सब मेल मिल गए थे (सब संयोग ठीक हो गए थे), इतने में ही विधाता ने बात बिगाड़ दी! जहाँ-तहाँ लोग कैकेयी को गाली दे रहे हैं! इस पापिन को क्या सूझ पड़ा जो इसने छाए घर पर आग रख दी॥॥

निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा॥ कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी॥2॥

भावार्थ:-यह अपने हाथ से अपनी आँखों को निकालकर (आँखों के बिना ही) देखना चाहती है और अमृत फेंककर विष चखना चाहती है! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी रघुवंश रूपी बाँस के वन के लिए अग्ि हो गई!॥2॥

पालव बैठि पेड़ एहििं काटा। सुख महूँ सोक ठाठु धरि ठाटा॥ सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना॥3॥

भावार्थ:-पत्ते पर बैठकर इसने पेड़ को काट डाला। सुख में शोक का ठाट ठटकर रख दिया! श्री रामचन्द्रजी इसे सदा प्राणों के समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठानी॥3॥

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगह अगाध दुराऊ॥ निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई॥4॥।

भावार्थ:-कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्री का स्वभाव सब प्रकार से पकड़ में न आने योग्य, अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाहीं भले ही पकड़ जाए, पर भाई! स्त्रियों की गति (चाल) नहीं जानी जाती॥र4॥
॥ दोहा ॥

काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ। का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ॥47॥

भावार्थ:-आग क्या नहीं जला सकती! समुद्र में क्या नहीं समा सकता! अबला कहाने वाली प्रबल स्त्री (जाति) क्या नहीं कर सकती! और जगत में काल किसको नहीं खाता! ॥47॥
॥ चौपाई ॥

का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा॥ एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा॥॥

भावार्थ:-विधाता ने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते हैं कि राजा ने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयी को विचारकर वर नहीं दिया॥॥

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु॥ एक धरम परमिति पह्िचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥2॥।

भावार्थ:-जो हठ करके (कैकेयी की बात को पूरा करने में अड़े रहकर) स्वयं सब दुःखों के पात्र हो गए। स्त्री के विशेष वश होने के कारण मानो उनका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक (दूसरे) जो धर्म की मर्यादा को जानते हैं और सयाने हैं, वे राजा को दोष नहीं देते॥2॥

सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी॥ एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायेँ सुनि रहहीं॥3॥

भावार्थ:-वे शिबि, दधीचि और हरिश्रन्द्र की कथा एक-दूसरे से बखानकर कहते हैं। कोई एक इसमें भरतजी की सम्मति बताते हैं। कोई एक सुनकर उदासीन भाव से रह जाते हैं (कुछ बोलते नहीं)॥3॥

कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहह्ं यह बात अलीहा॥ सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहूँ प्रानपिआरे॥4॥

भावार्थ:-कोई हाथों से कान मूँदकर और जीभ को दाँतों तले दबाकर कहते हैं कि यह बात झूठ है, ऐसी बात कहने से तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जाएँगे। भरतजी को तो श्री रामचन्द्रजी प्राणों के समान प्यारे हैं॥4॥
॥ दोहा ॥

चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल। सपनेहँ कबहूँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल॥48॥

भावार्थ:-चन्द्रमा चाहे (शीतल किरणों की जगह) आग की चिनगारियाँ बरसाने लगे और अमृत चाहे विष के समान हो जाए, परन्तु भरतजी स्वप्न में भी कभी श्री रामचन्द्रजी के विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे॥48॥
॥ चौपाई ॥

एक बिधातहि दूषनु देहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं॥ खरभरु नगर सोचु सब काह। दुसह दाह उर मिटा उछाहू॥॥

भावार्थ:-कोई एक विधाता को दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगर भर में खलबली मच गई, सब किसी को सोच हो गया। हृदय में दुःसह जलन हो गई, आनंद- उत्साह मिट गया॥

बिप्रबंधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकई केरी॥ लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहििं ताहीं॥2॥

भावार्थ:-ब्राह्मणों की स्त्रियां, कुल की माननीय बड़ी-बूढ़ी और जो कैकेयी की परम प्रिय थीं, वे उसके शील की सराहना करके उसे सीख देने लगीं। पर उसको उनके वचन बाण के समान लगते हैं॥2॥

भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहट्ठ यह सबु जगु जाना॥ करह राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहु॥3॥

भावार्थ:-(वे कहती हैं-) तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्री रामचंद्र के समान मुझको भरत भी प्यारे नहीं हैं, इस बात को सारा जगत्‌ जानता है। श्री रामचंद्रजी पर तो तुम स्वाभाविक ही ख्रेह करती रही हो। आज किस अपराध से उन्हें वन देती हो?॥3॥।

कबहूँ न कियहू सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू॥ कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज पुर पारा॥4॥

भावार्थ:-तुमने कभी सौतियाडाह नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वास को जानता है। अब कौसल्या ने तुम्हारा कौन सा बिगाड़ कर दिया, जिसके कारण तुमने सारे नगर पर व गिरा दिया॥4॥
॥ दोहा ॥

सीय कि पिय संगु परिहरिहि लखनु करहिहहिं धाम। राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम॥49॥

