आत्म-त्याग अर्थात् सर्वत्याग की भावना
सर्वत्याग की भावना एक सरोवर (तालाब) और एक सरिता (नदी) में झगड़ा हुआ । तालाब ने नदी से कहा, ''ऐ नदी ! तू बड़ी मूर्ख है, अपना जल और ऐश्वर्य मत लुटा । समुद्र को इसकी जरूरत नहीं, वह अकृतज्ञ है । तू अपनी सकल संचित निधियां उसमें भले ही भरती जाए, परंतु वह उतना ही नमकीन तथा उतना ही खारा बना रहेगा, जितना आज है—उसका खारा पानी न बदलेगा । 'Do not throw pearls before swine'—'सूअर के सामने मोती मत फेंक । अपनी सब निधियां अपने ही पास रख !'
यह लौकिक बुद्धिमत्ता थी । अंत में विचार करने, फल की चिंता करने और परिणाम पर ध्यान देने को नदी से कहा गया था । किंतु नदी वेदांत के रहस्य जानती थी । सांसारिक बुद्धिमत्ता की यह बात सुनकर नदी ने उत्तर दिया, ''जी नहीं, परिणाम और फल मेरे लिए कुछ नहीं हैं—सफलता और असफलता मेरे लिए तुच्छ हैं, मैं काम करूंगी, क्योंकि मुझे काम प्यारा है, काम के लिए ही मैं काम करूंगी । काम ही मेरा ध्येय है, कर्मशीलता ही मेरा जीवन है । उद्योग ही मेरा प्राण और मेरी वास्तविक आत्मा है । मुझे काम करना ही होगा ।
नदी काम करती रही, समुद्र में लाखों घड़ों पर घड़े जल डालती रही । कंजूस और कम खर्च तालाब तीन-चार महीने में सूख गया । वह दुर्गंधयुक्त, सड़े हुए कूड़े से भरपूर हो गया, किंतु नदी ताजी और विशुद्ध बनी रही, उसके अमर सोते नहीं सूखे । नदी के मूल स्रोतों को परिपूर्ण करने के लिए चुपचाप और धीरे-धीरे समुद्र तल से जल लिया गया । मौसमी हवाएं (monsoon and trade winds) धीरे-धीरे तथा चुपचाप समुद्र से जल लेकर नदी के मूल को सदा ताजा रखती रहीं ।
ठीक इसी तरह वेदांत चाहता है कि आप कुतर्कों पर आधारित सरोवर की नीति को व्यवहार में न लाएं । स्वार्थ में अंधा सरोवर ही परिणाम की चिंता करता है और सोचता है कि 'मेरा और मेरे काम का क्या परिणाम होगा ?' काम के लिए तुम काम करो, तुम्हें काम करना ही चाहिए । काम ही तुम्हारा लक्ष्य होना चाहिए । और इस तरह वेदांत तुम्हें व्याकुलता और संताप देनेवाली कामनाओं से मुक्त कर देता है । इच्छाओं से स्वाधीनता का, जिसका वेदांत प्रचार करता है, यही अर्थ है ।
परिणामों के लिए व्याकुल न हों, लोगों से कोई आशा न रखें, अपने काम की कटु या अनुकूल आलोचना के लिए हैरान न हों । जो कुछ तुम कर रहे हो, उसे लोग स्वीकारते हैं या नहीं—इसकी चिंता न करो, इसका बिल्कुल विचार ही न करो । काम को काम ही के लिए करो । इस प्रकार तुम्हें अपने को कामना से मुक्त करना होगा । तुम्हें काम से नहीं, उत्सुकता की बेचैनी से मुक्त होना है ।
इस तरह तुम्हारा काम कितना महान हो जाता है । सब प्रकार की व्याकुल करनेवाली वासनाओं और प्रलोभनों का सबसे अच्छा और प्रभावशाली इलाज काम है । किंतु यह तो केवल निषेधात्मक (दोष हटानेवाला) उपदेश हुआ । सच्चे कार्य के साथ जो साक्षात सुख जुड़ा हुआ है, वह है मुक्ति का अथवा अनजाने में आत्म-अनुभव का एक कण । इस समय तुम परमेश्वर से जुंड़े होते हो । यह आनंद कार्य का सर्वोच्च और अटल इनाम है । हृदय की स्वार्थमय लालसाओं को पूरा करने के अभिप्राय से काम करके इस स्वास्थ्यजनक स्वर्गीय निधि को भ्रष्ट न करो ।
