श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 102

हरि! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हो।

साधन-धाम बिबुध दुरलभ तनु, मोहि कृपा करि दीन्हों ॥ 1 ॥

कोटिहुँ मुख कहि जात न प्रभुके , एक एक उपकार।

तदपि नाथ कछु और माँगिहौं, दीजै परम उदार ॥ 2 ॥

बिषय-बारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक।

ताते सहौं बिपति अति दारुन, जनमत जोनि अनेक ॥ 3 ॥

कृपा-डोरि बनसी पद अंकुस, परम प्रेम-मृदु-चारो।

एहि बिधि बेधि हरहु मेरो दुख, कौतुक राम तिहारो ॥ 4 ॥

हैं श्रुति-बिदित उपाय सकल सुर, केहि केहि दीन निहोरै।

तुलसिदास येहि जीव मोह-रजु, जेहि बाँध्यो सोइ छोरै ॥ 5 ॥