श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 105

अबलौ नसानी, अब न नसैहौं।

राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं ॥ 1 ॥

पायेउँ नाम चारु चिंतामनि, उर कर तें न खसैहौं।

स्यामरूप सुचि रुचिर कसौटी, चित कंचनहिं कसैहौं ॥ 2 ॥

परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस ह्वे न हँसेहौं।

मन मधुकर पनकै तुलसी रघुपति-पद-कमल बसैहौं ॥ 3 ॥