श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 113

माधव! अब न द्रवहु केहि लेखे।

प्रनतपाल पन तोर, मोर पन जिअहुँ कमलपद देखे ॥ 1 ॥

जब लगि मै न दीन,दयालु तैं, मैं न दास, तैं स्वामी।

तब लगि जो दुख सहेउँ कहेउँ नहिं, जद्यपि अंतरजामी ॥ 2 ॥

तैं उदार, मैं कृपन, पतित मैं, तैं पुनीत, श्रुति गावै।

बहुत नात रघुनाथ! तोहि मोहि, अब न तजे बनि आवै ॥ 3 ॥

जनक-जननि,गुरुबंधु,सुहृदकल-पति, सब प्रकार हितकारी।

द्वैतरूप तम-कूप परौं नहिं, अस कछु जतन बिचारी ॥ 4 ॥ ø

सुनु अदभ्र करुना बारिजलोचन मोचन भय भारी।

तुलसिदास प्रभु! तव प्रकास बिनु, संसय टरै न टारी ॥ 5 ॥

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