कामनाएं हमारी उन्नति को आगे बढ़ाने के बदले पीछे हटा देती हैं । बाह्य और स्थूल (घनीभूत) प्रलोभन हमारी परिश्रम करने की शक्ति के लिए सहायक होने के बदले हानिकारक सिद्ध होते हैं । जी जान से किए जानेवाले काम के साथ जो तात्कालिक आनंद लगा हुआ है, उससे बढ़कर सुखदायक और स्वास्थ्यकर कोई पुरस्कार या प्रशंसा नहीं हो सकती ।
तो फिर काम में जो वैराग्य, धर्म या उपासना निहित है उसे प्राप्त करने के लिए काम करो, न कि बच्चों के खिलौनों के लिए—जो कि फल के रूप में मिलनेवाले हैं । किसी तरह की जिम्मेदारी न समझो, कोई इनाम न मांगो । 'अभी यहां' 'now here' तुम्हारा लक्ष्य होना चाहिए ।
लोग कहते हैं, 'first deserve and then desire' अर्थात् पहले योग्य बनो, तब इच्छा करो । वेदांत कहता है, 'deserve only and need not desire' अर्थात केवल योग्य बनो, इच्छा करने की कोई जरूरत नहीं ।' 'A stone that is fit for the wall will never be found on the way' अर्थात जो पत्थर दीवार के काबिल है, वह सड़क पर कभी न मिलेगा । यदि तुममें पात्रता है तो एक अनिवार्य दैवी नियम से सब वस्तुएं तुम्हारे पास आ जाएंगी । यदि कोई दीपक जल रहा है, तो उसे पतंगों को बुलाने के लिए निमंत्रण-पत्र नहीं भेजना पड़ता । पतंगे अपनी इच्छा से ही दीपक को आ घेरते है । जहां कहीं ताजा चश्मा (जलस्रोत) है, लोग स्वयं वहां पहुंच जाएंगे—चश्मे को लोगों की दमड़ीभर भी परवाह करने की जरूरत नहीं । जब चंद्रोदय होगा, तो लोग आप ही चांदनी का आनंद लूटने के लिए निकल आएंगे । बढ़े चलो ! बढ़े चलो ! चोट लगाओ ! चोट लगाते जाओ ! आत्मा की परम वास्तविकता का अनुभव करने के लिए काम करो, काम करो ।
इस तरह सांसारिक कर्म में भी तुम्हें निर्वाण और कैवल्य का स्वाद मिलेगा । और इस प्रकार जब अपने व्यक्तित्व तथा अहं भाव को श्रम की सूली पर तुम चढ़ा चुकोगे, तब सफलता तुम्हें ढूंढ़ेगी और तब तुम्हारी प्रशंसा करनेवाले लोगों की कमी न होगी ।
ईसा जब तक जीते थे, लोगों ने उन्हें नहीं माना, पूजे जाने के पहले सूली पर चढ़ना उनके लिए जरूरी था, 'Truth crushed to earth shall rise again'—'धूल में मिलाया हुआ सत्य फिर उठेगा ।' अपने रंग-रूप को बिना बिगाड़े कोई बीज उगने और वृद्धि प्राप्त करने में समर्थ नहीं हो सकता । इस तरह सफलता के लिए दूसरी आवश्यकता है बलिदान की, क्षुद्र आत्मा को सूली पर चढ़ाने की, अर्थात त्याग की । 'त्याग' शब्द का अनर्थ न करना । 'त्याग' का अर्थ फकीरी नहीं है ।
हर एक आदमी सफेद, ज्योतिर्मान, चमकदार व चटकीला होना चाहता है । आप कैसे गौरवशाली हो सकते हैं ? पदार्थ सफेद क्यों हैं ? इसके कारण को जानने के लिए आइए सफेद पदार्थों की ओर देखिए । उनमें इतनी सफेदी कहां से आई ? विज्ञान आपको बतलाता है कि सफेदी का रहस्य आत्म-त्याग का परिणाम है । सूर्य-किरणों के सातों रंग विविध पदार्थों से टकराते या उन पर गिरते हैं । कुछ पदार्थ तो इनमें से अधिकांश को अपने में लीन कर लेते और रख लेते हैं, और केवल एक को फिर बाहर निकालते हैं ।
