श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 100

सुनि सीतापति-सील-सुभाउ।

मोद न मन,तन पुलक,नयन जल,सो नर खेहर खाउ ॥ 1 ॥

सिसुपनतें पितु,मातु,बंधु,गुरु,सेवक,सचिव,सखाउ।

कहत राम-बिधु-बदन रिसोहैं सपनेहुँ लख्यो न काउ ॥ 2 ॥

खेलत संग अनुज बालक नित, जोगवत अनट अपाउ।

जीति हारि चुचुकारि दुलारत, देत दिवावत दाउ ॥ 3 ॥

सिला साप-संताप-बिगत भइ परसत पावन पाउ।

दई सुगति सो न हेरि हरष हिय, चरन छुएको पछिताउ ॥ 4 ॥

भव-धनु भंजि निदरि भूपति भृगुनाथ खाइ गये ताउ।

छमि अपराध, छमाइ पाँय परि, इतौ न अनत समाउ ॥ 5 ॥

कह्यो राज, बन दियो नारिबस, गरि गलानि गयो राउ।

ता कुमातुको मन जोगवत ज्यों निज तन मरम कुघाउ ॥ 6 ॥

कपि-सेवा-बस भये कनौड़े, कह्यौ पवनसुत आउ।

देबेको न कछु रिनियाँ हौं धनिक तूँ पत्र लिखाउ ॥ 7 ॥

अपनाये सुग्रीव बिभीषन, तिन न तज्यो छल-छाउ।

भरत सभा सनमानि,सराहत, होत न हृदय अघाउ ॥ 8 ॥

निज करुना करतूति भगत पर चपत चलत चरचाउ।

सकृत प्रनाम प्रनत जल बरनत, सुनत कहत फिरि गाउ ॥ 9 ॥

समुझि समुझि गुनग्राम रामके , उर अनुराग बढ़ाउ।

तुलसिदास अनयास रामपद पाइहै प्रेम-पसाउ ॥ 10 ॥