श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १०४

श्रीराम-स्तुति · पद १०४ / २७९

जानकी-जीवनकी बलि जैहौं।

चित कहै रामसीय-पद परिहरि अब न कहूँ चलि जैहौं ॥ १ ॥

उपजी उर प्रतीति सपनेहुँ सुख, प्रभु-पद-बिमुख न पैहौं।

मन समेत या तनके बासिन्ह, इहै सिखावन दैहौं ॥ २ ॥

श्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं, रसना और न गैहौं।

रोकिहौं नयन बिलोकत औरहिं, सीस ईस ही नैहौं ॥ ३ ॥

नातो-नेह नाथसों करि सब नातो-नेह बहैहौं।

यह छर भार ताहि तुलसी जग जाको दास कहैहौं ॥ ४ ॥