काम के लिए काम
'चोट लगाते जाओ, चोट लगाते जाओ !' सफलता का पहला सिद्धांत है । कार्य बिना तुम कदापि सफल नहीं हो सकते । जीवन संग्राम में सुस्त आदमी का नष्ट हो जाना अटल है, वह नहीं जी सकता, उसे मरना ही होगा ।
लेकिन यहां एक सवाल उठता है जो बहुधा वेदांत के विरुद्ध उठाया जाता है । वैराग्य या त्याग का उपदेश देकर और परमात्मा की शांति और विश्राम की प्राप्ति को अपने उपदेश का अंग बनाकर क्या वेदांत सुस्त और अकर्मण्य नहीं बनाता है ? ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है । असलियत ऐसी नहीं है । ऐसा सिर्फ तब तक ही सोचा जाता है, जब तक हम त्याग का अर्थ नहीं समझते हैं, जब तक हमारे सामने यह स्पष्ट नहीं होता कि वेदांत की दृष्टि में कार्य (कर्म) का असली रूप क्या है ।
काम क्या चीज है ? इसे वेदांत की दृष्टि से हम यूं कह सकते हैं कि यह थकान नहीं, बल्कि सच्चे अर्थों में विश्राम की स्थिति है । 'काम विश्राम' है यह एक विस्मयकर कथन है, परस्पर विरोधी बयान-सा लगता है यह, लेकिन यही सत्य है । व्यवहार में भी ऐसा ही सिद्ध होता है । सबसे बड़े कामकाजी पर उस समय ध्यान दो, जब वह अपने काम की चोटी पर हो, जब वह खूब काम कर रहा हो । दूसरों की दृष्टि में उस समय वह बड़े प्रयत्न में लगा हुआ है, परंतु उसी के दृष्टिबिंदु से अगर आप उसे जांचेंगे तो पाएंगे कि उस समय वह कर्ता नहीं है । दूर से देखने वालों की दृष्टि में इंद्र-धनुष में अनेक सुंदर रंग होते हैं, परंतु मौके की जांच से मालूम हो जाता है कि उसमें किसी तरह का कोई भी रंग नहीं होता ।
समर में जिस समय नायक (नेपोलियन या वाशिंगटन कोई भी कह लो) लड़ रहा हो, अर्थात खूब लड़ रहा हो और अपने जौहर दिखला रहा हो, तब उस पर ध्यान दीजिए । आपको महसूस होगा कि शरीर मानो आपसे-आप यंत्रवत् काम कर रहा है, और मन इस दर्जे तक काम में लिप्त है कि 'मैं काम कर रहा हूं' का भाव बिल्कुल चला गया है ।
यही निरंतर कार्य अनजाने ही आपको योग की सर्वोपरि दशा में पहुंचाता है । खेलते समय आप भी इस सचाई का अनुभव कर सकते हैं । तब आपको समय का भी पता नहीं चलता ।
वेदांत चाहता है कि अतीव कार्य के द्वारा आप शरीर और चित्त को निरंतर इस दर्जे तक काम में लगा दें कि परिश्रम का बोझ ही न हो । गणित के किसी कठिन प्रश्न का यदि आपने समाधान प्राप्त किया हो, तो इस अनुभव से निश्चित रूप से आप गुजरे होंगे । याद कीजिए ! कार्य करते समय जब आप उसमें डूब जाते हैं, अर्थात जितना ही अधिक ऊंचा कोई मनुष्य इस भावना से उठ सकता है कि 'वह कार्य करनेवाला है', उतना ही अधिक श्रेष्ठ और उत्तम कार्य उसके द्वारा होता है ।
इस प्रकार वेदांत उद्योग, कर्म और कार्य करते हुए क्षुद्र अहंकार से उठने की शिक्षा देता है । वेदांत के अनुसार कुछ पाने के लिए कुछ खाने का यही रहस्य है । खोना और कुछ नहीं है, इस मान्यता को खोना है कि 'मैं करनेवाला हूं' । वेदांत की दृष्टि में यही योग है । यही योग की समाधि है । इसी रूप में वेदांत ईश्वर की कृपा प्राप्त होने की व्याख्या करता है ।
आपका यह अहंकार कि आप करने वाले हैं, ईश्वर के कार्यों में बाधा पहुंचाता है और आप जैसे ही अपने इस अहंकार से ऊपर उठते हैं, ईश्वर के कृपा-पात्र बन जाते हैं । बस, तभी प्रत्येक सफलता आपकी सेवा में प्रस्तुत हो जाती है ।
आइए, दीपक या प्रकाश से इस बात को समझें कि काम क्या वस्तु है । गैस या तेल का एक दीपक ले लीजिए । वाह ! रोशनी कैसी उज्ज्वल, चमकदार, प्रभापूर्ण, उत्तम और आकर्षक है । दीपक को गौरव और प्रभा किससे मिलती है ? निरंतर कार्य के द्वारा अहंता का अंत करने से । दीपक अपनी बत्ती और तेल को बचाने की चेष्टा करते ही अंधकारमय, असफलता का पुंज और सफलता से सर्वथा शून्य हो जाएगा । सफलता पाने के लिए दीपक को जलना ही चाहिए, उसे अपनी बत्ती और तेल नहीं बचाना चाहिए । वेदांत की यही शिक्षा है ।
