श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

प्रसन्न रहो, प्रसन्नता बांटो

अध्याय 5 / 9 · सफलता के आध्यात्मिक सूत्र
अध्याय 5 / 9

प्रसन्न रहो, प्रसन्नता बांटो

सफलता का चौथा सिद्धांत चित्त की स्थिरता अथवा प्रसन्नता है और स्थिरता या प्रसन्नता कैसे रखी जा सकती है ? 'प्रसन्न रहो, शांत रहो अथवा सावधान रहो,' यह कहना बड़ा सरल है किंतु सब अवस्थाओं में प्रसन्न, शांत और सावधान रहना बड़ा कठिन है । केवल नियम बना डालने से तुम प्रसन्न नहीं हो सकते । कृत्रिम नियमों से तुम कुछ भी नहीं कर सकते । तो फिर स्वयं को प्रसन्न कैसे कर सकते हैं ?

तुम्हारे भाव किसके अधीन होते हैं ? वेदांत बताता है कि जब हम शरीर या तुच्छ अहंकार और प्रबल आकांक्षाओं के स्थल पर उतर आते हैं, तभी हम रुष्ट, प्रसन्नतारहित, मलिन चित्त, उदास और शोकातुर होते हैं । केवल तभी हमारी स्थिरता जाती रहती है ।

क्या यह सच नहीं है कि हमें अपने पेट का खयाल तभी होता है, जब वह रोगी होता है । हमें अपनी नाक का ध्यान तभी होता है जब सर्दी लगती या जुकाम होता है । जब बांह में पीड़ा होती है, तभी हमें उसका खयाल होता है । इसी तरह जब हमारी आध्यात्मिक व्यवस्था बिगड़ जाती है, केवल तभी हममें व्यक्तिगत अहंकार, परिछिन्नात्मा या शरीर का खयाल उठता है । शरीर के प्रति आसक्ति और तुच्छ अहंकार के प्रति चिंता—ये दोनों आध्यात्मिक रोग हैं, अप्रसन्नता और अस्थिरता जिसका परिणाम है ।

हमारी शारीरिक निर्बलता ज्यों ही अपना रंग जमाती है, त्यों ही हम स्वर्ग के सुहावने उपवन, नंदन कानन से गिर पड़ते हैं । भेद और भिन्नता के वृक्ष के फल को जीभ पर रखते ही हम वैकुंठ से नीचे फेंक दिए जाते हैं । किंतु देह को सूली पर चढ़ाना अंगीकार करके हम खोए हुए स्वर्ग को वापस पा सकते हैं । जिस क्षण तुम शरीर से तथा क्षुद स्वार्थपूर्ण, नीच, तुच्छ और छोटी-छोटी आसक्तियों से ऊपर उठते हो, उसी क्षण अपनी स्थिरता और प्रसन्नता को वापस पा सकते हो ।

इस प्रकार प्रसन्नता, चित्त की स्थिरता या धैर्य पाने के लिए तुम्हें वेदांत की मुख्य शिक्षा अर्थात इस नित्य सत्य को अमल में लाना होगा कि 'मेरी सच्ची आत्मा' या मेरा वास्तविक स्वरूप एकमात्र यथार्थ तत्व है बाकी सब खेलमात्र है ।

'Honour and disgrace from no condition rise. Act well you part, there all the honour lies.'

'मान और अपमान की उत्पत्ति किसी दिशा से नहीं होती, अपना कर्म भली-भांति निबाहो, इसी में सब मान (इज्जत) है ।'

वेदांत सिखाता है कि तुमको अपनी परिस्थितियों और अड़ोस-पड़ोस से व्याकुल नहीं होना चाहिए । दैवी विधान (Law) को जानो और सभी तरह के भयों को झाड़ फेंको ।

क्या तुमने यह नहीं देखा कि न्यायाधीश जैसे ही अपनी कुर्सी पर आकर बैठता है, सब स्वयमेव व्यवस्थित हो जाता है । वह कुछ नहीं करता, वह केवल अपनी कुर्सी पर बैठता है । क्या तुमने ऐसा अनुभव नहीं किया कि सूर्य के उदित होते ही पूरी प्रकृति सक्रिय और व्यवस्थित हो जाती है । पूरी प्रकृति मानो सजीव हो जाती है । इस बदलाव के लिए सूर्य का उदित होना मात्र काफी है ।

भारत के श्रेष्ठतम शूरवीर राम के संबंध में यह प्रसिद्ध है कि जब वे सीताजी को, जो दिव्य विद्यारूपिणी हैं, पुनः प्राप्त करने चले, तब समस्त प्रकृति ने उनको सहायता की । वानरों, पक्षियों, गिलहरियों और जल, पवन, पत्थरों तक ने उनका पक्ष लेने में एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर सहायता देने की चेष्टा की ।

कभी सोचा है तुमने कि हर एक व्यक्ति बच्चे की गुलामी क्यों करता है ? नन्हा उपद्रवी बच्चा परम बलवान कंधों पर चढ़ता और मुकुटधारी सिरों के बाल नोचता है । क्यों होता है ऐसा ? इसलिए, क्योंकि बच्चा परिस्थितियों से परे, अर्थात परमात्मा में अज्ञात भाव से निवास करता है ।