ऐसे पदार्थ सिर्फ एक उसी रंग के कहे जाते हैं, जिसे वे लौटाते या नहीं ग्रहण करते हैं । तुम उस वस्त्र को गुलाबी रंग का कहते हो, परंतु यही गुलाबी रंग उस वस्त्र का नहीं है । जो रंग उसने अपना लिये हैं और वास्तव में उसमें हैं, उन रंगों का तुम उसे (वस्त्र को) नहीं कहते । कैसी विचित्र बात है । काले पदार्थ सूर्य-किरणों के सब रंग पचा जाते हैं । वे कोई रंग बाहर नहीं निकालते, वे कुछ नहीं त्यागते, वे कुछ नहीं लौटाते, इसी से वे काले हैं अर्थात अंधकारमय हैं ।
सफेद पदार्थ अपने में कुछ नहीं खपाते, किसी चीज को अपना नहीं बनाते, वे सर्वस्व त्याग करते हैं । वे स्वार्थपूर्ण अधिकार रखना नहीं चाहते । स्वामित्व की भावना उनमें नहीं है । इसी कारण वे श्वेत हैं, उज्ज्वल हैं, चमकीले हैं और प्रभापूर्ण हैं ।
इसी तरह यदि आप गौरवान्वित और समृद्धिशाली होना चाहते हैं तो आपको अपने अंतःकरण को स्वार्थपूर्ण और स्वामित्व की भावना से ऊपर उठाना पड़ेगा । आपको उसके ऊपर उठना चाहिए । हमेशा दाता बनो, स्वतंत्र कार्यकर्ता बनो । अपने दिल को मंगतापन और आशा की दशा में कभी न रखो । एकाधिकार करने की आदत से छूटो ।
आपके फेफड़ों में जो हवा है उस पर एकमात्र आपका ही दावा क्यों हो ? वह हवा हर एक व्यक्ति की संपत्ति है । इसके विपरीत अपने फेफड़ों की वायु की अल्प मात्रा का उपयोग करना जब आप छोड़ देते हैं, तब आप समस्त वायुमंडल का अधिकारी अपने आपको पाते हैं, आपके साधन असीम हो जाते हैं । विश्व की प्राणप्रद वायु (Oxygen) का पान करो । अभिमानी मत बनो, दर्प न करो । कभी मत समझो कि कोई वस्तु आपके परिच्छिन्न आत्मा की है । वह ईश्वर की और आपके वास्तविक आत्मा की है ।
सर आइजक न्यूटन (Sir Issac Newton) का उदाहरण लीजिए । संसार की दृष्टि में इतना प्रभावशाली, उज्ज्वल, गौरवशाली वह क्योंकर हुआ ? जिस भावना से उसने अपने जीवन में काम किया था, वह उसके मरने के समय मालूम हुई थी । संसार का सर्वश्रेठ पुरुष होने की बधाई पाने या प्रशंसित होने पर उसने कहा, Oh, no, this intellect or this small personality of mine is simply like a little child gathering pebbles on the vast immense sea-shore of knowledge. नहीं, यह बुद्धि अथवा मेरा यह क्षुद्र व्यक्तित्व ज्ञान के विराट तथा विशाल समुद्र के तट पर पत्थर बटोरनेवाले छोटे बच्चे के तुल्य है । वह अब भी बालू पर पड़ा हुआ पत्थर बटोर रहा था ।
इस प्रकार हमें उस विनीत भावना के दर्शन होते हैं, जो किसी वस्तु पर भी अपना अधिकार नहीं जमाती, जो किसी चीज को भी सिर्फ अपनी नहीं बनाती, जो परिच्छिन्न आत्मा तथा अहंकार को नहीं बढ़ाती । जो उसी भावना से कार्य करती है, जिस भावना से आपकी सामर्थ्य और आपकी कार्य करने वाली शक्तियां ऊंचाइयों को प्राप्त होती हैं । यही स्वरूप वेदांत की भावना का है ।
तुममें सब प्रकार की कामनाएं हैं, तुम चाहते हो कि तुम्हारी इच्छाएं पूरी हों । किंतु इच्छाओं की पूर्ति की कुंजी जानो । खिड़की के परदे को हम कैसे चढ़ाते हैं ? खिड़की के परदे को जब हम चढ़ाना चाहते हैं जब उसे नीचे की ओर एक झटका देकर छोड़ देते हैं, और खिड़की का परदा चढ़ जाता है । तुम्हारी समस्त कामनाओं की पूर्ति के रहस्य का यह दृष्टांत है ।
