श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ११६

श्रीराम-स्तुति · पद ११६ / २७९

माधव! असि तुम्हारि यह माया ।

करि उपाय पचि मरिय, तरिय नहिं जब लगि करहु न दाया ॥ १ ॥

सुनिय,गुनिय,समुझिय,समुझाइय,दसा हृदय नहिं आवै ।

जेहि अनुभव बिनु मोहजनित भव दारुन बिपति सतावै ॥ २ ॥

ब्रह्म-पियूष मधुर सीतल जो पै मन सो रस पावै ।

तौ कत मृगजल-रूप बिषय कारन निसि-बासर धावै ॥ ३ ॥

जेहिके भवन बिमल चिंतामनि,सो कत काँच बटोरै ।

सपने परबस परै, जागि देखत केहि जाइ निहोरै ॥ ४ ॥

ग्यान-भगति साधन अनेक, सब सत्य,झूँठ कछु नाही ।

तुलसिदास हरि-कृपा मिटै भ्रम, यह भरोस मनमाहीं ॥ ५ ॥