यदि आप सफलता चाहते हैं, यदि आप समृद्धि चाहते हैं, तो आपको अपने कामों के द्वारा, अपनी ही दैनिक जीवनचर्या से अपने ही शरीर और नाड़ियों की आहुति देनी होगी, उपयोग की अग्नि में उसको जलाना होगा । आपको उन्हें काम में अवश्य लाना होगा । आपको अपने शरीर और चित्त का दाह करना होगा, उन्हें जलती हुई दशा में रखना पड़ेगा । अपने शरीर और चित्त को सूली पर चढ़ाओ, काम करो और तब तुमसे प्रकाश फैलेगा ।
सभी काम (कार्य) अपनी बत्ती तथा तेल को जलाने के सिवाय और कुछ नहीं हैं । दूसरे शब्दों में, 'मैं शरीर हूं, मैं करने वाला हूं ।' इस भाव से ऊपर उठो, इसी का नाम काम है । इसी से सफल बनोगे । अपने क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर पर पहुंचोगे ।
समस्त असली काम तभी पूर्ण होते हैं, जब आप शरीर आदि से ऊपर उठते हैं । भारत के सम्राट अकबर के दरबार में एक बार दो वीर (हिंदू भाई) पहुंचे—उन्होंने बादशाह से नौकरी पाने की प्रार्थना की । सम्राट ने उनकी योग्यता पूछी । उन्होंने कहा, 'हम शूरवीर हैं ।' बादशाह ने उनसे शूरवीरता का प्रमाण देने को कहा । अकबर के दरबार में वे आमने-सामने खड़े हो गए । उनके तीखी नोकवाले, लपलपाते हुए खांडे चमक उठे । दोनों ने अपने-अपने खंजरों की तीक्ष्ण नोक एक-दूसरे की छाती में अड़ाई । मुस्कुराते हुए वे प्रसन्नचित से एक-दूसरे की ओर बढ़े—बढ़ते चले गए ।
उनके हाथ दृढ़ थे, खंजर शरीर में घुसते जाते थे, किंतु शांतिपूर्वक और बिना सहमे वे दोनों एक-दूसरे के पास पहुंच गए । उनमें न हिचक थी, न कोई घबराहट, न ही किसी तरह का डर था । उनके शरीर रक्त बहाते हुए जमीन पर गिर पड़े । दोनों की आत्माएं एक हो गईं । उनकी वीरता का बड़ा ही विलक्षण प्रमाण बादशाह को मिल गया ।
यह इस बात का उदाहरण है कि सच्चा कार्य तभी पूरा होता है, जब अपने आपको निरूपण करनेवाला कार्यकर्ता अपना बलिदान कर देता है । डंक मारते समय भिड़ों (ततैयों) को अपने प्राणों की प्रतिष्ठा डंक में ही कर लेनी पड़ती है । प्लेटो (Plato) कहता हैं, 'The man who is his own master knocks in vain at the doors of poetry.' 'जो मनुष्य अपने आप ही का स्वामी है, उसका काव्य के द्वार पर खटखटाना व्यर्थ है ।' कारण साफ है, कविता उससे स्वतः बहती रहती है । उसे कविता के लिए किसी प्रकार का परिश्रम करने की जरूरत नहीं पड़ती ।
इस प्रकार वेदांत को जीवनचर्या में चरितार्थ करने से समस्त वैभव और सफलता की प्राप्ति होती है । सांसारिक मनुष्य के लिए निरंतर कार्य अर्थात निरंतर परिश्रम ही सबसे बड़ा योग है । जब आप अपने लिए या अपनी भीतरी दृष्टि से कुछ भी काम नहीं करते, तो संसार के लिए आप बहुत बड़े कामकाजी होते हैं ।
पुनः किसी दशा और वृत्ति में सफल काम हमारे लिए स्वाभाविक कैसे हो जाता है ? 'काम करो' यह कहना तो बड़ा सहज है, परंतु काम करना बड़ा कठिन है । प्रत्येक अपने क्षेत्र में नंबर वन बनना चाहता है, पर चाहते हुए भी वैसा बन नहीं पाता । क्यों चाहते हुए भी हम निकम्मेपन को तोड़ नहीं पाते ? क्यों परिश्रम में हमें आनंद नहीं मिलता ? क्या आपको कभी इस बात का अनुभव नहीं हुआ है कि काम करने की इच्छा होने पर भी आप चाहा हुआ काम नहीं कर सके ? और क्या आपके ध्यान में यह कभी नहीं आया कि किसी वक्त आपकी काम करने में अरुचि होने पर भी आपसे उच्चतर काम हो गया ?
