श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

मारो भय पिशाच को

अध्याय 6 / 9 · सफलता के आध्यात्मिक सूत्र
अध्याय 6 / 9

मारो भय पिशाच को

अब हम सफलता के पांचवें सिद्धांत निर्भीकता पर आते हैं । वेदांत और निर्भीकता को अलग नहीं किया जा सकता ।

निर्भीकता सफलता के लिए बहुत जरूरी किस तरह है, इसके लिए अपने अनुभव में आई हुई एक बात का उदाहरण दिया जाएगा । हिमालय के वन में एक बार पांच रीछ एक साथ ही राम के सामने आ गए, परंतु उन्होंने उसे (राम को) जरा भी नहीं सताया । क्यों हुआ ऐसा ? केवल निर्भयता के कारण । राम में यह भावना भरी हुई थी—'मैं शरीर नहीं हूं, मैं चित्त नहीं हूं, मैं परब्रह्म हूं, मैं ईश्वर हूं, अग्नि मुझे जला नहीं सकती, अस्त्र मुझे घायल नहीं कर सकते ।' उनसे नजर मिलाई गई और वे भाग गए । एक बार जंगली भेड़िया इसी तरह भगाया गया । दूसरी दफा एक चीता यों ही चलता बना ।

जब बिल्ली आती है तो कबूतर अपनी आंखें बंद कर लेते हैं । वे समझते हैं कि हम बिल्ली को नहीं देखते, इसलिए बिल्ली भी हमें नहीं देखती । फिर भी बिल्ली उन्हें खा ही जाती है । यदि तुम डरोगे तो बिल्ली तुम्हें खा जाएगी । क्या तुमने यह खयाल नहीं किया है कि नगर से बाहर के मुहल्लों में से गुजरते हुए जब हम नाममात्र को भयभीत होने के लक्षण दिखाते हैं, तो कुत्ते हम पर झपट पड़ते हैं ।

यदि हम डरेंगे, तो कुत्ते भी हमें नोच डालेंगे । किंतु यदि हम निडर हैं, तो हम सिंहों और चीतों को भी जीत सकते हैं । एक पात्र से दूसरे पात्र में तरल पदार्थ डालते समय यदि हमारे हाथ जरा-से कांप जाते हैं, तो अवश्य ही वह वस्तु गिर जाती है । भ्रम रहित होकर, निर्भयता के साथ तथा विश्वासपूर्वक तरल पदार्थ दूसरे बरतन में उलटोगे, तो एक बूंद भी नष्ट नहीं होगी ।

भय और संदेह से ही तुम अपने को मुसीबतों में डालते हो । क्या यह करुणाजनक बात नहीं है कि छोटा-सा पटाखा या छोटा सा चूल्हा या पत्ती की खड़खड़ाहट की आवाज, बल्कि थर्राती हुई छाया, ऊन पहने हुए पूरे दो मन वजनी शरीर को चौकन्ना कर दे ? संकट के भय से बढ़कर कोई संकट नहीं है । मृत्यु के भय को मन में स्थान देने के बदले मर जाना मैं पसंद करूंगा ।

किसी ने कहा, ''जिसके मन में चलनेवाला पौधा नहीं, उसे कभी भी चलनेवाला पौधा नहीं मिलता ।'' यदि तुम्हारे मन में प्रीति है, तो तुम्हें प्रीति मिलेगी । यदि तुम अप्रीति का पोषण करते हो, तो तुम्हें अप्रीति मिलेगी । यदि तुम्हें धोखा देनेवालों और जासूसों का डर है, तो तुम उनसे नहीं बचोगे ।

यदि तुम स्वार्थपरता और कपट की आशा करते हो तो तुम निराश न होगे, चारों ओर से स्वार्थपरता और कपट तुम्हारे सामने आएगा । तो फिर डरो मत, अपने में पवित्रता और शुद्धता का भाव रखो, तुम्हारा कभी किसी अस्वच्छ वस्तु से सामना नहीं होगा । संसार की सफलता और आध्यात्मिक सफलता को साथ-साथ चलना होगा । वे भ्रम में (Deluded) हैं जो इन दोनों को अलग-अलग करके देखते हैं ।

चोर उसी घर में सेंध लगाते हैं जो अरक्षित होता है । यदि घर में बराबर रोशनी रहे तो वे घुसने की हिम्मत न करेंगे । सत्य का प्रकाश सदा अपने चित्त में प्रज्ज्वलित रखो, फिर भय या प्रलोभन का पिशाच तुम्हारे निकट न पहुंचेगा । ईश्वरीय विधान पर विश्वास रखो । लौकिक बुद्धि के फेर में पड़कर अपने जीवन को कष्टमय न बनाओ ।

कायर दूरदर्शिता तुम्हें पूरा-पूरा नास्तिक (Timid Prudence) बना देती है । परिस्थितियों के कोहरे और धुंध से अपनी आंखों को क्यों बंद होने देते हो ? क्या तुम सूर्यों के सूर्य नहीं हो ? क्या तुम विश्व के स्वामी नहीं हो ? परिस्थितियों की ऐसी कौन-सी चपलता है, जिसे तुम हटा नहीं सकते, फाड़ नहीं सकते अथवा फूंक मारकर उड़ा नहीं सकते ?