भावार्थ:-क्या सीताजी अपने पति (श्री रामचंद्रजी) का साथ छोड़ देंगी? क्या लक्ष्मणजी श्री रामचंद्रजी के बिना घर रह सकेंगे? क्या भरतजी श्री रामचंद्रजी के बिना अयोध्यापुरी का राज्य भोग सकेंगे? और क्या राजा श्री रामचंद्रजी के बिना जीवित रह सकेंगे? (अर्थात्‌ न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे, न भरतजी राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे, सब उजाड़ हो जाएगा।)॥49॥।
॥ चौपाई ॥

अस बिचारि उर छाड़ह् कोह। सोक कलंक कोठि जनि होहू॥ भरतहि अवसि देह जुबराजू। कानन काह राम कर काजू॥॥

भावार्थ:-हृदय में ऐसा विचार कर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलंक की कोठी मत बनो। भरत को अवश्य युवराजपद दो, पर श्री रामचंद्रजी का वन में क्या काम है?॥॥

नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे॥ गुर गृह बसहूँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥2॥

भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी राज्य के भूखे नहीं हैं। वे धर्म की धुरी को धारण करने वाले और विषय रस से रूखे हैं (अर्थात्‌ उनमें विषयासक्ति है ही नहीं), इसलिए तुम यह शंका न करो कि श्री रामजी वन न गए तो भरत के राज्य में विज्न करेंगे, इतने पर भी मन न माने तो तुम राजा से दूसरा ऐसा (यह) वर ले लो कि श्री राम घर छोड़कर गुरु के घर रहें॥2॥

जौं नहिं लगिहह् कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे॥ जौं परिहास कीन्हि कछ होई। तौ कहि प्रगट जनावह सोई॥3॥।

भावार्थ:-जो तुम हमारे कहने पर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी न लगेगा। यदि तुमने कुछ हँसी की हो तो उसे प्रकट में कहकर जना दो (कि मैंने दिललगी की है)॥3॥

राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहूँ लोगू॥ उठह बेगि सोइ करह उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई॥4॥

भावार्थ:-राम सरीखा पुत्र क्या वन के योग्य हैं? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिस उपाय से इस शोक और कलंक का नाश हो॥4॥ छंद :

जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही। हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥ जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी। तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिन समुझि धौं जियँ भामनी॥

भावार्थ:-जिस तरह (नगरभर का) शोक और (तुम्हारा) कलंक मिटे, वही उपाय करके कुल की रक्षा कर। वन जाते हुए श्री रामजी को हठ करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं- जैसे सूर्य के बिना दिन, प्राण के बिना शरीर और चंद्रमा के बिना रात (निर्जीव तथा शोभाहीन हो जाती है), वैसे ही श्री रामचंद्रजी के बिना अयोध्या हो जाएगी, हे भामिनी! तू अपने हृदय में इस बात को समझ (विचारकर देख) तो सही।
॥ सोरठा ॥

सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित। तेईँ कछ कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥50॥।

भावार्थ:-इस प्रकार सखियों ने ऐसी सीख दी जो सुनने में मीठी और परिणाम में हितकारी थी। पर कुटिला कुबरी की सिखाई- पढ़ाई हुई कैकेयी ने इस पर जरा भी कान नहीं दिया॥50॥
॥ चौपाई ॥

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी॥। ब्याधि असाधि जानि तिन्‍्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥॥

भावार्थ:-कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दुःसह क्रोध के मारे रूखी (बेमुरव्वत) हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाघिन हरिनियों को देख रही हो। तब सखियों ने रोग को असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसको मंदबुद्धि, अभागिनी कहती हुई चल दीं॥॥

राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई॥ एहि बिधि बिलपह्िं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं॥2॥

भावार्थ:-राज्य करते हुए इस कैकेयी को दैव ने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा! नगर के सब स्त्री-पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयी को करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं॥2॥

जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा॥ बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी॥3॥

भावार्थ:-लोग विषम ज्वर (भयानक दुःख की आग) से जल रहे हैं। लंबी साँसें लेते हुए वे कहते हैं कि श्री रामचंद्रजी के बिना जीने की कौन आशा है। महान्‌ वियोग (की आशंका) से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गई है मानो पानी सूखने के समय जलचर जीवों का समुदाय व्याकुल हो!॥3 श्री राम-कौसल्या संवाद

अति बिषाद बस लोग लोगाईं। गए मातु पहिं रामु गोसाईं॥ मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ॥4॥

भावार्थ:-सभी पुरुष और स्त्रियाँ अत्यंत विषाद के वश हो रहे हैं। स्वामी श्री रामचंद्रजी माता कौसल्या के पास गए। उनका मुख प्रसन्न है और चित्त में चौगुना चाव (उत्साह) है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रख न लें। (श्री रामजी को राजतिलक की बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयों को छोड़कर बड़े भाई मुझको ही राजतिलक क्यों होता है। अब माता कैकेयी की आज्ञा और पिता की मौन सम्मति पाकर वह सोच मिट गया।)॥4॥।
॥ दोहा ॥

नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान। छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान॥54॥।

भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी का मन नए पकड़े हुए हाथी के समान और राजतिलक उस हाथी के बाँधने की काँटेदार लोहे की बेड़ी के समान है। 'वन जाना है' यह सुनकर, अपने को बंधन से छूटा जानकर, उनके ह्वृदय में आनंद बढ़ गया है॥54॥।
॥ चौपाई ॥

रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा॥ दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे॥॥

भावार्थ:-रघुकुल तिलक श्री रामचंद्रजी ने दोनों हाथ जोड़कर आनंद के साथ माता के चरणों में सिर नवाया। माता ने आशीर्वाद दिया, अपने हृदय से लगा लिया और उन पर गहने तथा कपड़े निछावर किए॥॥

बार-बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता॥ गोद राखि पुनि ह्ृदयँ लगाए। स्रवत प्रेमरस पयद सुहाए॥2॥

भावार्थ:-माता बार-बार श्री रामचंद्रजी का मुख चूम रही हैं। नेत्रों में प्रेम का जल भर आया है और सब अंग पुलकित हो गए हैं। श्री राम को अपनी गोद में बैठाकर फिर हृदय से लगा लिया। सुंदर स्तन प्रेमरस (दूध) बहाने लगे॥2॥

प्रेमु प्रमोद न कद कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई॥ सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी॥3॥

भावार्थ:-उनका प्रेम और महान्‌ आनंद कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगाल ने कुबेर का पद पा लिया हो। बड़े आदर के साथ सुंदर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं-॥3॥

कहह तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी॥ सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई॥4॥

भावार्थ:-हे तात! माता बलिहारी जाती है, कहो, वह आनंद- मंगलकारी लय कब है, जो मेरे पुण्य, शील और सुख की सुंदर सीमा है और जन्म लेने के लाभ की पूर्णतम अवधि है,॥4॥
॥ दोहा ॥

जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति। जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति॥52॥

भावार्थ:-तथा जिस (लय) को सभी स्त्री-पुरुष अत्यंत व्याकुलता से इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्यास से चातक और चातकी शरद ऋतु के स्वाति नक्षत्र की वर्षा को चाहते हैं॥52॥
॥ चौपाई ॥

तात जाऊँ बलि बेगि नाहाह। जो मन भाव मधुर कछु खाहू॥ पितु समीप तब जाएट्ठ भैआ। भइई बड़ि बार जाइ बलि मैआ॥

भावार्थ:-हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो। भैया! तब पिता के पास जाना। बहुत देर हो गई है, माता बलिहारी जाती है॥॥

मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला॥ सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवँरु न भूला॥2॥

भावार्थ:-माता के अत्यंत अनुकूल वचन सुनकर- जो मानो ख्रेह रूपी कल्पवृक्ष के फूल थे, जो सुख रूपी मकरन्द (पुष्परस) से भरे थे और श्री (राजलक्ष्मी) के मूल थे- ऐसे वचन रूपी फूलों को देकर श्री रामचंद्रजी का मन रूपी भौंरा उन पर नहीं भूला॥2॥।

धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥ पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥3॥।

भावार्थ:-धर्मधुरीण श्री रामचंद्रजी ने धर्म की गति को जानकर माता से अत्यंत कोमल वाणी से कहा- हे माता! पिताजी ने मुझको वन का राज्य दिया है, जहाँ सब प्रकार से मेरा बड़ा काम बनने वाला है॥3॥

आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥ जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥4॥।

भावार्थ:-हे माता! तू प्रसन्न मन से मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वन यात्रा में आनंद-मंगल हो। मेरे स्रेहबवश भूलकर भी डरना नहीं। हे माता! तेरी कृपा से आनंद ही होगा॥4॥
॥ दोहा ॥

बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान। आइ पाय पुनि देखिह्ठउँ मनु जनि करसि मलान॥53॥

भावार्थ:-चौदह वर्ष वन में रहकर, पिताजी के वचन को प्रमाणित (सत्य) कर, फिर लौटकर तेरे चरणों का दर्शन करूँगा, तू मन को म्लान (दुःखी) न कर॥53॥।
॥ चौपाई ॥

बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके॥ सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी॥॥

भावार्थ:-रघुकुल में श्रेष्ठ श्री रामजी के ये बहुत ही नम्र और मीठे वचन माता के हृदय में बाण के समान लगे और कसकने लगे। उस शीतल वाणी को सुनकर कौसल्या वैसे ही सहमकर सूख गईं जैसे बरसात का पानी पड़ने से जवासा सूख जाता है॥

कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहैँ मृगी सुनि केहरि नादू॥ नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जतु मापी॥2॥

भावार्थ:-ह्ृदय का विषाद कुछ कहा नहीं जाता। मानो सिंह की गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गई हो। नेत्रों में जल भर आया, शरीर थर-थर काँपने लगा। मानो मछली माँजा (पहली वर्षा का फेन) खाकर बदहवास हो गई हो!॥2॥

धरि धीरजु सुत्त बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी॥ तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे॥3॥

भावार्थ:-धीरज धरकर, पुत्र का मुख देखकर माता गदगद वचन कहने लगीं- हे तात! तुम तो पिता को प्राणों के समान प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रों को देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे॥3॥

