श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद ११९

श्रीराम-स्तुति · पद ११९ / २७९

हे हरि ! कवन जतन भ्रम भागै ।

देखत,सुनत,बिचारत यह मन, निज सुभाउ नहिं त्यागै ॥ १ ॥

भगति-ग्यान-बैराग्य सकल साधन यहि लागि उपाई ।

कोउ भल कहउ,देउ कछु, असि बासना न उरते जाई ॥ २ ॥

जेहि निसि सकल जीव सूतहिं तव कृपापात्र जन जागै ।

निज करनी बिपरीत देखि मोहिं समुझि महा भय लागै ॥ ३ ॥

जद्यपि भग्न-मनोरथ बिधिबस, सुख इच्छत, दुख पावै ।

चित्रकार करहीन जथा स्वारथ बिनु चित्र बनावै ॥ ४ ॥

हृषीकेश सुनि नाउँ जाउँ बलि, अति भरोस जिय मोरे ।

तुलसिदास इंद्रिय-संभव दुख, हरे बनिहिं प्रभु तोरे ॥ ५ ॥