श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 109

कस न करहु करुना हरे! दुखहरन मुरारि!

त्रिबिधताप-संदेह-सोक-संसय-भय-हारि ॥ 1 ॥

इक कलिकाल-जनित मल, मतिमंद, मलिन-मन।

तेहिपर प्रभु नहिं कर सँभार, केहि भाँति जियै जन ॥ 2 ॥

सब प्रकार समरथ प्रभो, मैं सब बिधि दीन।

यह जिय जानि द्रवौ नहीं, मै करम बिहीन ॥ 3 ॥

भ्रमत अनेक जोनि, रघुपति, पति आन न मोरे।

दुख-सुख सहौं, रहौं सदा सरनागत तोरे ॥ 4 ॥

तो सम देव न कोउ कृपालु, समुझौं मनमाहीं।

तुलसिदास हरि तोषिये, सो साधन नाहीं ॥ 5 ॥