पद ११८
श्रीराम-स्तुति · पद ११८ / २७९
हे हरि ! कवन जतन सुख मानहु ।
ज्यों गज-दसन तथा मम करनी, सब प्रकार तुम जानहु ॥ १ ॥
जो कछु कहिय करिय भवसागर तरिय बच्छपद जैसे ।
रहनि आन बिधि, कहिय आन, हरिपद-सुख पाइय कैसे ॥ २ ॥
देखत चारु मयूर बयन सुभ बोलि सुधा इव सानी ।
सबिष उरग-आहार,निठुर अस,यह करनी वह बानी ॥ ३ ॥
अखिल-जीव-वत्सल, निरमत्सर,दरन-कमल-अनुरागी ।
ते तव प्रिय रघुबीर धीरमति, अतिसय निज-पर-त्यागी ॥ ४ ॥
जद्यपि मम औगुन अपार संसार-जोग्य रघुराया ।
तुलसिदास निज गुन बिचारि करुनानिधान करु दाया ॥ ५ ॥