श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १२२

श्रीराम-स्तुति · पद १२२ / २७९

मै हरि, साधन करइ न जानी ।

जस आमय भेषज न कीन्ह तस,दोष कहा दिरमानी ॥ १ ॥

सपने नृप कहँ घटै बिप्र-बध, बिकल फिरै अघ लागे ।

बाजिमेध सत कोटि करै नहिं सुद्ध होइ बिनु जागे ॥ २ ॥

स्त्रग महँ सर्प बिपुल भयदायक, प्रगट होइ अबिचारे ।

बहु आयुध धरि, बल अनेक करि हारहिं, मरइ न मारे ॥ ३ ॥

निज भ्रम ते रबिकर-सम्भव सागर अति भय उपजावै ।

अवगाहत बोहोत नौका चढ़ि कबहुँ पार न पावै ॥ ४ ॥

तुलसिदास जग आपु सहित जब लगि निरमूल न जाई ।

तब लगि कोटि कलप उपाय करि मरिय, तरिय नहिं भाई ॥ ५ ॥