राजु देन कहूँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा॥ तात सुनावह मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू॥4॥

भावार्थ:-राज्य देने के लिए उन्होंने ही शुभ दिन शोधवाया था। फिर अब किस अपराध से वन जाने को कहा? हे तात! मुझे इसका कारण सुनाओ! सूर्यवंश (रूपी वन) को जलाने के लिए अग्नि कौन हो गया?॥4॥
॥ दोहा ॥

निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ। सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ॥54॥।

भावार्थ:- तब श्री रामचन्द्रजी का रुख देखकर मन्त्री के पुत्र ने सब कारण समझाकर कहा। उस प्रसंग को सुनकर वे गूँगी जैसी (चुप) रह गईं, उनकी दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता॥54॥
॥ चौपाई ॥

राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू॥ लिखत सुधाकर गा लिखि राह बिधि गति बाम सदा सब काहू॥॥

भावार्थ:-न रख ही सकती हैं, न यह कह सकती हैं कि वन चले जाओ। दोनों ही प्रकार से हृदय में बड़ा भारी संताप हो रहा है। (मन में सोचती हैं कि देखो-) विधाता की चाल सदा सबके लिए टेढ़ी होती है। लिखने लगे चन्द्रमा और लिखा गया राहु॥॥

धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी॥ राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू॥2॥

भावार्थ:-धर्म और खेह दोनों ने कौसल्याजी की बुद्धि को घेर लिया। उनकी दशा साँप-छटछ्ूँदर की सी हो गई। वे सोचने लगीं कि यदि मैं अनुरोध (हठ) करके पुत्र को रख लेती हूँ तो धर्म जाता है और भाइयों में विरोध होता है,॥2॥

कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी॥ बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी॥3।॥

भावार्थ:-और यदि वन जाने को कहती हूँ तो बड़ी हानि होती है। इस प्रकार के धर्मसंकट में पड़कर रानी विशेष रूप से सोच के वश हो गईं। फिर बुद्धिमती कौसल्याजी स्त्री धर्म (पातित्रत धर्म) को समझकर और राम तथा भरत दोनों पुत्रों को समान जानकर-॥3॥।

सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी॥ तात जाउँ बलि कीन्हेह नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका॥4॥

भावार्थ:-सरल स्वभाव वाली श्री रामचन्द्रजी की माता बड़ा धीरज धरकर वचन बोलीं- हे तात! मैं बलिहारी जाती हूँ, तुमने अच्छा किया। पिता की आज्ञा का पालन करना ही सब धर्मों का शिरोमणि धर्म है॥4॥
॥ दोहा ॥

राजु देन कहिदीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु। तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु॥55॥

भावार्थ:-राज्य देने को कहकर वन दे दिया, उसका मुझे लेशमात्र भी दुःख नहीं है। (दुःख तो इस बात का है कि) तुम्हारे बिना भरत को, महाराज को और प्रजा को बड़ा भारी क्लेश होगा॥55॥
॥ चौपाई ॥

जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाह जानि बड़ि माता॥ जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौ कानन सत अवध समाना॥॥

भावार्थ:-हे तात! यदि केवल पिताजी की ही आज्ञा, हो तो माता को (पिता से) बड़ी जानकर वन को मत जाओ, किन्तु यदि पिता-माता दोनों ने वन जाने को कहा हो, तो वन तुम्हारे लिए सैकड़ों अयोध्या के समान है॥॥

पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी॥ अंतहूँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू॥2॥।

भावार्थ:-वन के देवता तुम्हारे पिता होंगे और वनदेवियाँ माता होंगी। वहाँ के पशु-पक्षी तुम्हारे चरणकमलों के सेवक होंगे। राजा के लिए अंत में तो वनवास करना उचित ही है। केवल तुम्हारी (सुकुमार) अवस्था देखकर हृदय में दुःख होता है॥2॥

बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी॥ जौं सुत कहाँ संग मोहि लेह। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेह॥3॥

भावार्थ:-हे रघुवंश के तिलक! वन बड़ा भाग्यवान है और यह अवध अभागा है, जिसे तुमने त्याग दिया। हे पुत्र! यदि मैं कहूँ कि मुझे भी साथ ले चलो तो तुम्हारे हृदय में संदेह होगा (कि माता इसी बहाने मुझे रोकना चाहती हैं)॥3॥

पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के॥ ते तुम्ह कहह मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पद्धिताऊँ॥4॥

भावार्थ:-हे पुत्र! तुम सभी के परम प्रिय हो। प्राणों के प्राण और हृदय के जीवन हो। वही (प्राणाधार) तुम कहते हो कि माता! मैं वन को जाऊँ और मैं तुम्हारे वचनों को सुनकर बैठी पछताती हूँ॥4॥
॥ दोहा ॥

यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेह बढ़ाइ। मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ॥56॥

भावार्थ:-यह सोचकर झूठा ख्रेह बढ़ाकर मैं हठ नहीं करती! बेटा! मैं बलैया लेती हूँ, माता का नाता मानकर मेरी सुध भूल न जाना॥56॥
॥ चौपाई ॥

