स्वयं पर विश्वास
सफलता का छठा सिद्धांत स्वावलंबन है । आप जानते हैं कि हाथी सिंह से काफी बड़ा पशु है । हाथी का शरीर सिंह के शरीर से कहीं अधिक बलवान मालूम पड़ता है । तथापि अकेला एक सिंह हाथियों के समस्त झुंड को भगा सकता है । सिंह की शक्ति का रहस्य क्या है ? यही है कि सिंह अमली वेदांती है और हाथी द्वैतवादी है । हाथी शरीर पर विश्वास करते हैं । सिंह व्यवहारतः शरीर में विश्वास नहीं करता, वह शरीर से किसी उच्चतर वस्तु अर्थात आत्मा में विश्वास करता है । यद्यपि सिंह का शरीर अपेक्षाकृत बहुत छोटा है, परंतु वह स्वयं को असीम शक्ति संपन्न मानता है ।
हाथी चालीस या पचास और कभी-कभी सौ-सौ या दो-दो सौ का दल बना कर रहते हैं और जब कभी वे आराम करते हैं तो सदा एक प्रबल हाथी को पहरेदार बना देते हैं । उन्हें सदैव डर बना रहता है कि कहीं शत्रु चढ़ न आए और खा न जाए । वे यह नहीं जानते कि यदि अपने में विश्वास हो तो हममें से एक-एक कई सिंहों का संहार कर सकता है । किंतु बेचारे हाथियों में भीतरी आत्मा पर विश्वास नहीं होता, फलतः उनमें साहस का भी अभाव होता है ।
इस तरह आत्म-विश्वास कल्याण का एक मूल सिद्धांत है ।
वेदांत सिखाता है कि तुम अपने आपको अधम, नीच, दुःखी, पापी या अभागा मत कहो । वेदांत चाहता है कि तुम अपनी भीतरी शक्ति पर विश्वास करो । तुम अनंत हो । तुम सर्वशक्तिमान परमात्मा हो । अनंत परमेश्वर तुम स्वयं हो, ऐसा विश्वास करो । कैसा भावात्मक सत्य है ! बाह्य आधार पर विश्वास करते ही तुम असफल होते हो । यही सिद्धांत या दैवी विधान है ।
मुकदमेबाजी में उलझे हुए दो भाई न्यायकर्ता के सामने गए । उनमें से एक लखपति था, जबकि दूसरा कंगाल । न्यायकर्ता ने लखपति से पूछा कि वह स्वयं इतना अमीर और उसका भाई इतना गरीब कैसे हो गया ?
लखपति भाई ने जवाब दिया—''पांच वर्ष पूर्व हमें अपने बाप-दादे की समान-समान संपत्ति मिली थी । दो लाख रुपया मेरे हिस्से में आया था और इतना ही मेरे भाई के हिस्से में । मेरा भाई अपने को धनी समझकर आलसी हो गया । (आप जानते हैं कि कुछ धनवान् परिश्रम करना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं) और उसने सभी काम अपने नौकरों को सौंप दिए । यदि कोई चिट्ठी उसके पास आती थी तो अपने नौकरों को देकर कहता था—'जाओ, इस काम को करो ।' जो कुछ भी काम करने को होता था, वह अपने नौकरों से करने को कहता था । इस तरह चैन और आराम में वह अपना समय काटने लगा । 'खाना, पीना और मौज उड़ाना' उसका काम रह गया । वह अपने नौकरों को सदैव आज्ञा देता था—जाओ, जाओ, यह काम करो या वह काम करो ।''
