श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

प्रेम : एकता का अनुभव

अध्याय 4 / 9 · सफलता के आध्यात्मिक सूत्र
अध्याय 4 / 9

प्रेम : एकता का अनुभव

सफलता का तीसरा सिद्धांत है—प्रेम । प्रेम का क्या अर्थ है ? प्रेम का अर्थ है अपने पड़ोसियों और संपर्क में सभी आने वालों से असली तौर पर अपनी एकता और अभेदता का अनुभव करना । यदि आप दुकानदार हैं तो जब तक आप अपने ग्राहकों के लाभ और अपने लाभ को एक न समझेंगे, तब तक आप कोई उन्नति न कर सकेंगे, आपके काम को हानि पहुंचती रहेगी । यदि हाथ अपने स्वार्थ के कारण शरीर के अन्य अंगों के संदर्भ में इस प्रकार तर्क करे—''देखो, मैं दायां हाथ सब तरह का परिश्रम करता हूं, मेरी पसीना बहानेवाली कठिन कमाई में से थोड़ा-सा भी भाग शरीर क्यों ले ? क्या मेरे श्रम से कमाया हुआ भोजन पेट को और वहां से अन्य सब अवयवों को मिलना चाहिए ? नहीं, नहीं ! मैं सबकुछ अपने लिए ही रखूंगा !''

इस स्वार्थपूर्ण कल्पना को चरितार्थ करने के निमित्त हाथ के लिए इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं कि भोजन को लेकर वह पिचकारी अथवा नश्तर द्वारा अपने चमड़े में प्रविष्ट कर ले । क्या यह विधि हाथ के लिए लाभदायक होगी ? क्या इस रीति से हाथ को सफलता होगी ? असंभव ! कदापि नहीं ।

हां, एक तरह से हाथ खूब मोटा हो सकता है, अकेला ही इतना संपत्तिवान हो सकता है कि शरीर के अन्य सब अंग उससे स्पर्धा करें । बरैया, मधुमक्खी या सांप को पकड़कर हाथ अपने को कटवा ले, तो हाथ खूब मोटा अथवा खूब भारी हो जाएगा । हाथ की स्वार्थपरता पूरी होने का केवल यही एक उपाय है, इसी रीति से हाथ का स्वार्थमय शास्त्र चरितार्थ किया जा सकता है । किंतु कितना सही है यह उपाय ? इस तरह की तृप्ति या सफलता हम नहीं चाहते हैं, क्योंकि यह तो रोग है ।

इसी तरह, याद रखो कि संपूर्ण जगत एक शरीर है । तुम्हारा शरीर हाथ की तरह एक अवयव है, केवल उंगली या नख के तुल्य है । यदि तुम सफल होना चाहते हो, तो तुम्हें अपने आत्मा को अखिल विश्व के आत्मा से भिन्न और पृथक नहीं समझना चाहिए । हाथ के फलने-फूलने के लिए यह आवश्यक है कि वह समग्र शरीर के हितों से अपने हितों की अभेदता का अनुभव करे । दूसरे शब्दों में, हाथ को यह समझना और अनुभव करना होगा कि उसका आत्मा केवल कलाई तक की सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे व्यावहारिक रूप से समग्र शरीर के आत्मा से अपने को एक और अभिन्न समझना पड़ेगा । समग्र शरीर के आत्मा को खिलाना हाथ के आत्मा को खिलाना है ।

जब तक तुम इस तथ्य का अनुभव और इस सत्य का आचरण न करोगे कि 'तुम और विश्व एक हो, कि मैं और ईश्वर एक हूं', तब तक तुम्हें सफलता नहीं मिल सकती । एकता के पवित्र नियम को तोड़ते ही मूर्ख तथा स्वार्थी हाथ की तरह तुम्हें अपने धर्मोल्लंघन के लिए अवश्य क्लेश भोगना पड़ेगा । 'एनशेन्ट मैरीनर' (Ancient Mariner) नामक अपनी पुस्तक में कोलरिज (Coleridge)ने बड़ी सुंदरता से इस सत्य को प्रकट किया है । 'प्रिजनर ऑफ चिल्लन' (Prisoner of Chillon) नामक पुस्तक में बाइरन (Byron) ने भी ऐसा ही किया है । इन पद्यों में यह सिद्ध किया गया है कि जब कभी कोई मनुष्य प्रकृति से बेमेल हो जाता है, तब उसे क्लेश होता है । उसी क्षण संपूर्ण समृद्धि तुम्हारी होती है, जिस क्षण प्राणिमात्र से तुम अपनी एकता अनुभव करते हो ।

''He prayeth best who loveth best, Both man and bird and beast. He prayeth well who loveth well, All thing both great and small.''

