श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ११०

श्रीराम-स्तुति · पद ११० / २७९

कहु केहि कहिय कृपानिधे! भव-जनित बिपति अति।

इंद्रिय सकल बिकल सदा, निज निज सुभाउ रति ॥ १ ॥

जे सुख-संपति, सरग-नरक संतत सँग लागी।

हरि! परिहरि सोइ जतन करत मन मोर अभागी ॥ २ ॥

मै अति दीन, दयालु देव सुनि मन अनुरागे।

जो न द्रवहु रघुबीर धीर, दुख काहे न लागे ॥ ३ ॥

जद्यपि मैं अपराध-भवन, दुख-समन मुरारे।

तुलसिदास कहँ आस यहै बहु पतित उधारे ॥ ४ ॥