क्या आपने यह नहीं देखा है कि कोई एक उच्चतर सत्ता है जो आपकी कार्य-योग्यता का शासन करती है ? कितनी बार क्या ऐसा नहीं होता कि मनुष्य सवेरे जागकर अपने को एक अद्भुत अकथनीय अवस्था में प्रकृति के पूर्ण अनुकूल पाता है ।
ऐसी अवस्था में वह अपनी लेखनी उठाता है और उसकी लेखनी से अत्युत्तम काव्य या तत्वज्ञान की धारा बह निकलती है । एक चित्रकार पलभर में एक ऐसा सुंदर चित्र बनाने में सफल हो जाता है, जिसे वह बरसों से नहीं बना पा रहा था । यह बात है कि नहीं ?
इस प्रकार हमें पता चलता है कि हम सभी में कोई एक ऐसी उच्चतर वस्तु है जो हमारी और आपकी कार्य करने की समस्त शक्तियों को ज्यादा उपयोगी बनाती है । यदि आप उस उच्चतर मनोवृत्ति से लाभ उठाएं तो आप स्वयं को अपनी उच्च दशा में रख सकते हैं । ऐसे में आपके हाथ से निकला हुआ काम सर्वांगपूर्ण और सुंदर होगा । इस तरह अपने अंतर्गत स्थित अपनी शक्ति को अनुभव कर, उसका उपयोग कर आप अपने कार्यों को अलौकिक बना सकते हैं । आप असंभव को संभव बना सकते हैं ।
कोई कलाकुशल या चित्रकार सड़क पर जाता है और वहां अनेक चेहरे देखता है । अलग-अलग चेहरों से अलग-अलग अंगों को वह इकट्ठा करता जाता है—उसे जो भी अच्छा लगता है । यह सारी प्रक्रिया अनजाने में होती है । चित्रकार नहीं जानता कि वह कुछ कर रहा है । परिणामस्वरूप वह खूबसूरत चित्र बनाता है । क्या आप बता सकते हैं कि चित्रकला का यह सुंदर काम कैसे हुआ ? क्या यह कार्य व्यक्ति विशेष (Personal) का किया हुआ था ? नहीं, यह कार्य भावात्मक (Impersonal) था । इस प्रक्रिया में चित्रकार में किसी प्रकार का कोई अहंकार नहीं है ।
'मैं करने वाला हूं' ऐसी भावना के आते ही आप पाएंगे कि चित्रकार विभिन्न चेहरों में सुंदर अंगों को लेकर उनसे सुंदर चित्र का निर्माण नहीं कर सकता । 'मैं कर रहा हूं' इस भावना के आते ही और भी ढेर सारी भावनाएं आ इकट्ठी होती हैं, जो सुंदर कार्य को कुरूप बना देती हैं ।
इस प्रकार आप देखते हैं कि आपका कार्य जितना ही अधिक भावात्मक होता है, और 'मैं कर रहा हूं' इस भावना से जितना ही अधिक आप ऊपर उठते हैं, जितना ही अधिक आप अहं का त्याग करते हैं, आपका काम उतना ही अधिक अच्छा होता है । वेदांत चाहता है कि संग या फल प्राप्ति की इच्छा को त्यागकर आप काम ही के लिए काम करें । कार्य को सफल बनाना हो तो आप परिणाम का विचार त्याग दें, फल या परिणाम की चिंता न करें । साधन और फल को एकसाथ कर दें अर्थात कार्य ही को परिणाम समझें ।
वेदांत चाहता है कि आपकी आंतरिक आत्मा स्वयं निश्चिंत रहे । अंतरात्मा तो शांत रहे और शरीर लगातार काम करता रहे, अर्थात गतिविद्या के नियमों का पालन करता हुआ शरीर काम में लगा रहे और अंतरात्मा सदैव, सभी अवस्थाओं में (स्थित्यात्मक) शांत रहे ।
हमारी स्वार्थमय बेचैनी ही हमारे काम को बिगाड़ देती है । इसलिए कार्य से संयुक्त शांति या निर्वाण के लिए काम करो ।