जब भी तुम इच्छा को छोड़ देते हो, तभी वह फलीभूत होती है । तीर कैसे छोड़े जाते हैं ? हम धनुष को लेकर झुकाते हैं । जब तक हम धनुष की तांत को खींचते रहते हैं, तब तक बाण शत्रु तक नहीं पहुंचता । तांत को तुम चाहे जितना तानो, बाण तुम्हारे ही पास रहेगा । जब तुम तांत छोड़ देते हो तभी तीर तुम्हारे शत्रु की छाती छेदने के लिए सनसनाता हुआ छूट जाता है और अपने लक्ष्य को भेद देता है ।
इसी तरह से जब तक तुम अपनी कामना को ताने रहोगे, अथवा इच्छा, अभिलाषा या कामना करते रहोगे तथा उत्सुक रहोगे तब तक वह दूसरे पक्ष के अंतःकरण तक न पहुंचेगी । जब तुम उसे छोड़ देते हो, तभी वह इच्छित वस्तु की आत्मा में प्रवेश करती है । 'It is only when you leave me and lose me that you find me by your side'—'जब तुम छोड़ देते और खो देते हो, केवल तभी तुम मुझे अपने पास पाते हो । 'जब तुम अपने को उस विचित्र अकथनीय भाव में ढालते हो, जो हम-तुम दोनों से उच्चतर है, केवल तभी मुझे पाते हो । वेदांत यही आपको बताता है ।
दो साधु एकसाथ यात्रा कर रहे थे । उनमें से एक ने धन संचय की वृत्ति या भावना को कायम रखा । दूसरा वैरागी था । नदी-तट पर पहुंचने तक वे ग्रहण और त्याग के विषय में तर्क- वितर्क करते रहे । कुछ रात बीत चुकी थी । त्याग का उपदेश देने वाले साधु के पास कौड़ी पैसा न था, जबकि दूसरे के पास था । त्यागी साधु ने कहा, ''शरीर की हमें क्या चिंता है, मल्लाह को देने को हमारे पास पैसा नहीं है, ईश्वर का नाम भजते हुए इसी तट पर हम रात काट देंगे ।'' रुपये वाले साधु ने उत्तर दिया, ''यदि हम नदी के इसी पार रहे तो कोई गांव, झोंपड़ी तथा साथी हमें नसीब न होंगे बल्कि भेड़िए हमें खा जाएंगे, सांप डस लेंगे, सर्दी ठिठुरा देगी । हमें उस पार उतर चलना चाहिए । मल्लाह को उतराई देने के लिए मेरे पास पैसा है । उस पार एक गांव है, वहां हम आराम से रहेंगे ।''
मल्लाह नाव लाया और दोनों को उसने उस पार उतार दिया । जिस साधु ने उतराई दी थी वह रात को त्यागी साधु से कुछ ताव से बोला, ''पैसा रखने का फायदा तुम्हें समझ पड़ा या नहीं ? मेरे पास पैसा होने से दो जानें बच गईं । आज से तुम कभी त्याग का उपदेश न देना । तुम्हारी तरह मैं भी त्यागी होता तो हम दोनों भूखे मर जाते या ठिठुर जाते और नदी के उस तट पर मर जाते ।''
त्यागी साधु ने उत्तर दिया, ''यदि तुमने धन अपने पास ही रखा होता, यदि तुम उससे किनारा न करते, यदि तुमने उसे केवट को न दे दिया होता तो हम उस किनारे पर ही मर जाते । इस प्रकार रुपये के त्याग या दान से ही हमारी रक्षा हुई । इसके सिवाय...''
त्यागी साधु ने फिर कहा, ''जब मैंने अपनी जेब में बिल्कुल रुपया नहीं रखा था तभी तुम्हारी जेब भी मेरी जेब हो गई । मेरे विश्वास की बदौलत ही तुम्हारे पास रुपये थे । मुझे कभी क्लेश नहीं होता । जब कभी मुझे आवश्यकता होती है, वह पूरी हो जाती है ।''
यह कहानी संकेत करती है कि जब तक तुम अपनी इच्छाओं को अपनी जेब में रखते हो, तब तक अशांत और असुरक्षित से महसूस करते हो । तुम्हें तब तक शांति और सुरक्षा का अनुभव नहीं होगा, जब तक तुममें त्याग की भावना नहीं आती ।