श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १२१

श्रीराम-स्तुति · पद १२१ / २७९

हे हरि ! यह भ्रमकी अधिकाई ।

देखत, सुनत, कहत, समुझत संसय-संदेह न जाई ॥ १ ॥

जो जग मृषा ताप-त्रय-अनुभव होइ कहहु केहि लेखे ।

कहि न जाय मृगबारि सत्य,भ्रम ते दुख होइ बिसेखे ॥ २ ॥

सुभग सेज सोवत सपने, बारिधि बूड़त भय लागै ।

कोटिहुँ नाव न पार पाव सो, जब लगि आपु न जागै ॥ ३ ॥

अनबिचार रमनीय सदा, संसार भयंकर भारी ।

सम-संतोष-दया-बिबेक तें, व्यवहारी सुखकारी ॥ ४ ॥

तुलसिदास सब बिधि प्रपञ्च जग, जदपि झूठ श्रुति गावै ।

रघुपति-भगति, संत-संगति बिनु, को भव-त्रास नसावै ॥ ५ ॥