अपने संबंध में उस धनिक पुरुष ने कहा—''लेकिन मैंने जब अपने दो लाख रुपए पाए, तो मैं अपना काम किसी दूसरे को नहीं देता था । जब कभी कुछ करना होता था, तो सदा मैं स्वयं उसे करने दौड़ता था और नौकरों से कहता था—'आओ, आओ मेरे पीछे आओ ।' मेरी जीभ पर हमेशा 'आओ-आओ' शब्द रहते थे और मेरे भाई की जीभ पर हमेशा 'जाओ-जाओ' । उसके अधिकार की हर एक वस्तु ने उसके तकिया कलाम का पालन किया । उसके नौकर, मित्र, दौलत तथा संपत्ति सब चल दिए, उसे बिल्कुल अकेला छोड़ गए । मेरा सिद्धांत वाक्य था—'आओ' मित्र मेरे पास आए, मेरी संपत्ति ही नहीं बढ़ी, हर एक चीज बढ़ी ।''
जब हम दूसरों पर भरोसा करते हैं, तब कहते हैं—'जाओ, जाओ !' इस तरह से एक चीज चली जाएगी । लेकिन जब हम अपने पर भरोसा करते हैं और आत्मा के सिवाय किसी पर भी निर्भर नहीं होते हैं, तब सब चीजें हमारे पास आकर जमा हो जाती हैं । यदि तुम अपने को गरीब, तुच्छ कीट समझते हो, तो वही हो जाते हो और यदि तुम अपना सम्मान करते हो और अपने आत्मा पर निर्भर हो जाते हो, तो तुम्हें बढ़ाई प्राप्त हो जाती है । जैसा तुम सोचोगे, वैसा ही अवश्य हो जाओगे ।
भारत के एक स्कूल में एक निरीक्षक (इंस्पेक्टर) आया । एक शिक्षक ने एक लड़के को दिखलाकर कहा कि वह इतना तेज है कि अमुक-अमुक काव्य, जैसे मिल्टन का 'पैराडाइज लास्ट' उसे कंठाग्र है और उसका कोई भी अंश वह सुना सकता है । विद्यार्थी निरीक्षक के सामने पेश किया गया । किंतु उसमें वेदांत का भाव नहीं था । उसने लज्जा और नम्रता दिखाई । जब उससे पूछा गया—''तुम्हें अमुक खंड कंठाग्र है ?'' तो उसने कहा—''जी नहीं, मैं कुछ भी नहीं जानता ।''
इन शब्दों को उसने नम्रतापूर्वक कहा । ''लज्जाशीलता का लक्षण समझते हुए । निरीक्षक ने फिर पूछा—किंतु लड़के ने फिर भी कहा—''नहीं-नहीं, मैं तो नहीं जानता ।'' शिक्षक का मुंह उतर गया । एक और लड़का था । उसे पूरी पुस्तक मुखाग्र नहीं थी । वह बोल उठा—''आप कुछ भी कहीं से पूछें, मैं सुना दूंगा ।'' निरीक्षक ने उससे कुछ प्रश्न किए । लड़के ने सभी सवालों के उत्तर फटाफट दे दिए । इस लड़के ने वाक्य पर वाक्य सुनाए और इनाम पाया । आप जितना मूल्य अपना समझते हैं, उससे अधिक मूल्य का आपको कोई न अंदाजेगा ।
कृपा करके अपने को दीन-हीन अथवा अभागा प्राणी न बनाइए । जैसा सोचोगे, वैसे ही तुम हो जाओगे । अपने को ईश्वर समझो और तुम ईश्वर हो । अपने को तुम स्वतंत्र (मुक्त) समझो और उसी क्षण तुम स्वतंत्र तथा मुक्त हो जाते हो ।