''वही सर्वोत्तम प्रार्थना करता है, जो मनुष्य और पशु-पक्षी दोनों को सबसे बढ़कर प्रेम करता है ।''

एक राजा एक वन में शिकार खेलने गया । आखेट (शिकार) की उत्तेजना में राजा अपने साथियों से बिछड़ गया । भयंकर सूर्य-ताप के कारण उसे बड़ी प्यास लगी । वन में उसे एक छोटा बगीचा दिखाई पड़ा । वह बाग में गया । परंतु शिकारी पोशाक में होने के कारण माली उसे न पहचान सका । बेचारे जंगली माली ने राजा के दर्शन कभी नहीं किए थे ।

राजा बड़ा प्यासा था, उसने माली से कुछ पेय लाने के लिए कहा । माली तुरंत बगीचे में गया, कुछ अनार लिये, उनका रस निचोड़ा और एक बड़ा कटोरा भरकर राजा के पास लाया । राजा एक ही बार में सब गटक गया, परंतु उसकी कंठ सुखाने वाली प्यास पूरी तरह से नहीं बुझी ।

राजा ने उससे और अनार का रस लाने को कहा । माली लेने गया । माली के चले जाने पर राजा अपने मन में सोचने लगा, 'यह बाग खूब फला-फूला जान पड़ता है । बात की बात में माली ताजे अनार-रस से भरा हुआ कटोरा ले आया । ऐसी समृद्धिशाली संपत्ति के मालिक पर भारी आय-कर लगना चाहिए ।' इत्यादि-इत्यादि ।

दूसरी ओर, माली को देर होती गई, वह घंटेभर में भी राजा के पास न लौटा । राजा को आश्चर्य होने लगा, 'यह क्या बात है कि पहली बार जब मैंने उससे कुछ पीने को मांगा था, तब तो वह एक मिनट से कम में ही अनार का रस ले आया था जबकि इस बार लगभग एक घंटे से वह अनारों का रस निचोड़ रहा है, किंतु कटोरा नहीं भरा । यह क्या मामला है ?'

एक घंटे के बाद कटोरा राजा के पास लाया गया, परंतु वह लबालब नहीं भरा था । राजा ने पूछा कि कटोरा कुछ खाली क्यों है, जबकि पहली बार इतनी जल्दी कटोरा भर गया था ? माली महात्मा था । उसने उत्तर दिया, 'जब मैं अनार-रस का पहला कटोरा आपके लिए लाने गया था, तब हमारे इस बगीचे के मालिक, राजा के बड़े साधु विचार थे लेकिन जब मैं आपके लिए दूसरा कटोरा लाने गया, तब हमारे राजा का कृपालु तथा उदार स्वभाव अवश्य बदल गया होगा । अपने अनारों के रसीलेपन में इस आकस्मिक परिवर्तन का कोई दूसरा कारण मैं नहीं बता सकता ।''

राजा को तब पता चला कि बगीचे का मालिक और कोई नहीं, वह स्वयं है । उसने अपने मन में सोचा कि बात तो बिल्कुल ठीक है । जब राजा ने पहले बगीचे में पैर रखा था, तब वहां के लोगों के लिए उसकी बड़ी ही उदार और प्रेममय वृत्ति थी, वह अपने मन में विचारता था कि ये लोग बड़े दीन हैं और सहायता के अधिकारी हैं, किंतु जब बूढ़ा माली बात की बात में अनार-रस से भरा कटोरा उसके लिए ले आया, तब राजा का मन बदल गया । राजा का प्रकृति के ताल से बेताल हो जाने का प्रभाव बाग के अनारों पर भी पड़ा । देखा न आपने, इधर राजा से प्रेम का नियम भंग हुआ, उधर वृक्षों ने उसे रस पहुंचाना बंद कर दिया ।

कहानी सच्ची हो या झूठी, इससे हमारा कोई प्रयोजन नहीं । किंतु यह सत्य है कि जब तक प्रकृति के हम पूरे अनुकूल रहेंगे और जब तक हम हर एक से अपनी एकता का भान तथा अनुभव करते रहेंगे, तब तक सभी परिस्थितियां और आसपास की चीजें, हवा और लहरें तक हमारे पक्ष में रहेंगी । जिस क्षण हमारी सर्व से भिन्नता होगी उसी क्षण हमारे अपने मित्र और संबंधी हमारे विरोधी हो जाएंगे, उसी क्षण सारे संसार को आप अपने विरुद्ध सशस्त्र खड़ा कर लेंगे ।

प्रेम के इस दैवी विधान को समझो और व्यवहार में बरतो । प्रेम सफलता का एक सजीव सिद्धांत है ।