श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद 120

हे हरि ! कस न हरहु भ्रम भारी ।

जद्यपि मृषा सत्य भासै जबलगि नहिं कृपा तुम्हारी ॥ 1 ॥

अर्थ अबिद्यमान जानिय संसृति नहिं जाइ गोसाई ।

बिन बाँधे निज हठ सठ परबस पर्यो कीरकी नाई ॥ 2 ॥

सपने ब्याधि बिबिध बाधा जनु मृत्यु उपस्थित आई ।

बैद अनेक उपाय करै जागे बिनु पीर न जाई ॥ 3 ॥

श्रुति-गुरु-साधु-समृति-संमत यह दृश्य असत दुखकारी ।

तेहि बिनु तजे, भजे बिनु रघुपति, बिपति सकै को टारी ॥ 4 ॥

बहु उपाय संसार-तरन कहँ, बिमल गिरा श्रुति गावै ।

तुलसिदास मैं-मोर गये बिनु जिउ सुख कबहुँ न पावै ॥ 5 ॥