देव पितर सब तुम्हहि गोसाईं। राखहूँ पलक नयन की नाईं॥ अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना॥१॥

भावार्थ:-हे गोसाई! सब देव और पितर तुम्हारी वैसी ही रक्षा करें, जैसे पलकें आँखों की रक्षा करती हैं। तुम्हारे वनवास की अवधि (चौदह वर्ष) जल है, प्रियजन और कुट्म्बी मछली हैं। तुम दया की खान और धर्म की धुरी को धारण करने वाले हो॥॥

अस बिचारि सोइ करह्ठ उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटह आई॥ जाहू सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ॥2॥

भावार्थ:-ऐसा विचारकर वही उपाय करना, जिसमें सबके जीते जी तुम आ मिलो। मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम सेवकों, परिवार वालों और नगर भर को अनाथ करके सुखपूर्वक वन को जाओ।॥2॥।

सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता॥ बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी॥3॥

भावार्थ:-आज सबके पुण्यों का फल पूरा हो गया। कठिन काल हमारे विपरीत हो गया। (इस प्रकार) बहुत विलाप करके और अपने को परम अभागिनी जानकर माता श्री रामचन्द्रजी के चरणों में लिपट गईं॥3॥

दारुन दुसह दाह उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा॥ राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई॥4॥

भावार्थ:-ह्ृदय में भयानक दुःसह संताप छा गया। उस समय के बहुविध विलाप का वर्णन नहीं किया जा सकता। श्री रामचन्द्रजी ने माता को उठाकर हृदय से लगा लिया और फिर कोमल वचन कहकर उन्हें समझाया॥4॥
॥ दोहा ॥

समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ। जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ॥57॥

भावार्थ:-उसी समय यह समाचार सुनकर सीताजी अकुला उठीं और सास के पास जाकर उनके दोनों चरणकमलों की वंदना कर सिर नीचा करके बैठ गईं॥57॥
॥ चौपाई ॥

दीन्लहि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी॥ बैठि नमित मुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता॥

भावार्थ:-सास ने कोमल वाणी से आशीर्वाद दिया। वे सीताजी को अत्यन्त सुकुमारी देखकर व्याकुल हो उठीं। रूप की राशि और पति के साथ पवित्र प्रेम करने वाली सीताजी नीचा मुख किए बैठी सोच रही हैं॥

चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू॥ की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछ जाइ न जाना॥2॥

भावार्थ:-जीवननाथ (प्राणनाथ) वन को चलना चाहते हैं। देखें किस पुण्यवान से उनका साथ होगा- शरीर और प्राण दोनों साथ जाएँगे या केवल प्राण ही से इनका साथ होगा? विधाता की करनी कुछ जानी नहीं जाती॥2॥

चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी॥ मनहैं प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं॥3॥

भावार्थ:-सीताजी अपने सुंदर चरणों के नखों से धरती कुरेद रही हैं। ऐसा करते समय नूपुरों का जो मधुर शब्द हो रहा है, कवि उसका इस प्रकार वर्णन करते हैं कि मानो प्रेम के वश होकर नूपुर यह विनती कर रहे हैं कि सीताजी के चरण कभी हमारा त्याग न करें॥3॥

मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी॥ तात सुनह सिय अति सुकुमारी। सास ससुर परिजनहि पिआरी॥4॥

भावार्थ:-सीताजी सुंदर नेत्रों से जल बहा रही हैं। उनकी यह दशा देखकर श्री रामजी की माता कौसल्याजी बोलीं- हे तात! सुनो, सीता अत्यन्त ही सुकुमारी हैं तथा सास, ससुर और कुटुम्बी सभी को प्यारी हैं॥4॥
॥ दोहा ॥

पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु। पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु॥58॥

भावार्थ:-इनके पिता जनकजी राजाओं के शिरोमणि हैं, ससुर सूर्यकुल के सूर्य हैं और पति सूर्यकुल रूपी कुमुदवन को खिलाने वाले चन्द्रमा तथा गुण और रूप के भंडार हैं॥58॥।

मैं पुनि पुत्रबंधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई॥ नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानकिहिं लाई॥॥

भावार्थ:-फिर मैंने रूप की राशि, सुंदर गुण और शीलवाली प्यारी पुत्रवधू पाई है। मैंने इन (जानकी) को आँखों की पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण इनमें लगा रखे हैं॥

कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली॥ फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा॥2॥।

भावार्थ:-इन्हें कल्पलता के समान मैंने बहुत तरह से बड़े लाड़- चाव के साथ सख्रेह रूपी जल से सींचकर पाला है। अब इस लता के फूलने-फलने के समय विधाता वाम हो गए। कुछ जाना नहीं जाता कि इसका क्या परिणाम होगा॥2॥

पलैँग पीठ तजि गोद हिंडोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा॥ जिअनमूरि जिमि जोगवत रहउँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ॥3॥

भावार्थ:-सीता ने पर्यकपृष्ठ (पलंग के ऊपर), गोद और हिंडोले को छोड़कर कठोर पृथ्वी पर कभी पैर नहीं रखा। मैं सदा संजीवनी जड़ी के समान (सावधानी से) इनकी रखवाली करती रही हूँ। कभी दीपक की बत्ती हटाने को भी नहीं कहती॥3॥

सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा॥ चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुखनयन सकइई किमि जोरी॥4॥।

भावार्थ:-वही सीता अब तुम्हारे साथ वन चलना चाहती है। हे रघुनाथ! उसे क्या आज्ञा होती है? चन्द्रमा की किरणों का रस (अमृत) चाहने वाली चकोरी सूर्य की ओर आँख किस तरह मिला सकती है॥4॥
॥ दोहा ॥

करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि। बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि॥59॥

भावार्थ:-हाथी, सिंह, राक्षस आदि अनेक दुष्ट जीव-जन्तु वन में विचरते रहते हैं। हे पुत्र! क्या विष की वाटिका में सुंदर संजीवनी बूटी शोभा पा सकती है?॥59॥
॥ चौपाई ॥

बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी॥ पाहन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ॥॥

भावार्थ:-वन के लिए तो ब्रह्माजी ने विषय सुख को न जानने वाली कोल और भीलों की लड़कियों को रचा है, जिनका पत्थर के कीड़े जैसा कठोर स्वभाव है। उन्हें वन में कभी क्लेश नहीं होता॥

कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू॥ सिय बन बसिह्ि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती॥2॥

भावार्थ:-अथवा तपस्वियों की स्त्रियाँ वन में रहने योग्य हैं, जिन्होंने तपस्या के लिए सब भोग तज दिए हैं। हे पुत्र! जो तसवीर के बंदर को देखकर डर जाती हैं, वे सीता वन में किस तरह रह सरकेंगी?॥2॥

सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी॥ अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई॥3॥।

भावार्थ:-देवसरोवर के कमल वन में विचरण करने वाली हंसिनी क्या गड़ैयों (तलैयों) में रहने के योग्य हैं? ऐसा विचार कर जैसी तुम्हारी आज्ञा हो, मैं जानकी को वैसी ही शिक्षा दूँ॥3॥

जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा॥ सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी॥4॥

भावार्थ:-माता कहती हैं- यदि सीता घर में रहें तो मुझको बहुत सहारा हो जाए। श्री रामचन्द्रजी ने माता की प्रिय वाणी सुनकर, जो मानो शील और सख्रेह रूपी अमृत से सनी हुई थी,॥4॥
॥ दोहा ॥

कह प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष। लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष॥60॥

भावार्थ:-विवेकमय प्रिय वचन कहकर माता को संतुष्ट किया। फिर वन के गुण-दोष प्रकट करके वे जानकीजी को समझाने लगे॥60॥

मासपारायण, चौदहवाँ विश्राम

श्री सीता-राम संवाद

॥ चौपाई ॥

मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं॥ राजकुमारि सिखावनु सुनह। आन भाँति जियँ जनि कछ गुनहू॥

भावार्थ:-माता के सामने सीताजी से कुछ कहने में सकुचाते हैं। पर मन में यह समझकर कि यह समय ऐसा ही है, वे बोले- हे राजकुमारी! मेरी सिखावन सुनो। मन में कुछ दूसरी तरह न समझ लेना॥॥

आपन मोर नीक जौं चहह। बचनु हमार मानि गृह रहहू॥ आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई॥2॥

भावार्थ:-जो अपना और मेरा भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर रहो। हे भामिनी! मेरी आज्ञा का पालन होगा, सास की सेवा बन पड़ेगी। घर रहने में सभी प्रकार से भलाई है॥2॥

एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा॥ जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी॥3॥

भावार्थ:-आदरपूर्वक सास-ससुर के चरणों की पूजा (सेवा) करने से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जब-जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेम से व्याकुल होने के कारण उनकी बुद्धि भोली हो जाएगी (वे अपने-आपको भूल जाएँगी)॥3॥

तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएह मृदु बानी॥ कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखऊँ तोही॥4॥।

भावार्थ:-हे सुंदरी! तब-तब तुम कोमल वाणी से पुरानी कथाएँ कह-कहकर इन्हें समझाना। हे सुमुखि! मुझे सैकड़ों सौगंध हैं, मैं यह स्वभाव से ही कहता हूँ कि मैं तुम्हें केवल माता के लिए ही घर पर रखता हूँ॥4॥
॥ दोहा ॥

गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस। हठ बस सब संकट सहे गालव नहष नरेस॥64॥।

भावार्थ:-(मेरी आज्ञा मानकर घर पर रहने से) गुरु और वेद के द्वारा सम्मत धर्म (के आचरण) का फल तुम्हें बिना ही क्लेश के मिल जाता है, किन्तु हठ के वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सब ने संकट ही सहे॥64॥।
॥ चौपाई ॥

मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी॥ दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवतु सुनह हमारा॥॥

भावार्थ:-हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो, मैं भी पिता के वचन को सत्य करके शीघ्र ही लौटूँगा। दिन जाते देर नहीं लगेगी। हे सुंदरी! हमारी यह सीख सुनो!॥

जौं हठ करह् प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा॥ काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी॥2॥

