श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 118

हे हरि ! कवन जतन सुख मानहु ।

ज्यों गज-दसन तथा मम करनी, सब प्रकार तुम जानहु ॥ 1 ॥

जो कछु कहिय करिय भवसागर तरिय बच्छपद जैसे ।

रहनि आन बिधि, कहिय आन, हरिपद-सुख पाइय कैसे ॥ 2 ॥

देखत चारु मयूर बयन सुभ बोलि सुधा इव सानी ।

सबिष उरग-आहार,निठुर अस,यह करनी वह बानी ॥ 3 ॥

अखिल-जीव-वत्सल, निरमत्सर,दरन-कमल-अनुरागी ।

ते तव प्रिय रघुबीर धीरमति, अतिसय निज-पर-त्यागी ॥ 4 ॥

जद्यपि मम औगुन अपार संसार-जोग्य रघुराया ।

तुलसिदास निज गुन बिचारि करुनानिधान करु दाया ॥ 5 ॥