श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
विनय पत्रिका

पद १२३

श्रीराम-स्तुति · पद १२३ / २७९

अस कछु समुझि परत रघुराया !

बिनु तव कृपा दयालु ! दास-हित ! मोह न छूटै माया ॥ १ ॥

बाक्य-ग्यान अत्यंत निपुन भव-पार न पावै कोई ।

निसि गृहमध्य दीपकी बातन्ह, तम निबृत नहिं होई ॥ २ ॥

जैसे कोइ इक दीन दुखित अति असन-हीन दुख पावै ।

चित्र कलपतरु कामधेनु गृह लिखे न बिपति नसावै ॥ ३ ॥

षटरस बहुप्रकार भोजन कोउ, दिन अरु रैनि बखानै ।

बिनु बोले संतोष-जनित सुख खाइ सोइ पै जानै ॥ ४ ॥

जबलगि नहिं निज हृदि प्रकास, अरु बिषय-आस मनमाहीं ।

तुलसिदास तबलगि जग-जोनि भ्रमत सपनेहुँ सुख नाहीं ॥ ५ ॥