भावार्थ:-हे वामा! यदि प्रेमवश हठ करोगी, तो तुम परिणाम में दुःख पाओगी। वन बड़ा कठिन (क्लेशदायक) और भयानक है। वहाँ की धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं॥2॥

कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥ चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे॥3॥

भावार्थ:-रास्ते में कुश, काँटे और बहुत से कंकड़ हैं। उन पर बिना जूते के पैदल ही चलना होगा। तुम्हारे चरणकमल कोमल और सुंदर हैं और रास्ते में बड़े-बड़े दुर्गम पर्वत हैं॥3॥।

कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे॥ भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥4॥

भावार्थ:-पर्वतों की गुफाएँ, खोह (दर), नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देखा तक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी ऐसे (भयानक) शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है॥4॥
॥ दोहा ॥

भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल। ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल॥62॥।

भावार्थ:--जमीन पर सोना, पेड़ों की छाल के वस्त्र पहनना और कंद, मूल, फल का भोजन करना होगा। और वे भी क्या सदा सब दिन मिलेंगे? सब कुछ अपने-अपने समय के अनुकूल ही मिल सकेगा॥62॥
॥ चौपाई ॥

तर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं॥ लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी॥॥

भावार्थ:-मनुष्यों को खाने वाले निशाचर (राक्षस) फिरते रहते हैं। वे करोड़ों प्रकार के कपट रूप धारण कर लेते हैं। पहाड़ का पानी बहुत ही लगता है। वन की विपत्ति बखानी नहीं जा सकती॥॥

ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा॥ डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥2॥

भावार्थ:-वन में भीषण सर्प, भयानक पक्षी और स्त्री-पुरुषों को चुराने वाले राक्षसों के झुंड के झुंड रहते हैं। वन की (भयंकरता) याद आने मात्र से धीर पुरुष भी डर जाते हैं। फिर हे मृगलोचनि! तुम तो स्वभाव से ही डरपोक हो!॥2॥

हुंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू॥ मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली॥3॥।

भावार्थ:-हे हंसगमनी! तुम वन के योग्य नहीं हो। तुम्हारे वन जाने की बात सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे (बुरा कहेंगे)। मानसरोवर के अमृत के समान जल से पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्र में जी सकती है॥3॥

नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला॥ रहह भवन अस ह्ृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी॥4॥

भावार्थ:-नवीन आम के वन में विहार करने वाली कोयल क्या करील के जंगल में शोभा पाती है? हे चन्द्रमुखी! हृदय में ऐसा विचारकर तुम घर ही पर रहो। वन में बड़ा कष्ट है॥4॥
॥ दोहा ॥

सहज सुह्नद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि। सो पछ्धिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि॥63॥

भावार्थ:-स्वाभाविक ही हित चाहने वाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदय में भरपेट पद्धताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है॥63॥
॥ चौपाई ॥

सुनि मृद बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के॥। सीतल सिख दाहक भई कैसें। चकइहि सरद चंद निसि जैसें॥

भावार्थ:-प्रियतम के कोमल तथा मनोहर वचन सुनकर सीताजी के सुंदर नेत्र जल से भर गए। श्री रामजी की यह शीतल सीख उनको कैसी जलाने वाली हुई, जैसे चकवी को शरद ऋतु की चाँदनी रात होती है॥॥

उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही॥ बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी॥2॥।

भावार्थ:-जानकीजी से कुछ उत्तर देते नहीं बनता, वे यह सोचकर व्याकुल हो उठीं कि मेरे पवित्र और प्रेमी स्वामी मुझे छोड़ जाना चाहते हैं। नेत्रों के जल (आँसुओं) को जबरदस्ती रोककर वे पृथ्वी की कन्या सीताजी हृदय में धीरज धरकर,॥2॥।

लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी। दीन्टि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई॥3॥

भावार्थ:-सास के पैर लगकर, हाथ जोड़कर कहने लगीं- हे देवि! मेरी इस बड़ी भारी ढिठाई को क्षमा कीजिए। मुझे प्राणपति ने वही शिक्षा दी है, जिससे मेरा परम हित हो॥3॥

मैं पुनि समुन्नि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥4॥

भावार्थ:-परन्तु मैंने मन में समझकर देख लिया कि पति के वियोग के समान जगत में कोई दुःख नहीं है॥4॥
॥ दोहा ॥

प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान। तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान॥64॥।

भावार्थ:-हे प्राणनाथ! हे दया के धाम! हे सुंदर! हे सुखों के देने वाले! हे सुजान! हे रघुकुल रूपी कुमुद के खिलाने वाले चन्द्रमा! आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिए नरक के समान है॥64॥
॥ चौपाई ॥

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्दय समुदाई॥ सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई॥

भावार्थ:-माता, पिता, बहिन, प्यारा भाई, प्यारा परिवार, मित्रों का समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन (बन्धु-बांधव), सहायक और सुंदर, सुशील और सुख देने वाला पुत्र-॥॥

जहँ लगिनाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिह्ठ ते ताते॥ तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू॥2॥।

भावार्थ:-हे नाथ! जहाँ तक ख्रेह और नाते हैं, पति के बिना स्त्री को सूर्य से भी बढ़कर तपाने वाले हैं। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पति के बिना स्त्री के लिए यह सब शोक का समाज है॥2॥

भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू॥ प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहूँ सुखद कतहूँ कछ नाहीं॥3॥

भावार्थ:-भोग रोग के समान हैं, गहने भार रूप हैं और संसार यम यातना (नरक की पीड़ा) के समान है। हे प्राणनाथ! आपके बिना जगत में मुझे कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है॥3॥

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥ नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें॥4॥

भावार्थ:-जैसे बिना जीव के देह और बिना जल के नदी, वैसे ही हे नाथ! बिना पुरुष के स्त्री है। हे नाथ! आपके साथ रहकर आपका शरद्‌-(पूर्णिमा) के निर्मल चन्द्रमा के समान मुख देखने से मुझे समस्त सुख प्राप्त होंगे॥4॥
॥ दोहा ॥

खग मृग परिजन नगरु बतु बलकल बिमल दुकूल। नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल॥65॥

भावार्थ:-हे नाथ! आपके साथ पक्षी और पशु ही मेरे कुटुम्बी होंगे, वन ही नगर और वृक्षों की छाल ही निर्मल वस्त्र होंगे और पर्णकुटी (पत्तों की बनी झोपड़ी) ही स्वर्ग के समान सुखों की मूल होगी॥65॥
॥ चौपाई ॥

बनदेबीं बनदेव उदारा। करिहृहिं सासु ससुर सम सारा॥ कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई॥॥

भावार्थ:-उदार हृदय के वनदेवी और वनदेवता ही सास-ससुर के समान मेरी सार-संभार करेंगे और कुशा और पत्तों की सुंदर साथरी (बिछौना) ही प्रभु के साथ कामदेव की मनोहर तोशक के समान होगी॥॥

कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू॥ छिनु-छिनु प्रभु पद कमल बिलोकी। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी॥2॥।

भावार्थ:-कन्द, मूल और फल ही अमृत के समान आहार होंगे और (वन के) पहाड़ ही अयोध्या के सैकड़ों राजमहलों के समान होंगे। क्षण-क्षण में प्रभु के चरण कमलों को देख-देखकर मैं ऐसी आनंदित रहूँगी जैसे दिन में चकवी रहती है॥2॥

बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे॥ प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना॥3॥

भावार्थ:-हे नाथ! आपने वन के बहुत से दुःख और बहुत से भय, विषाद और सन्ताप कहे, परन्तु हे कृपानिधान! वे सब मिलकर भी प्रभु (आप) के वियोग (से होने वाले दुःख) के लवलेश के समान भी नहीं हो सकते॥3॥

अस जियेँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि॥ बिनती बहुत करों का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी॥4॥

भावार्थ:-ऐसा जी में जानकर, हे सुजान शिरोमणि! आप मुझे साथ ले लीजिए, यहाँ न छोड़िए। हे स्वामी! मैं अधिक क्या विनती करूँ? आप करुणामय हैं और सबके हृदय के अंदर की जानने वाले हैं॥4॥
॥ दोहा ॥

राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान। दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान॥66॥

भावार्थ:-हे दीनबन्धु! हे सुंदर! हे सुख देने वाले! हे शील और प्रेम के भंडार! यदि अवधि (चौदह वर्ष) तक मुझे अयोध्या में रखते हैं, तो जान लीजिए कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे॥66॥
॥ चौपाई ॥

मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छितु चरन सरोज निहारी॥ सबहि भाँति पिय सेवा करिहाँ। मारग जनित सकल श्रम हरिहाँ॥॥

भावार्थ:-क्षण-क्षण में आपके चरण कमलों को देखते रहने से मुझे मार्ग चलने में थकावट न होगी। हे प्रियतम! मैं सभी प्रकार से आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलने से होने वाली सारी थकावट को दूर कर दूँगी॥॥

पाय पखारि बैठि तरु छाहीं। करिह्उँ बाउ मुदित मन माहीं॥ श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें॥2॥

भावार्थ:-आपके पैर धोकर, पेड़ों की छाया में बैठकर, मन में प्रसन्न होकर हवा करूँगी (पंखा झलूँगी)। पसीने की बूँदों सहित श्याम शरीर को देखकर प्राणपति के दर्शन करते हुए दुःख के लिए मुझे अवकाश ही कहाँ रहेगा॥2॥

सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाय पलोटिहि सब निसि दासी॥ बार बार मृदु मूरति जोही। लागिहि तात बयारि न मोही॥3॥

भावार्थ:-समतल भूमि पर घास और पेड़ों के पत्ते बिछाकर यह दासी रातभर आपके चरण दबावेगी। बार-बार आपकी कोमल मूर्ति को देखकर मुझको गरम हवा भी न लगेगी॥3॥

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा॥ मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहूँ भोगू॥4॥

भावार्थ:-प्रभु के साथ (रहते) मेरी ओर (आँख उठाकर) देखने वाला कौन है (अर्थात कोई नहीं देख सकता)! जैसे सिंह की स्त्री (सिंहनी) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते। मैं सुकुमारी हूँ और नाथ वन के योग्य हैं? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय भोग?॥4॥