श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 103

यह बिनती रघुबीर गुसाई।

और आस-बिस्वास-भरोसो, हरो जीव-जड़ताई ॥ 1 ॥

चहौं न सुगति,सुमति,संपति कछु, रिधि-सिधि बिपुल बड़ाई।

हेतु-रहित अनुराग राम-पद बढ़ै अनुदिन अधिकाई ॥ 2 ॥

कुटिल करम लै जाहिं मोहि जहँ जहँ अपनी बरिआई।

तहँ तहँ जनि छिन छोह छाँड़ियो, कमठ-अंडकी नाई ॥ 3 ॥

या जगमें जहँ लगि या तनुकी प्रीति प्रतीति सगाई।

ते सब तुलसिदास प्रभु ही सों होहिं सिमिटि इक ठाई ॥ 4 ॥