श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 112

केसव! कारन कौन गुसाई।

जेहि अपराध असाध जानि मोहिं तजेउ अग्यकी नाई ॥ 1 ॥

परम पुनीत संत कोमल-चित, तिनहिं तुमहिं बनि आई।

तौ कत बिप्र,ब्याध,गनिकहि तारेहु, कछु रही सगाई ? ॥ 2 ॥

काल,करम,गति अगति जीवकी, सब हरि! हाथ तुम्हारे।

सोइ कछु करहु, हरहु ममता प्रभु! फिरउँ न तुमहिं बिसारे ॥ 3 ॥

जौ तुम तजहु, भजौं न आन प्रभु, यह प्रमान पन मोरे।

मन-बच-करम नरक-सुरपुर जहँ तहँ रघुबीर निहोरे ॥ 4 ॥

जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सों करौं ढिठाई।

तुलसिदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई ॥ 5 ॥ ý