पद 111
श्रीराम-स्तुति · पद 111 / 279
केसव! कहि न जाइ का कहिये।
देखत तव रचना बिचित्र हरि! समुझि मनहिं मन रहिये ॥ 1 ॥
सून्य भीति पर चित्र, रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे।
धोये मिटइ न मरइ भीति, दुख पाइय एहि तनु हेरे ॥ 2 ॥
रबिकर-नीर बसै अति दारुन मकर रूप तेहि माहीं।
बदन-हीन सो ग्रसै चराचर, पान करन जे जाहीं ॥ 3 ॥
कोउ कह सत्य,झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल कोउ मानै।
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तुलसिदास परिहरै तीन भ्रम, सो आपन पहिचानै ॥ 4 ॥