पद 112
श्रीराम-स्तुति · पद 112 / 279
केसव! कारन कौन गुसाई।
जेहि अपराध असाध जानि मोहिं तजेउ अग्यकी नाई ॥ 1 ॥
परम पुनीत संत कोमल-चित, तिनहिं तुमहिं बनि आई।
तौ कत बिप्र,ब्याध,गनिकहि तारेहु, कछु रही सगाई ? ॥ 2 ॥
काल,करम,गति अगति जीवकी, सब हरि! हाथ तुम्हारे।
सोइ कछु करहु, हरहु ममता प्रभु! फिरउँ न तुमहिं बिसारे ॥ 3 ॥
जौ तुम तजहु, भजौं न आन प्रभु, यह प्रमान पन मोरे।
मन-बच-करम नरक-सुरपुर जहँ तहँ रघुबीर निहोरे ॥ 4 ॥
जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सों करौं ढिठाई।
तुलसिदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई ॥ 5 ॥ ý