श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 104

जानकी-जीवनकी बलि जैहौं।

चित कहै रामसीय-पद परिहरि अब न कहूँ चलि जैहौं ॥ 1 ॥

उपजी उर प्रतीति सपनेहुँ सुख, प्रभु-पद-बिमुख न पैहौं।

मन समेत या तनके बासिन्ह, इहै सिखावन दैहौं ॥ 2 ॥

श्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं, रसना और न गैहौं।

रोकिहौं नयन बिलोकत औरहिं, सीस ईस ही नैहौं ॥ 3 ॥

नातो-नेह नाथसों करि सब नातो-नेह बहैहौं।

यह छर भार ताहि तुलसी जग जाको दास कहैहौं ॥ 4 ॥