एक दिन एक वेदांती के घर में एक मनुष्य आया और मकान मालिक की गैरहाजिरी में गद्दी पर बैठ गया । जब घर का मालिक कमरे में घुसने लगा, तो पहले से गद्दी पर विराजमान व्यक्ति ने मकान मालिक से पूछा—''ऐ वेदांती ! मुझे बता कि ईश्वर क्या है और मनुष्य क्या है ?'' उसने प्रश्न का सीधा उत्तर तो नहीं दिया, किंतु वह केवल अपने नौकरों को पुकार कर चिल्लाने और कटु भाषा का प्रयोग करने लगा और उनसे उस घुस आनेवाले को घर से निकाल देने को कहा ।
वेदांती व्यवहार में चतुर था । उसने ऐसी भाषा का प्रयोग किया, जिसकी मकान मालिक की गद्दी पर बैठे आगंतुक को कभी भी अपेक्षा नहीं थी । जब आशा से विपरीत भाषा का प्रयोग किया गया, तो आगंतुक डर गया और घबराकर गद्दी से हट गया । बुद्धिमान मनुष्य उस पर जा विराजा और शांत भाव से गंभीरता पूर्वक उससे बोला—''यह (अपने को बताकर) तो ईश्वर है और तुम (आगंतुक को बताकर) मनुष्य हो । यदि तुम डर न जाते, यदि तुम अपने स्थान पर डटे रहते, यदि तुम अपनी स्थिरता कायम रखते, यदि तुम्हारा चेहरा न उतर जाता, जो तुम भी ईश्वर थे । किंतु तुम्हारा कांपना, थर्राना और अपनी ईश्वरता में विश्वास का न रहना ही तुम्हें हीन कीट बनाता है ।'' स्वयं को ईश्वर समझो, स्वयं को ईश्वरत्व में सजीव रखो, फिर कोई तुम्हारी हानि न कर सकेगा, कोई भी तुम्हें क्षति न पहुंचा सकेगा ।
जब तक तुम बाहरी शक्तियों पर भरोसा और विश्वास करते रहोगे, तब तक परिणाम असफलता ही होगा । स्वयं में विराजमान ईश्वर पर भरोसा करते हुए शरीर को काम में लगाओ, सफलता निश्चित है । यदि पहाड़ मोहम्मद के पास नहीं आता तो मोहम्मद पहाड़ के पास जाएगा ।
एक आदमी भूखा था । अपनी भूख मिटाने के लिए वह एक जगह आंखें मींचकर बैठ गया और काल्पनिक भोजन करने लगा । कुछ देर बाद वह मुंह खोले हुए अपनी जली जीभ ठंडी करते देखा गया । किसी ने उससे पूछा—''क्या मामला है ? 'सी-सी' क्यों करते हों ?'' उसने कहा—''मेरे भोजन (काल्पनिक) में गर्म मिर्च (Chilly) थी ।''
कैसे विचित्र बात है । नाम तो ठंडा है, किंतु चीज है बड़ी गर्म । (अंग्रेजी में लाल मिर्च को 'चिल्ली' (Chilly) कहते हैं ।) 'चिल्ली' का दूसरा अर्थ ठिठुरने वाला भी है ।
इस पर पास खड़े हुए एक मनुष्य ने कहा—''अरे गरीब प्यारे ! यदि मानसिक भोजन पर ही तुम्हें निर्वाह करना था तो गर्म मिर्च के बदले कोई मीठी वस्तु ही क्यों नहीं चुन ली ? जब यह तुम्हारी ही सृष्टि, तुम्हारी ही करतूत और तुम्हारी अपनी ही कल्पना थी, तो कोई अच्छी चीज क्यों नहीं पसंद की ?''
वेदांत कहता है कि आपका समग्र संसार आप ही की रचना है अथवा आप ही का विचार है, अपने आपको नीच, अभागा तथा पापी क्यों समझते हो ? अपने को ईश्वर का निर्भीक और स्वावलंबी अवतार क्यों नहीं समझते ?
