श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 110

कहु केहि कहिय कृपानिधे! भव-जनित बिपति अति।

इंद्रिय सकल बिकल सदा, निज निज सुभाउ रति ॥ 1 ॥

जे सुख-संपति, सरग-नरक संतत सँग लागी।

हरि! परिहरि सोइ जतन करत मन मोर अभागी ॥ 2 ॥

मै अति दीन, दयालु देव सुनि मन अनुरागे।

जो न द्रवहु रघुबीर धीर, दुख काहे न लागे ॥ 3 ॥

जद्यपि मैं अपराध-भवन, दुख-समन मुरारे।

तुलसिदास कहँ आस यहै बहु पतित उधारे ॥ 4 ॥