श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 106

श्रीराम-स्तुति · राग रामकली · पद 106 / 279

महाराज रामादर्यो धन्य सोई।

गरुअ,गुनरासि,सरबग्य,सुकृती,सूर,सील-निधि,साधु तेहि सम न कोई ॥ 1 ॥

उपल,केवट,कीस,भालु,निसिचर,सबरि,गीध सम-दम-दया-दान-हीने।

नाम लिये राम किये परम पावन सकल, नर तरत तिनके गुनगान कीने ॥ 2 ॥

ब्याध अपराधकी साध राखी कहा, पिंगलै कौन मति भगति भेई।

कौन धौं सोमजाजी अजामिल अधम, कौन गजराज धौं बाजपेयी ॥ 3 ॥

पांडु-सुत,गोपिका,बिदुर,कुबरी,सबरि,सुद्ध किये सुद्धता लेस कैसो।

प्रेम लखि कृस्न किये आपने तिनहुको, सुजस संसार हरिहरको जैसो ॥ 4 ॥

कोल,खस,भील,जवनादि खल राम कहि, नीच ह्वे ऊँच पद को न पायो।

दीन-दुख-दवन श्रीरवन करुना-भवन, पतित-पावन विरद बेद गायो ॥ 5 ॥

मंदमति,कुटिल,खल-तिलक तुलसी सरिस, भो न तिहुँ लोक तिहुँ काल कोऊ।

नामकी कानि पहिचानि पन आपनो, ग्रसित कलि-ब्याल राख्यो सरन सोऊ ॥ 6

बिहाग