सत्य में सजीव विश्वास रखो, इर्द-गिर्द की चीजों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करो, अपनी सर्वपरिस्थितियों का यथोचित मूल्य जानो और इस दर्जे तक आत्मानुभाव करो कि यह संसार तुम्हें मिथ्या (झूठा) ज्ञान पड़ने लगे । क्या तुम्हें पता नहीं कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार स्थिर नक्षत्रों का अंतर गिनने में यह संसार अंकगणित का एक बिंदु मात्र समझा जाता है । उन नक्षत्रों और ग्रहों की अपेक्षा यह संसार कुछ नहीं अर्थात शून्य मात्र माना जाता है ।
यदि ऐसा है, तो सर्वोपरि अनंतशक्ति रूप आत्मा की तुलना में यह पृथ्वी क्या कोई चीज हो सकती है ? ऐसी जानो और अनुभव करो । प्रकाशों के प्रकाश तुम हो, समस्त महिमा तुम्हारी है । यह समझो और इस दर्जे तक इसे अनुभव करो कि यह पृथ्वी और नाम तथा यश, लौकिक संबंध, लोकप्रियता और लोकनिंदा, सांसारिक मान और अपमान, शत्रुओं की निंदा और मित्रों की खुशामद—ये सब तुम्हारे लिए निरर्थक वस्तुएं हो जाएं । सफलता का यही रहस्य है ।
नियाग्रा नदी की तेज धारा दो आदमियों को बहाए लिये जाती थी । उनमें से एक को बड़ा लट्ठा मिल गया और जान बचाने की इच्छा से उसने उसे पकड़ा । दूसरे मनुष्य को नन्ही-सी रस्सी मिली, जिसे किनारे के आदमियों ने इन दोनों को बचाने के लिए फेंका था । सौभाग्य से दूसरे मनुष्य ने रस्सी पकड़ ली, जो लकड़ी के लट्ठे के समान भारी नहीं थी । देखने में रस्सी यद्यपि अत्यंत लचीली, हिलने-डुलने वाली और कोमल थी तथापि वह बच गया । किंतु जिस आदमी ने लकड़ी का लट्ठा पकड़ा था, वह फुर्ती से लट्ठे के साथ बहकर गरजते हुए प्रापातों (Falls) के नीचे जल की खुली हुई खोह में गिर गया ।
इसी तरह तुम जिन बाहरी नामों, कीर्ति, ऐश्वर्य, वैभव, दौलत और समृद्धि पर भरोसा करते हो, ये तुम्हें लकड़ी के लट्ठे की तरह बड़े मालूम होते हैं, किंतु ये बचानेवाले साधन नहीं हैं । बचाने वाला सिद्धांत महीन धागे की तरह है । वह भौतिक नहीं है, तुम उसे छू नहीं सकते, तुम उसे हथिया और टटोल नहीं सकते । सूक्ष्म सिद्धांत, सूक्ष्म सत्य बहुत ही नन्हा है किंतु वही तुम्हें बचाने वाली रस्सी है ।
ये सब संसारी चीजें, जिन पर तुम भरोसा करते हो, केवल तुम्हारा नाश करेंगी, तुम्हें गिराएंगी । सावधान, सावधान ! सत्य को दृढ़ता से पकड़ो । बाहरी पदार्थों की अपेक्षा सत्य पर अधिक विश्वास रखो । दैवी सिद्धांत अर्थात प्रकृति का नियम यह है कि जब मनुष्य असली तौर पर बाहरी पदार्थों और दौलत पर विश्वास करता है, तो उसे असफल होना पड़ता है । यही सिद्धांत है । ईश्वर पर भरोसा करो और सुरक्षित रहो । अपनी इंद्रियों के बहकावे में न आओ ।
अपने पड़ोसियों के उपदेशों और वशीकरण से ऊपर उठो । तुम्हारे सभी सांसारिक बंधन और संबंध तुम्हें चिंता और दुर्भाग्य के वश में डालते हैं । उनके ऊपर उठो । सत्य में विश्वास करो, ईश्वर से अपनी एकता का अनुभव करो और तुम देखोगे कि तुमने अपने सभी बंधन तोड़कर फेंक दिए हैं ।
स्वयं से अर्थात अपने असली रूप (आत्मा से) अधिक किसी को महत्व न दो । किसी से चिढ़ो नहीं । किसी के समक्ष गिड़गिड़ाओ नहीं । काम उसी निर्लिप्त भाव से करो, जिस तरह वैद्य अपने रोगियों की चिकित्सा करते हैं तथा रोग को अपने पास नहीं फटकने देते । सब उलझनों से मुक्त अथवा अप्रभावित गवाह (साक्षी) की भावना से काम करो । स्वतंत्र रहो ।