यदि तुम अपने कर्तव्य को पालते हो, यदि तुम अपने धर्म का पालन करते हो, तो बाहरी सहायता या मदद की परवाह मत करो । वह अवश्य तुम्हें मिलेगी । लोगों को तुम्हारी मदद करने के लिए विवश होना ही पड़ेगा । शरीर के किसी भाग में जब खुजली मालूम पड़ती है, तब हाथ आपसे आप खुजलाने के लिए क्या उस भाग पर नहीं पहुंच जाता ? ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हाथ के नीचे जो शक्ति या आत्मा है, खुजली के स्थान के नीचे भी वही शक्ति विराजमान है ।

याद रखो कि ठीक इसी तरह तुममें जो आत्मा है, वह वही आत्मा है जो आसपास में या अगल-बगल की वस्तुओं में है और जब तुम्हारा मन इस परमात्मा से एकरूप होकर लहराता है तथा समग्र संसार तुम्हारा अपना शरीर हो जाता है, तब बाहरी सहायताएं और उपकार स्वभावतः और अनायास उड़कर उसी तरह तुम्हारे पास आ जाएंगी, जिस तरह खुजली की जगह पर हाथ अनायास पहुंच जाता है ।

जब हम अपनी प्रतिच्छाया को पकड़ने दौड़ते हैं, तो वह कभी हाथ नहीं आती, छाया हमेशा हमसे आगे ही दौड़ेगी । किंतु यदि प्रतिच्छाया की ओर पीठ फेरकर हम सूर्य की ओर दौड़ें, तो वह हमारा पीछा करेगी—ठीक इसी तरह जिस क्षण तुम इन बाहरी पदार्थों की ओर मुंह करके इन्हें पकड़ना और रखना चाहोगे, उसी घड़ी ये तुम्हारी पकड़ से बच जाएंगे, तुमसे आगे दौड़ेंगे । और ज्यों ही तुम उनकी ओर से पीठ फेरोगे और प्रकाशों के प्रकाश अर्थात अपने अंतरात्मा की ओर मुंह करोगे, त्योंही अनुकूल अवस्था तुमको ढूंढ़ेगी । यही दैवी विधान है ।

'कर्तव्य' के नाम से ही अधिकांश लोग घबरा उठते हैं । कर्तव्य हव्वे की तरह उन्हें सताता है, उन्हें चैन नहीं लेने देता, हर घड़ी उनसे सिर पर सवार रहता है । याद रखो कि संपूर्ण कर्तव्य को अपने ऊपर लानेवाले वास्तव में तुम ही हो । तुम अपनी ही इच्छा की सेवा करते हो किसी दूसरे की नहीं । तुम्हारा वर्तमान अड़ोस-पड़ोस तुम्हारी ही रचना है, संबंधों की छोटी-सी दुनिया तुम्हारी ही कारीगरी है, तुम्हारा भविष्य तुम्हारा ही बनाया हुआ होगा । अपने प्रारब्ध के कर्ता तुम्ही हो । इसे जानो और प्रसन्न होओ अर्थात गद्गद होओ ।

We build our future thought by thought; For good or bad and know it not. Thought is another name for fate; Choose, then thy destingy, and wait. Mind is the master of its sphere; Be calm be steadfast and sincere; Fear is the only foe to fear. Let the god in thee rise and say. To adverse circumstances—'obey', And thy dear wish shall have its way. निरंतर संकल्पों से हम अपना भविष्य गढ़ते हैं । बुरा या भला और यह जानते तक नहीं हैं कि प्रारब्ध ही का दूसरा नाम संकल्प है । तो फिर अपना नसीब चुन लो और उसकी राह देखो । मन उसके क्षेत्र का स्वामी है, अतएव शांत, तत्पर और सच्चे रहो, भय ही एक मात्र भयंकर शत्रु है । तुममें जो ईश्वर है उसे उदय होने और कहने दो । ओ विपरीत अवस्था ! मेरी आज्ञा मान । और तब मेरी प्यारी इच्छा पूरी हो जाएगी ।

किसी प्रकार समय काटने को मजदूर की तरह काम न करो । आनंद के लिए, उपयोगी कसरत समझकर, सुख-क्रीड़ा अथवा मनोरंजक खेल समझकर कुलीन राजकुंअर की तरह काम करो । दबे हुए दिल से कदापि किसी काम को हाथ में न लो । सावधान हो जाओ । अनुभव करो कि महाराजा और राष्ट्रपति तुम्हारे चाकर मात्र हैं । नक्षत्रों की तरह काम करो ।

Undismayed at all the things about them, Unaffrighted at the things they see, These demand not that the things without them Yield them love, amusement, sympathy The exqusite reward of song Was song—the self same thrill and glow Which to unfolding flowers belong, And wrens thrushes know. अपने समीप की सब चीजों से बिन भय खाए, दिखाई पड़नेवाली वस्तुओं से बिन भयभीत हुए, ये नहीं मांगते इनसे 'पृथक' चीजें, इन्हें प्रेम, मनोरंजन व सहानुभूति अर्पण करें, गाने का अनोखा पुरस्कार जो गान था—अपनी ही किलक (किलकारी) और दमक और जिसे बुलबुले तथा लाल जानते हैं ।

किसी तरह की जिम्मेदारी भान न करो अर्थात किसी दूसरे के लिए काम न करो । स्वयं से अपनी आत्म से पूछो कि अमुक काम तुम्हें करना चाहिए कि नहीं । वहीं से तुम्हें सच्चा इनाम मिलेगा ।