श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 116

माधव! असि तुम्हारि यह माया ।

करि उपाय पचि मरिय, तरिय नहिं जब लगि करहु न दाया ॥ 1 ॥

सुनिय,गुनिय,समुझिय,समुझाइय,दसा हृदय नहिं आवै ।

जेहि अनुभव बिनु मोहजनित भव दारुन बिपति सतावै ॥ 2 ॥

ब्रह्म-पियूष मधुर सीतल जो पै मन सो रस पावै ।

तौ कत मृगजल-रूप बिषय कारन निसि-बासर धावै ॥ 3 ॥

जेहिके भवन बिमल चिंतामनि,सो कत काँच बटोरै ।

सपने परबस परै, जागि देखत केहि जाइ निहोरै ॥ 4 ॥

ग्यान-भगति साधन अनेक, सब सत्य,झूँठ कछु नाही ।

तुलसिदास हरि-कृपा मिटै भ्रम, यह भरोस मनमाहीं ॥ 5 ॥