श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 117

हे हरि! कवन दोष तोहिं दीजै ।

जेहि उपाय सपनेहुँ दुरलभ गति, सोइ निसि-बासर कीजै ॥ 1 ॥

जानत अर्थ अनर्थ-रूप, तमकूप परब यहि लागे ।

तदपि न तजत स्वान अज खर ज्यो, फिरत बिषय अनुरागे ॥ 2 ॥

भूत-द्रोह कृत मोह-बस्य हित आपन मै न बिचारो ।

मद-मत्सर-अभिमान ग्यान-रिपु, इन महँ रहनि अपारो ॥ 3 ॥

बेद-पुरान सुनत समुझत रघुनाथ सकल जगब्यापी ।

बेधत नहिं श्रीखंड बेनु इव, सारहीन मन पापी ॥ 4 ॥

मैं अपराध-सिंधु करुनाकर ! जानत अंतरजामी ।

तुलसिदास भव-ब्याल-ग्रसित तव सरन उरग-रिपु-गामी ॥ 5 ॥